प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

तुम्हारे आने भर से

कुछ अपनों, कुछ सपनों के मुस्काने भर से हैं।
कितने सारे प्रश्न तुम्हारे आने भर से हैं।।

तुम आयीं तो होंठों ने खुशियों का गाल छुआ,
तुम आयीं तो बातों ही बातों में हुई दुआ।
तुम आयीं तो बारिश के पानी में गंध उठी,
तुम आयीं तो कलियों का फूलों में बदल हुआ।
तुम आयीं तो लगता है जैसे की मन के भय,
मिलने की उत्सुकता में खो जाने भर से हैं।।

अपने पीछे दोहराने को यादें और करो,
कुछ पल को आये हो मुझसे बातें और करो।
आँखें गीली हो आयी हैं इन्द्रदेव सुन लो,
अब के सावन में तुम भी बरसातें और करो।
तुम बेहतर कर आयी हो अपने सारे मौसम,
हम अपनी ऋतुओं को ये समझाने भर से हैं।।

ऐसे पानी के भीतर आँखों का रूप दिखा,
तुमसे मिलकर जैसे कोई खोया चांद मिला।
जैसे उठकर गीतों के सब राजकुमार कहें,
मन की पीड़ा पर अब के एक अच्छा गीत लिखा।
हमने भी पूछा है हमसे तुम भी तो पूछो,
इतने खुश क्या पीड़ाओं को पाने भर से हैं।।


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चाँदनी-सी हो गयी हो

चाँदनी-सी हो गयी हो रात तुम,
और करना चाहती हो बात तुम।

नींद आँखों से बराबर खो रही हो,
झूठ यह एहसास देकर सो रही हो।
मेघदूतों से विरह का हाल पाकर,
यक्ष की उन्मत्त अलका हो रही हो।
दूरियों से पा गयीं आघात तुम,
और करना चाहती हो बात तुम।।

रात भर दोहराओगी झूठी कहानी,
रात भर समझाओगी सच्ची कहानी।
रोज़ की तरह ही लेकिन कल सुबह फिर,
ख़त्म करना चाहोगी मीठी कहानी।
दे रही हो आप ही को मात तुम,
और करना चाहती हो बात तुम।।

जो तुम्हारी ख्वाहिशों का था सहारा,
खो गया ख़ुद में तुम्हारा पा सहारा।
मृत्यु के देकर बहाने जानती हो,
पा रही हो और जीने का सहारा।
और स्याही चाहती हो रात तुम,
और करना चाहती हो बात तुम।।

है बहुत आसान रिश्ता तोड़ आना,
राह में इक और रस्ता जोड़ आना।
दूर तक तो साथ आने से रहीं तुम,
द्वार तक ही आज मुझको छोड़ आना।
दे रही हो प्यार की सौगात तुम,
और करना चाहती हो बात तुम।।


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तुम हमें प्यार दो

दिल की पीड़ाओं को क्यूं न आधार दें।
तुम हमें प्यार दो हम तुम्हें प्यार दें।।

मुझसे मेरा तुम अब छीन आकाश लो,
मैं तुम्हारी धरा को यूँ अपना कहूँ।
नींद ओढ़े क्यूँ पलकों पे आ हो खड़ी,
सत्य समझूँ इसे या के सपना कहूँ।
फ़िक्र साँसों को ये है के तुम को कहीं,
जीतने की ख़ुशी में न हम हार दें।।

सिर्फ पन्नों में बिखरी ये नज़्में मेरी,
रोक कितना भी लूँ चुप रहेंगी नहीं।
धूप थामे मैं दिन काट लूँगा मगर,
सर्द रातें सितम ये सहेंगी नहीं।
या किताबों में रखें या अब कौनसे,
ढाल साँचें में हम इन को आकार दें।।

