हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर
एकांकी - चक्षु दान 
 
लेखक : गौतम राय 
बांग्ला से अनुवाद : मल्लिका मुखर्जी 
 
चरित्र – श्यामल, दूर्वा, निर्मल, हिरेन, वृद्ध 
 
[अति साधारण एक कमरा। रहनेवाले व्यक्ति का नाम श्यामल मजुमदार। यह छोटा-सा कमरा ही उसका संसार-जगत है। वह एक कंपनी में छोटेसे पद पर कार्यरत है। अविवाहित, सरल ह्रदय का सीधासादा इंसान है। उम्र करीब अड़तीस वर्ष। कमरे का सर सामान भी उसी की तरह साधारण सा है. एक पुराणी कुर्सी पर बैठकर अखबार पढ़ रहा है। नेपथ्य से एक महिला की आवाज़.....]
महिला:  श्यामल....ओ श्यामल... घर पर हो क्या?
श्यामल:  मुझे पुकार रही है, एक महिला? (ऊँची आवाज़ में) कौन...कौन है?
महिला:   मैं हूँ...
श्यामल:  एक महिला का नाम ‘मैं’? वाह...
(दरवाज़ा खोलता है...महिला का प्रवेश..नाम है दूर्वा। हवा के झोंके की तरह चंचल। आधुनिक चालढाल, परिणीता, उम्र करीब बत्तीस वर्ष।)
दूर्वा:     ऐसे चौंक क्यों गए? भूत देखा क्या? सुबह-सुबह भूत नहीं आते..
श्यामल:  लेकिन तुम ...अचानक.. ऐसे?
दूर्वा:     हाँ मैं..दूर्वा..क्यों नहीं आ सकती?
श्यामल:  ऐसी बात नहीं है दूर्वा..लेकिन..
दूर्वा:     क्या बैठने को भी नहीं कहोगे?
श्यामल:  हाँ..हाँ..क्यों नहीं..बैठो ना..
दूर्वा: बैठूं, पर कहाँ? ओह यह घर है या सब्जीमंडी? कैसे रहते हो तुम इस घर में? परेशानी   नहीं होती?
श्यामल:  साफ़ सफाई की बात करती हो? वो तो होनेसे ही मुझे परेशानी होती है।
दूर्वा:   तुम बिलकुल ही नहीं बदले श्यामल.. वैसे ही रह गए गंदे..
श्यामल:  सफाई से रहने की हर एक की फितरत नहीं होती दूर्वा, पर तुम..
दूर्वा:   हाँ मैं दूर्वा..तुम्हारी दूर्वा..
श्यामल:  मेरी दूर्वा? अरे बाप रे.. मर गया..
दूर्वा:   ओह..कुछ वर्ष नहीं मिले तो माँ-बाप को याद करने लगे?
 
