प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

धरोहर
हिंदी साहित्य का श्रृंगार:~ महाकवि जयशंकर प्रसाद !!
     (30जनवरी 1889- 15नवंबर 1937)
 
पारस केवल पत्थर नहीं होता, लोग भी होते हैं और उनमें यदि कोई कवि या लेखक है तो उसके व्यक्तित्व के पारस गुण अनायास उसकी कलम में भी आ जाते हैं। हिंदी काव्य के कनक-कुल को ‘कामायनी’ जैसे महाकाव्य का उत्तराधिकार देना किसी पारस स्पर्श देकर कंचन करने-सा ही है, फिर वो चाहे लौह हो या पहले से स्वर्ण हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। कामायनी के रचयिता जयशंकर प्रसाद का जन्म सन 1889 में कशी के सारे गोवर्धन मोह्हल्ले के नामी व्यापारी देवीप्रसाद के घर में हुआ था। पिता की प्रतिष्ठा समाज में इतनी थी कि बनारस के लोग काशी नरेश के बाद सिर्फ देवीप्रसाद जी का सम्मान हर हर महादेव सम्बोधन करती थी। पिता काव्यप्रेमी थे इसलिये परिवार में कवियों और विद्ध्वानों का जमघट होता रहता था। अपने समकालीन कवियों की तरह प्रसाद ने भी ब्रजभाषा में ही लिखना आरम्भ किया। ‘चित्राधार, उनकी ब्रजभाषा में लिखी रचनाओं का ही संकलन है। पिछले कई युगों का प्रभाव हावी होने के कारण प्रसाद ने पद और सवैयों की रचना से शुरुआत की और पौराणिक कथाओं को विषयवस्तु बनाया।
 