रोने-गाने को तो सैकड़ों हैं मगर,
गीत ऐसा हो जिस में मैं पा लूँ तुम्हें।
रात मुझसे ये टूटी कलम ने कहा,
आँख मूँदों 'अदब' तो खँगालूँ तुम्हें।
हम अंधेरों की चादर हैं ओढ़े हुए,
क्यूँ उजालों को रातों में पतवार दें।।


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रोज़ तुम्हारे ख़त पढ़ते हैं

हमसे अधिक मौन रातों में,
शोर मचाते सन्नाटों में।
तुम तक जाती राहों को बस,
रोती आँखों से तकते हैं।
रोज़ तुम्हारे ख़त पढ़ते हैं।।

रोज़ ग़मों का ताना-बाना,
रोज़ दर्द की नई निशानी।
रोज़ रात को रोज़ रात से,
हमने सीखी रात निभानी।
ऐसा नहीं ख़याल नही है,
तुमको लेकिन कम लिखते हैं।
रोज़ तुम्हारे ख़त पढ़ते हैं।।

रोज़ प्रेम की उम्र बढ़ेगी,
और घटेंगें साल हमारे।
यहाँ हमारे अधर जलेंगे,
वहाँ जलेंगे गाल तुम्हारे।
कुछ-कुछ जीवित अपनापन है,
कुछ-कुछ तुम से भी दिखते हैं।
रोज़ तुम्हारे ख़त पढ़ते हैं।।


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हँसकर जाओ विदा तुम्हें है

आहें, आँसू, रस्में, कसमें
बंधन भी लो हमने थामे,
लांछन सारे सह लेंगें और
सुन लेंगें जग के भी ताने।
मेरे हिस्से का भी सब कुछ
झोली भर-भर मिला तुम्हें है।
हँसकर जाओ विदा तुम्हें है।।

नए बहाने फिर कह लोगी,
जिनको हँसकर मैं सुन लूँगा,
बिछड़ गयीं तो रिश्ते-नाते
नए सिरे से फिर बुन लूँगा।
शायद भूल गयी हो तुम वो
महका-महका प्रेम पत्र जो,
कॉलेज के उस बंद गेट पर
तुमने छुप के मुझे दिया था।
मैंने कल भी नाम तुम्हारे
सबसे छुपकर पत्र लिखा था,
वैसा ही एक पत्र आज भी
बिना नाम के लिखा तुम्हें है।
हँसकर जाओ विदा तुम्हें है।।

प्रश्न करूँ तो कहती हो के
मुझको पाकर क्या पाओगे,
तुम बस मेरे प्रेम में शायद
गीत लुटाते रह जाओगे।
याद करो परिणाम का वो दिन
जब कम नम्बर आने पर तुम,
माँ-बाबा की डाँट को सुनकर
मुझसे मिलकर रो बैठी थीं।
काँधें पर सर रखकर मेरे,
खुद को जैसे खो बैठी थीं।
आज भी सारे परिणामों का
तुमको सारा श्रेय सौंपकर,
मैंने अपनी अभिलाषा से
हर उत्तर में सुना तुम्हें है।
हँसकर जाओ विदा तुम्हें है।।

आज भी क्या उन दिनों के जैसे
गुरुवार को व्रत करती हो?
पीला सूट पहनकर तुम क्या
मंदिर जाने को सजती हो?
मैं तो हूँ एक कवि अभागा
किस्मत के हाथों का मारा,
प्राणप्रिय मैं तुम्हें हारकर
केवल जग को जीत रहा हूँ।
बाहर-बाहर भरा हुआ हूँ
भीतर-भीतर रीत रहा हूँ,
धन्य तुम्हीं हो मुझे भुलाकर
जीवन की शर्तों को त्यागे।
एक बार फिर प्रणयदेव ने
प्रेम निमंत्रण दिया तुम्हें है।
हँसकर जाओ विदा तुम्हें है।।


- अर्पित अदब
 
रचनाकार परिचय
अर्पित अदब

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