हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

प्रेमगीत- 1

कैसे भला भुला दूँ, खुशियों के चार दिन वो।
जब ज़िन्दगी में आये, थे तुम बहार बन के।।

एकाकी मरुस्थल में जब मैं भटक रहा था,
फैला के अपना आँचल तुमने ही ठाँव दी थी।
हारे हुए पथिक-सा जब थक के चूर बैठा,
तुमने ही मीठी-मीठी गोदी की छाँव दी थी।
अहसासों की वो कैसी अमराई भूल जाऊँ
अब भी महक रही हो, तुम हर सिंगार बन के।।

पहला प्रणय पुरुष ये बिलकुल न भूल पाया,
क्यों उसको भला कुदरत सर्वस्व सौंपती है।
जब मद भरी घटाएँ यादों की घुमड़ती हैं,
तब उसमें तेरी चितवन बिजली-सी कौंधती है।
कैसे करूँ इबादत मैं और किसी बुत की,
आया हूँ तेरे दर पर मैं खाकसार बनके।।

फुर्सत के पलों में जब बैठे नदी किनारे,
लहरों ने स्वयं उठकर पग धोये थे हमारे।
ठंडी हवा के झोंके रह रह उछालते थे,
ख्वावों के आसमां में पहचान के सितारे।
जीवन की उलझनों में बढ़ती है उमस जब भी,
कानों में गूंजती हो मीठी मल्हार बनके।।


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प्रेमगीत- 2

प्यार का नाम सबने सुना है, मगर,
प्यार के सार से सब ही अनजान हैं।
भावनाओं से ये खेलता किस तरह?
सोचकर लोग होते परेशान हैं।।

फूटता प्यार का जब भी अंकुर कहीं,
धड़कनों में खनक ख़ु़द-ब-ख़ुद जागती।
देती है मीठी-मीठी चुभन प्रीति की-
चाशनी ऐसे तीरे-नज़र पागती।
हमको भी उनमें ही एक समझो कि जो,
ऐसे दर्दों की दौलत से धनवान हैं।।

ग़म उठाने में जो लोग पीछे रहे,
मेरी नज़रों को वे दीखे नादान-से।
प्यार के जो समन्दर में उतरे हैं, वे,
हैं न घबराए आंधी औ तूफ़ान से।
ग़म पे मेरे न अफ़सोस करना कोई,
ग़म हमारे लिए ख़ास मेह्मान हैं।।

प्यार की जब से लहरों में उतरा हूँ मैं,
छा गया तब से कुछ ऐसा दीवानापन।
अब सताती नहीं है कभी भी मुझे,
गर्मियों की तपन, सर्दियों की गलन।
लगता है मेरी दीवानगी देखकर,
हो गये सारे मौसम मेहरबान हैं।।


- डॉ. रंजन विशद
 
रचनाकार परिचय
डॉ. रंजन विशद

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