जयशंकर प्रसाद जी एक कवि के रूप में ही सामान्यतः विख्यात हैं, पर नाटक, कहानी, निबंध एवं उपन्यास के लेखन में भी वे सदा सन्नद्ध रहे। किसी भी अन्य लेखक ने हिंदी संसार को विविध रूपों में इतनी रचनाएँ नहीं दी, जितना अकेले महाकवि जयशंकर प्रसाद ने। इसी कारण प्रसाद जी क़ लोग हिंदी का ‘रवीन्द्र’ कहा करते हैं। उन्होंने मात्र तीन उपन्यास लिखे- कंकाल(1928), तितली(1933), और इरावती(1936)। इरावती को वह पूरा नहीं कर सके।
उनके तीनों उपन्यास विभिन्न कोटि के हैं। ‘कंकाल’ में हम नागरिक सभ्यता की पोल खुलते देखते हैं, तो  ‘तितली’ में पूर्णतः ग्रामीण-परिवेश व्याप्त है। ‘कंकाल’ व्यंग और कटुता से भरी यथार्थवादी रचना है जबकि इसके विपरीत  ‘तितली’ आदर्शोन्मुखी है। ‘इरावती’ एतिहासिक पृष्ठभूमि में लिखा गया है, जो पूर्णतः रोमांटिक है।
‘कंकाल’ प्रसाद जी की प्रथम व्यंगात्मक सामाजिक उपन्यास है। यह चार खंडों में विभक्त है। इसमें प्रमुख रूप से दस स्त्री पात्र है और 9 पुरुष चरित्र। घटनाएँ प्रयाग, हरिद्वार, मथुरा, वृन्दावन,अयोध्या और काशी में घटित होती है। पूरी घटनाएँ मुख्य रूप से मंगल और विजय के जीवन से सम्बन्ध रखती है, पर गौण कथाओं में किशोरी, निरंजन, रामा-भंडारी, श्रीचंद-किशोरी, चन्दा-श्रीचंदा, एवं वदान-माला के प्रसंग आते हैं, जो मुख्य कथानक को विस्तार देने में सहायक हुए हैं। किशोरी व्यवसायी श्रीचंद की पत्नी है। पुत्र प्राप्ति की कामना से दोनों एक दासी के साथ भ्ब्रहम्चारी देव निरंजन के शर्म में जाते हैं। पत्नी हरिद्वार के आश्रम में छोड़कर श्रीचंद अमृतसर लौट आये। ब्रहमचारी निरंजन, किशोरी का पूर्व प्रेमी निकला। श्रीचंद के पीछे आश्रम में किशोरी, किशोरी के साथ रंगरेलियां मानती रही, जिस कारण अमृतसर से लौटने पर उसे पुत्र हुआ। पुत्र का नाम रखा- विजय। इस घटना के 15 वर्ष के बाद की बात है। एक विधवा रामा का विवाह ‘भंडारी’ से होता है। उससे रामा को तारा नामक बेटी पैदा होती है। तारा बड़ी हो गयी तो रा उसे लेकर काशी आई, यहाँ तारा भीड़ में रामा से बिछुड़कर ‘गुलजार’ विषय के हाँथ पड जाती है। वैश्यालय से मंगलदेव नमक युवक तारा को उससे व्याह करने की इच्छा से भागकर ले जाता है। हरिद्वार में पता चलता है कि तारा की माता व्याभिचारनी है, उसने विधवा होकर भंडारी से बिवाह किया तो वह तारा को छोड़ कर भाग जाता है। तब तक तारा के गर्भ में 3 माह का बच्चा पल रहा था। तब वह आत्महत्या का प्रयास करती है, पर एक सन्यासी उसे बचा लेता है। बच्चा पैदा होने तक वह वही रहती है, फिर गंगा में कूद जाती है और वहां से बहती हुई काशी पहुँच जाती है। वहांकिशोरी उसे अपने पास रख लेती है। वहां उसने अपना नाम यमुना बताया और दासी बन गयी। किशोरी वहां अपने बेटे विजय के साथ पति द्वारा परित्यक्त होकर ब्रहमचारी निरंजन की छत्रछाया में रह रही थी। विजय यमुना(तारा) के प्रति आसक्त हो गया। इसी समय विजय एक ‘घंटी’ नमक लड़की के संपर्क में भी आ जाता है।  किशोरी को यह पसंद नहीं। फलस्वरूप झगडा होता है और सभी अलग-थलग पद जाते हैं- विजय मथुरा में, किशोरी काशी में और यमुना वृन्दावन के कृष्ण-शरण के आश्रम में रहने लगते हैं। घटनाक्रम तेजी से घुमाता है – विजय और घंटी ईसाई-समाज के संपर्क में आते हैं, फिर विजय की यमुना(तारा) और निरंजन से भेंट होती है, पर तभी विजय द्वारा तांगेवाले नबाव की हत्या हो जाती है। विजय फ़तेहपुर सिकरी जाकर एक डाकू ‘बदन गुजर’ के साथ ‘नए’ नाम से रहने लगता है। गुजर के साथ उसकी बेटी गाला भी है। वहीँ मंगलदेव भी आ जाता है। वहीँ सब मिलकर ‘भारत-संघ’ की स्थापना करते हैं। मंगल की गाला से शादी हो जाती है। वहीँ पता चलता है कि विजय वास्तव में यमुना(तारा) का भाई है। फिर भी ब्रहमचारी निरंजन की जायज संतान है। विजय तो था ही। उपवास का पटाक्षेप बड़े कारुणिक ढंग से होता है – दशाश्वमेघ घात पर एक दिन ‘भारत-संघ’ का जुलुस आता है , जिसमें घंटी, मंगल, माला सम्मिलित हैं। वहीँ यमुना मोहन के साथ पहुंचती है, श्रीचंद भी पहुंचाते हैं। सब देखते हैं कि एक स्त्री मलिन वस्त्र पहने बैठी है और उसके सामने एक मरे भिखमंगे का ‘कंकाल’ पड़ा है। ठीक से देखने पर पता चला, वह ‘कंकाल’ – विजय का शव था। लोगों का कहना है कि ‘तितली’ ‘कंकाल’ से अधिक आकर्षक और सफल उपन्यास है। चरित्र घटनाक्रम के अनुसार बनते हैं। कथावस्तु सुलझी हुई है और जीवन के अधिक निकट है। विकास गति स्वाभाविक है। अंतर्द्वंद और बाह्य द्वन्द दोनों चलते हैं। संघर्षमय जीवन का अंत भी सुखमय दिखाया गया है। 
 
नीलकोठी के मालिक पार्टली के कारण देवनंदन बर्बाद हो गया। वह अपनी बेटी ‘बंजो’ को रामनाथ के सुपुर्द कर कहीं चला गया। रामनाथ धामपुर के जमींदार इन्द्रदेव के गाव का वाशिंदा है। इन्द्रदेव  बैरिश्त्री पढने इंग्लॅण्ड जाता है, जहा उसकी मुलाकात एक गरीब लड़की ‘शैला’ से होती है। उसे साथ ले इन्द्रदेव गाँव लौटता है। वहां आकर शिला हिन्दू हो जाती है। इन्द्रदेव की माँ श्याम्सुन्दरी को शिला पसंद आ जाती है और इन्द्रदेव शिला से शादी कर लेता है। इन्द्रदेव के यहाँ एक मधुबन नमक कर्मचारी था। वह पहले शेरकोट का जमींदार था, पर कालक्रम से वह गरीब हो गया था। उसको ‘बैंजो’ से प्रेम हो जाता है और फिर शादी भी। पर तब बैंजो का नाम तितली हो जाता है। उसके बाद घटनाक्रम कुछ ऐसा चलता है कि मधुबन को कलकत्ता भाग जाना पड़ता है। वहां वह कोयला ध्होता है, रिक्शा चलता है, और उसी क्रम में एक व्यक्ति की हत्या कर के वह जेल चला जाता है। इधर तितली माँ बन जाती है। बेटा (मोहन) बड़ा होकर पिता को खोजने लगा। 14 वर्ष के हो जाने पर मोहन अपने पिता को देख पता है, क्यूंकि तब तक जेल की अवधि समाप्त कर मधुबन घर वापस आ जाता है। इस प्रकार अप्रत्याशित रूप से ‘तितली’ मधुबन को देख आत्मविभोर हो जाती है। इधर इन्द्रदेव शहर में जाकर वकालत करते होते हैं। फिर समाज सुधर के कार्य में योगदान देने की सोचते हैं, पर पारिवारिक जीवन की जटिलता में उलझकर अपने मन का कुछ नहीं कर पाए और उपन्यास का अंत हो गया। 
 