श्यामल:  मैं बड़ी दुविधा में हूँ कि तुम ऐसे..अचानक?
दूर्वा: निष्ठुर प्रेमी की तरह बात मत करो श्यामल, यदि मैं तुम्हारे पास आना चाहूँ तो अचानक क्या? अच्छा, मुझे यह बताओ, तुम खुश तो हो ना?
श्यामल:  अजीब लग रहा है, पर मैं तो नशा नहीं करता।
दूर्वा:   नशे की बात कौन करता है? मैं तो ये पूछ रही हूँ कि तुम कैसे हो?
श्यामल:  यही तो..सुबह-सुबह श्रीमती दूर्वा सेनगुप्ता मुझे पूछ रही हैं कि मैं कैसा हूँ, खुश तो हूँ    न?
दूर्वा:   मज़ाक मत करो श्यामल, सच सच बताओ, तुम खुश तो हो न?
श्यामल:  मैं? हाँ..हाँ.. मैं खुश हूँ..बहुत खुश हूँ।
दूर्वा:   क्या बात करते हो?
श्यामल:  हाँ मैं सच कहता हूँ। कोई महान पुरुष की तरह ही मैं खुश हूँ।
दूर्वा:   कोई वजह?
श्यामल:  वजह यही कि मेरा कोई शत्रु नहीं है, मेरे सर पर कोई कर्ज नहीं है और सबसे बड़ी   बात ये है कि मेरी कोई तमन्ना नहीं है।
दूर्वा:   झूठ..बिलकुल झूठ! मेरे बिना तुम खुश रह ही नहीं सकते, किसी भी हाल में नहीं।
श्यामल:  सच कहूँ तो आज से दस वर्ष पहले मुझे भी यही लगता था लेकिन अब..
दूर्वा: तुम झूठ कह रहे हो श्यामल, ये तुम्हारे बिखरे-बिखरे बाल, मैले-कुचैले कपडे, इस बात  के सबूत है कि तुम खुश नहीं हो..और तुम कितने दुबले हो गए हो!
श्यामल:  हर इंसान के खुश रहने के तरीके अलग-अलग होते हैं दूर्वा..(दु:खी स्वर)। 
दूर्वा: तुम्हारी वह पुरानी बीमारी अभी तक गई नहीं?हर वक्त ये दुखी चेहरा लिए घूमते रहना..
श्यामल:  (बात को काटते हुए) चाय पीओगी?
दूर्वा:    चाय? अरे बापरे!
श्यामल:  क्या हुआ? पाँव के नीचे कुछ आ गया क्या?
दूर्वा:    धत..
श्यामल:  तो फिर?
दूर्वा:   चाय, वह नीचे वाले भवानंद की केबिन से ही लाओगे न, टूटे हुए बेरंगे कप में?
श्यामल:  अगर मुझे पहले से पता होता कि तुम आनेवाली हो तो..
दूर्वा:   मैं चाय पीकर ही आ रही हूँ। तुम्हें इस बारे में सोचने की जरुरत नहीं।
श्यामल:  लेकिन तुमने यह नहीं बताया कि इतने वर्षों बाद अचानक तुम्हें मेरे पास क्यों आना पड़ा?
दूर्वा:     पता नहीं। पिछले कई दिनों से मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। तुम्हारी बहुत याद  आ रही थी।
श्यामल:  (स्वगत) मेरी याद आ रही थी? (जोर से) तुम्हारी तबियत तो ठीक है?
दूर्वा:     ठीक नहीं है श्यामल, ज़रा भी ठीक नहीं है। पिछले कई दिनों से तुम्हारी बड़ी याद आ रही थी। हमने साथ बिताये उन पलों की याद....क्या तुम्हें याद नहीं आते वे दिन? जब  हम साथ-साथ घूमा करते थे, बोलो..?
श्यामल:  नहीं नहीं, मुझे याद नहीं आते वे दिन..
दूर्वा:   हाय..हाय..क्यों? क्यों याद नहीं आते?
श्यामल:  क्योंकि यह उचित नहीं है। मेरे लिए अब तुम एक पराई स्त्री हो।
दूर्वा: तुम तो अठारहवी सदी के उस बेचारे आदर्शवादी पुरुष की तरह बात कर रहे हो  श्यामल। मेरी शादी तो एक इत्तफाक था.. और वैसे देखा जाये तो जिंदगी भी तो एक इत्तफाक है! 
 
श्यामल:  जाने दो वो पुरानी बातें। तुम तो मुझे ये बताओ कि मुझ जैसे एक मामूली इन्सान के घर अचानक दस वर्षों के बाद क्यों आना पड़ा?
दूर्वा:   श्यामल..
श्यामल:  हाँ..हाँ..बताओ.. 
दूर्वा:   मुझे देखकर तुम्हें यही लगता है न किमैं बहुत सुखी हूँ?
श्यामल:  बिलकुल, तुम्हारा सबकुछ तो सुख के लिए ही है दूर्वा, सुख तो हमेशा तुम्हारे साथ ही  रहना चाहता है।
दूर्वा: बस..बस, रहने दो, ऐसा कहकर मुझे और तकलीफ़ मत पहुँचाओ श्यामल। मैं बड़ी  परेशान हूँ।
श्यामल:  एक मल्टीनेशनल कंपनी के सी.ई.ओ. की पत्नी हो तुम। आलिशान बंग्ला है, लक्झुरियस   गाडी है...बेशुमार दौलत है...बड़ी-बड़ी रिश्वतें..फिर.. 
दूर्वा:   क्या कहा?
श्यामल:  नहीं नहीं, मेरे कहने का मतलब है..इतनी बड़ी तनख्वाह है...क्या नहीं है तुम्हारे पास? देखो, तुम्हारे आगमन से ही मेरा यह टूटा-फूटा कमरा विदेशी परफ्यूम की खुशबू से महक उठा। तुम आई जैसे बहार आई!
दूर्वा: तुम मेरी बात को उड़ा रहे हो श्यामल। एक दिन तुमने मुझे वचन दिया था कि जीवन में कभी किसी मुश्किल का सामना करना पड़ा तो तुम मेरा साथ दोगे। बोलो, कहा था कि नहीं?
श्यामल:  कहा तो था, पर मैं तो एक मामूली इंसान हूँ दूर्वा, तुम तो जानती हो, मेरे पास इस छोटे से कमरे के सिवा कुछ भी नहीं है।
दूर्वा: जानती हूँ...मैं जानती हूँ कि तुम्हारे पास इस छोटे से कमरे के सिवा और कुछ भी नहीं  है ..पर तुमने यह नहीं कहा था कि मेरी खातिर तुम अपनी जान भी दे सकते हो?
श्यामल:  तुम्हारे पति के होते हुए मैं अपनी जान दूँ तो कैसा लगेगा? क्या यह उचित होगा? हो सकता है उन्हें कोई ग़लतफ़हमी हो जाए।
दूर्वा: मज़ाक मत करो श्यामल, मज़ाक मत करो। एक मात्र तुम ही हो जो मुझे बचा सकते हो। अपने दिल पर हाथ रखकर कहो क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करते? बोलो, चुप क्यों हो?
श्यामल:  नहीं..नहीं करता।
दूर्वा:   एई..तुम झूठ बोल रहे हो..
श्यामल:  करता था।
 