इस प्रकार ‘तितली’ में हम देखते हैं कि इसमें तितली और मधुबन की कहानी ही मुख्य रूप से चलती रहती  है। पर उसमें इन्द्रदेव और शिला का भी कम योगदान नहीं है। 
इरावती में मौर्यकाल की राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक परिस्थितिओं का चित्रण है। उन दिनों आतंरिक विद्रोह प्रबल था। दौह राजा वृहस्पति मित्र भीरु और विलाशी था। देवदासी इरावती महाकाली मंदिर में निवास करती थी। महाकाल के सम्मुख नृत्य करना उसका मुख्य काम था। एक दिन नृत्य कर रही थी कि वृहस्पति मित्र वहां आ जाता है। बौद्ध होने के कारण यह नृत्य राग उसे पसंद नहीं । वह इरावती को बौद्ध भिक्षुणी बना देता है। पर एक दिन वह मठ से भाग जाती है। इतने में वहां सैनिक आ जाते हैं और कैद कर उसे कुसुमपुर भेज दिया जाता है।
 वहां पुष्यमित्र की युक्ति से अग्निमित्र सेना का महानायक हो जाता है। उधर इरावती कुकत्ता राय विहार में भेज दी जाती है। पर वहां के बौद्धों के पाखंडमय जीवन से उसे घृणा हो आती है। वह मठ से फिर निकल भागती है पर पुनः सैनिकों द्वारा पकडे जाने पर इस बार उसे सम्रठ  के रंगशाला में पहुंचा दिया जाता है। सम्राट वृहस्पति मित्र उससे बलात्कार करने को तत्पर होता है कि इतने में कालिंदी आ जाती है। सम्राट कालिंदी की ओर उन्मुख हो जाता है और इरावती बच जाती है । कालिंदी, अग्निमित्र से पूर्व परिचित है। वह नंदवंश की कन्या है। वह मौर्यवंश के विनाश के लिए एक संस्था की स्थापना करती है। एक दिन धनदत्त नमक व्यापारी के यहाँ सभी एक दावत में शरीक होते हैं। वहां इरावती, कालिंदी, अग्निमित्र और छादाम्देश कलिंगराज खारवेल भी शामिल होते हैं। इरावती के नृत्य के साथ ही गुप्त मंत्रणा  भी होती है। खारवेल को मदद देने के लिए अग्निमित्र वचनबद्ध होता है। इतने में सम्राट के सैनिक धनदत्त के मकान को घेर लेते हैं। और ....उपन्यास यही पर अधुरा रह जाता है।
कहते हैं कि प्रसाद जी ‘अग्निमित्र’ नाम से एक नाटक लिखना चाहते थे, किन्तु उसकी जगह उन्होंने ‘इरावती’ उपन्यास लिखना शुरू कर दिया। इस उपन्यास के 108 पृष्ठ लिख पाए थे कि उनका देहांत हो गया। इस उपन्यास के अधुरा रह जाने के कारण यह जिज्ञासा बनी रह जाति है कि मगध पर आयी हुई विपत्ति की परिणति कहाँ हुई और अग्निमित्र अपनी प्रेयसी इरावती को प्राप्त कर सका या नहीं। 
 
 जयशंकर प्रसाद छायावाद के प्रथम स्तम्भ हैं इसलिए प्रेम, प्रकृति और रहस्य को तो इनकी कलम ने रचा ही है पर इनके काव्य में जिस भाव-वैविद्ध्य के दर्शन होते हैं वह अपने आप में परम होने का एक अभिनव दृष्टान्त है। ‘कानन-कुसुम’ ऋतुओं की रंगभूमि है, ‘झरना’ प्रकृति में चेतना का आरोप है तो ‘लहर’ में दर्शन मुखर है। ‘प्रेम-पथिक’, ‘आंसूं’, और ‘महाराणा का महत्व’ तीन काव्य्खंड हैं जिनमे पहला प्रेमगाथा है, दूसरा विरह-वर्णन है और तीसरा एतिहासिक पत्रों की कथा है। ‘कामायनी’ महाकाव्य है जिसकी कथा का आधार ऋग्वेद, छन्दोग्य उपनिषद, शतपथ ब्राहमण और श्रीमद्भागवत गीता है।
15 नवम्बर 1937 को 48 वर्ष की छोटी उम्र में ही साहित्य की हर विधा- कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध को- अपनी अमूल्य कलम का जो अतुल्य उपहार दिया वह हिंदी साहित्य के लिए अमूल्य धरोहर है। 
 

- नीरज कृष्ण