दूर्वा:   क्या..? क्या आज भी तुम मुझसे प्यार नहीं करते?
श्यामल:  मैं एक गरीब इंसान हूँ। मेरे पास इस छोटेसे कमरे के सिवा कुछ भी नहीं है।
दूर्वा: छि..छि..छि..तुम प्यार के साथ पैसों की तुलना कर रहे हो? ऐसा मत करो श्यामल  प्लीज़..मैं जानती हूँ तुम आज भी मुझसे उतना ही प्यार करते हो जितना आज से दस वर्ष पहले करते थे और तुम्हें पता है? मैं भी तुमसे उतना ही प्यार करती हूँ जितना..
श्यामल:  (बात को काटते हुए) तुम्हारी समस्या क्या है दूर्वा?
दूर्वा:   श्यामल, अनुपम को तो तुम जानते ही हो।
श्यामल:  ये तो तुम्हारे पति का नाम है।
दूर्वा:   ओ ...माँ..जलन हो रही है उनसे? अभी तक तुम उनका नाम नहीं भूल पाए?
श्यामल:  क्या हुआ अनुपमबाबू को?
(दूर्वा रोने लगती है, यह उसका अभिनय है, श्यामल थोड़ा डर जाता है.) 
 क्या बात है? क्या हुआ? एई दूर्वा रोओ मत. चलो चूप हो जाओ...प्लीज़..
दूर्वा:   उम्र ही कितनी है अनुपम की! तुमसे भी कितने छोटे हैं!
श्यामल:  (स्वगत) क्या बात करती हो! (जोर से) मैंने तो सुना है मेरे भांजे की उम्र के हैं।
दूर्वा:   एक थप्पड़ मारकर मुंह ही घुमा देना चाहिए..
श्यामल:  किसका?
दूर्वा: तुम्हारा नहीं..जो लोग ऐसी बातें करते हैं, उनका। हाँ तो मैं क्या कह रही थी? उम्र ही कितनी है अनुपम की...सारा जीवन पड़ा है सामने. कितना ब्राईट फ्यूचर है यु नो? उज्ज्वल भविष्य... 
श्यामल:  ये तो बड़ी अच्छी बात है।
दूर्वा: अब तुम्ही बताओ, आज वाही जीवन मौत के क़रीब आकर खड़ा है। मेरा तो दिल ही डूबा जा रहा है।
श्यामल:  केन्सर?
दूर्वा:   नोनसेन्स..
श्यामल:  हें...
दूर्वा:   तुम भी न, ऐसी डरावनी बात करते हुए तुम्हें अच्छा लगता है?
श्यामल:  अच्छा तो नहीं लगता, पर तुम जिस तरह से कह रही हो मुझे लगा शायद...
दूर्वा:   तो क्या तुम कुछ भी कहोगे? अनुपम ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है श्यामल?
श्यामल:  ओह सॉरी, मैं तो यूँ ही कह रहा था।
दूर्वा:   यूँ ही केन्सर? (रुमाल से अपना नाक पोंछती है) उससे भी भयानक रोग हुआ है।
श्यामल:  एइड्स हुआ है?
दूर्वा:   नॉनसेन्स.. 
श्यामल:  इससे भी भयानक कोई रोग हो सकता है, मुझे तो नहीं पता।
 
दूर्वा:   आँखें श्यामल आँखें...
श्यामल:  अच्छा अच्छा कंजंटीवाईटीस हुआ है। 
दूर्वा: धत..ना ना सोचो..इतनी बड़ी कंपनी के सी.ई.ओ., इतनी बड़ी तनख्वाह, नए-नए प्रोजेक्ट्स, बड़ी-बड़ी स्कीम्स सबकुछ उन्हीं पर निर्भर है।
श्यामल:  तो क्या कोई नया प्रतिस्पर्धी?
दूर्वा: धत्..अगर कोई प्रतिस्पर्धी होता तो तुम्हारे पास क्यों आती? उसके लिए तो भाईलोग है न?
श्यामल:  तो क्या कोई लड़की?
दूर्वा: तुम भी क्या! मजाल है कि मेरे होते हुए अनुपम किसी लड़की की तरफ़ आँख उठाकर भी देखे!
श्यामल:  तो फिर समस्या क्या है?
दूर्वा:   समस्या बड़ी गंभीर है श्यामल, एक मात्र तुम ही मुझे बचा सकते हो।
श्यामल:  ठीक है बाबा, मुझसे जो बन पड़ेगा मैं करूँगा, बस? अब बताओ बात क्या है?
दूर्वा: मुझे पता था, तुम यही कहोगे श्यामल...इसलिए तो मैं तुम्हारे पास आई हूँ। तुम्हें याद है श्यामल, जब हम दोनों बोटनिकल गार्डन के उस विशाल वटवृक्ष के नीचे बैठते थे, जहाँ थोडा थोडा अँधेरा हुआ करता था...
श्यामल:  बस बस आगे कुछ मत कहो दुर्वा....वर्ना अभी बिजली चली जाएगी। तुम तो मुझे यह  बताओ, अनुपमबाबू को हुआ क्या है?
दूर्वा:   उनकी आँखों की दृष्टि दिन ब दिन खराब होती जा रही है।
श्यामल:  ऐसा होना स्वाभाविक है। उम्र भी तो बढती जा रही है।
दूर्वा:   क्या कहा?
श्यामल:  ना ना मतलब उम्र में मुझसे तो छोटे ही हैं, तुम उन्हें डॉक्टर के पास तो ले गई होगी  न? क्या कहा डॉक्टर ने?
दूर्वा:   डॉक्टर ने कहा, ‘कुछ नहीं हो सकता।’ 
श्यामल:  अच्छा? इतनी छोटी उम्र में अंधे हो जाना बहुत बुरा है।
दूर्वा: ऐसा मत कहो श्यामल..तुम्हें पता है उनके बॉस ने कहा है कि अंधे हो गए तो नौकरी  चली जायेगी। मेरी तीती अनाथ हो जाएगी। मैं तो डूब ही जाऊँगी..श्यामल सिर्फ तुम ही मुझे बचा सकते हो। मुझे बचा लो श्यामल मुझे बचा लो।
 
श्यामल:  (स्वगत) मैं कैसे बचा सकता हूँ, मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। (जोर से) बाय ध वे यह तीती कौन है?
दूर्वा:   तुम्हारी भांजी।
श्यामल:  मेरी भांजी? मेरी तो कोई बहन ही नहीं है।
दूर्वा: अरे वो बहन नहीं, मेरी बेटी. रात-दिन शाम मामा, शाम मामा कहकर तुन्हें याद करती  रहती है। इतनी बार बोलती है कि बेहोश हो जाती है।
श्यामल:  बेहोश हो जाती है? तो शाम मामा कहकर कब बुलाती है?
दूर्वा:    मज़ाक मत करो श्यामल, मुझे बचा लो।
श्यामल:  लेकिन मैं आँखों का डॉक्टर नहीं हूँ दूर्वा.. 
दूर्वा:   मुझे पता है।
श्यामल:  मैं निहायत ही मामूली इंसान हूँ। मेरा कोई बेंक बेलेंस नहीं है। मैं तुम्हारे कोई काम नहीं आ सकता।
दूर्वा:   (स्वगत) मैं जानती हूँ तुम एक नंबर के गधे हो।
श्यामल:  कुछ कहा?
दूर्वा: कुछ नहीं। लेकिन एक दिन तुमने मुझसे कहा था कि मेरी ख़ुशी के लिए तुम कुछ भी कर सकते हो। श्यामल तुम मेरी प्राणरक्षक दवाई हो, मेरी आत्मा का विटामिन हो, तुम ही मेरी मदद कर सकते हो...
श्यामल:  मेरी तो यह समझ में नहीं आ रहा कि मैं तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूँ?
दूर्वा:   श्यामल, तुम्हारी आँखें कितनी सुन्दर है!
श्यामल:  क्या..? मैं तो पहली बार सुन रहा हूँ।
दूर्वा: सच कह रही हूँ श्यामल, इतनी बड़ी बड़ी सुन्दर आँखें... इस उम्र में भी चश्मा नहीं है। मैं तो सोच ही नहीं सकती कि इतनी खुबसूरत आँखें बिना वजह बरबाद हो रही है।
श्यामल:  बिना वजह बरबाद हो रही है? मैं समझा नहीं।
दूर्वा:   ठीक ही तो है। तुम्हीं बताओ, इंसान को आँखें क्यों चाहिए?
श्यामल:  कैसी बात करती हो दूर्वा? आँखें ही तो सबकुछ है. आँखें न हो तो हम कुछ भी न देख पायेंगे ना?
दूर्वा: बिल्कुल ठीक, इस खुबसूरत धरती को सुन्दर तरीके से देखने के लिए ही आँखें चाहिए। पर क्या दो बड़ी बड़ी आँखें होने से ही सबकुछ मिल जाता है? उसके लिए दिल चाहिए, मिज़ाज चाहिए, पैसे चाहिए, लेकिन तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है।
श्यामल:  तुम्हारी बात सही है। मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। लेकिन गरीब होने के बावजूद मैं सबकुछ अच्छी तरह देख सकता हूँ। ज्यादा स्पष्ट देखने की कोशिश करता हूँ तो धुंधला दिखाई देता है।
दूर्वा: बस बस मैं भी यही कहना चाहती हूँ। गरीबों के पास इतनी सुन्दर आँखें होने का कोई मतलब नहीं है।
श्यामल:  तुम्हारे कहने का मतलब ते तो नहीं कि गरीबों को आँखों की कोई ज़रूरत ही नहीं?
दूर्वा:   लोजिकली सोचो तो यही मतलब है। तुम्हारे पास आँखें न हो तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
श्यामल:  क्या बात करती हो दूर्वा? आँखें न होंगी तो मैं तो अँधा हो जाऊँगा!
दूर्वा: तो हो जाओ ना....उससे क्या होगा? लोजिकली उससे इस दुनिया में किसीको कुछ भी नुकसान नहीं होगा। 
श्यामल:  लोजिकली मुझे तो होगा ना!
दूर्वा:   एक सी.ई.ओ. से ज्यादा तो नहीं ना?
श्यामल:  तुम कहना क्या चाहती हो?
दूर्वा:   यही कि तुम्हें इन आँखों की कोई ज़रूरत नहीं है।
श्यामल:  लेकिन मैं अगर अँधा हो गया तो मेरी तो नौकरी चली जाएगी। मेरा खाना-पीना सब बंद हो जाएगा।
दूर्वा:   तुम बिलकुल फ़िक्र न करो, मैं हूँ ना....
श्यामल:  तुम हो...पर कहाँ?
दूर्वा: यहाँ, तुम्हारे पास। तुम ही कहो श्यामल, इतनी सुंदर आँखें होने के बावजूद तुम्हारी तनख्वाह कितनी है? पाँच हजार, सात हजार  या दस हजार?
श्यामल:  पंद्रह हजार।
दूर्वा: बस..? अब यही आँखें अगर अनुपम के पास हो तो तनख्वाह होगी डेढ़ लाख...अब तुम ही बताओ ये आँखें किसके पास होनी चाहिये?
श्यामल:  बात तो सही है, जिसकी तनख्वाह ज्यादा आँखें उनके पास होनी चाहिए। 
दूर्वा: बस..बस अब आगे कुछ भी न सोचो श्यामल, मैं हूँ ना! अब क्या होगा जानते हो? तुमने जिस बात की तमन्ना की थी वह अब पूरी हो जाएगी। जो भी हुआ अच्छा हुआ, भगवान के घर देर है अंधेर नहीं...हे भगवान...
श्यामल:  सही कह रही हो, पर मैंने किस बात की तमन्ना की थी?
दूर्वा: अरे वाह! भूल गए? क्या तुम नहीं चाहते थे कि तुम्हारी इन बड़ी बड़ी सुंदर आँखों से तुम सारा जीवन अपनी प्रेमिका को यानि मुझे देखते रहो? अपने दिल पर हाथ रखकर कहो, क्या तुम ऐसा नहीं चाहते थे?
 
श्यामल:  हे भगवान! मुझे तो यही समझ में नहीं आ रहा कि आख़िर तुम चाहती क्या हो?
दूर्वा: अहाहा...तुम्हारी ये दो सुन्दर आँखें जब अनुपम की आँखों की जगह बिठाई जाएगी तब तुम मुझे हररोज देख पाओगे और तब? तुम्हारी प्रेमभरी नज़रों से मेरा मन तो तितली की तरह उड़ता रहेगा अपने रंबबिरंगी पंख फैलाए....
श्यामल:  तितली की तरह उड़ता रहेगा? मेरा तो सर चकरा रहा है दूर्वा...
दूर्वा: सर चकरा रहा है? विटामिन की कमी लगती है। आजसे बल्कि अभी से ही मैं तुम्हें विटामिन की गोली खिलाऊँगी।
श्यामल:  तब भी मेरा सर चकराता रहेगा...तुम समझती क्यों नहीं दूर्वा?
दूर्वा:   अनुपम ने ठीक ही कहा था कि तुम मुझे पहचान ही नहीं पाओगे।
श्यामल:  सच कहूँ तो मैं आज ही तुम्हें पहचान पाया हूँ। अरे हाँ देखो...एक बात याद आ गई. आँखों के बारे में तुम्हें इतना सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है। आई बैंक में जाने से तुम्हें ज़रूर आँखें मिल जाएगी।
दूर्वा: ओ माँ..ऐसी बात तुमने सोची कैसे श्यामल? इसीलिए तुम्हारे सारे दोस्त तुम्हें गोबरगणेश कहा करते थे। तुम्हें पता भी है, आई बैंक में कौन चक्षुदान करता है? स्मशान घाट पर पहुँचे बुड्ढ़े, किसीकी आँख में मोतियाबिंद, किसीको , किसीका माइनस दस नंबर...अरे कभी कभी तो बकरी की आँखों को भी इन्सान की आँख बताकर दे देते हैं. तुम्हारे होते हुए मेरा अनुपम बकरी की आँखों से देखेगा? बोलो?
श्यामल:  तो क्या सच में तुम मेरी आँखें लेना चाहती हो?
दूर्वा: ओहो..तुम्हारी आँखें तो तुम्हारी ही रहेगी। सिर्फ़ उनका ठिकाना बदलेगा। इस दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जो जन्म से अंधे है। तुम तो फिर भी कितने ख़ुशनसीब हो श्यामल!
श्यामल:  ठीक है, मैं तुम्हें एक वील बनाकर दे देता हूँ कि मेरी मौत के बाद मेरी आँखें निकाल लेने का हक़ सिर्फ़ तुम्हें होगा...बस? ख़ुश?
दूर्वा:   ठीक है, पर कितनी देर लगेगी?
श्यामल:  किसे? 
दूर्वा:     तुम्हें मरने में...यु नो..गरीब लोग बहुत ज्यादा जीते हैं। बिना खाए भी ज़िन्दा रहते हैं।
श्यामल:  नहीं नहीं अब ज्यादा देर नहीं है.अभी कुछ दिन पहले ही मैंने एक ज्योतिषी से अपनी जन्मकुंडली बनवाई है। डेट ऑफ़ एक्सपाईरी बिल्कुल करीब आ चुकी है। थोड़ा-सा और इंतज़ार कर लो प्लीज़...ओके...? 
दूर्वा:   (श्यामल को थाम लेती है) ओह श्यामल, तुम कितने अच्छे हो!   
श्यामल:  दूर्वा, तुम मुझे सिर्फ़ सात दिन का समय दो, सिर्फ़ सात दिन. मैं इस दुनिया को अच्छी तरह से देख लेना चाहता हूँ. मैंने अभीतक ‘पद्मावती’ फ़िल्म नहीं देखी..अभी तक मैं मेट्रो रेल में नहीं चढ़ा हूँ।
दूर्वा:   ओह माय स्वीट श्यामल यु आर ग्रेट...तुम महान हो। तुमने मुझे बचा लिया।
 
   --------------*------------*--------------*--------------*-------------*--------------क्रमशः
 

- मल्लिका मुखर्जी
 
रचनाकार परिचय
मल्लिका मुखर्जी

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