प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी 2018
अंक -35

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जयतु संस्कृतम्
कविता 
 
त्वदीयं दर्शनं लब्ध्वा
 
त्वदीयं दर्शनं लब्ध्वा मनो मे मोदते नित्यम्।
समक्षे वारणं दृष्ट्वा वियोगो बाधते नित्यम्।।1।
 
शशी तारा: निशा दीपा रमन्ते खे सदा रात्रौ।
प्रभाते रागिणी शोभा निवासे राजते नित्यम्।2।
 
दिनेशो बोधनं कृत्वा समायात: पुरो द्वारे। 
प्रयाता यामिनी निद्रा मनो मे क्षोभते नित्यम्।3।
 
कदाचिद् गुञ्जनं श्रुत्वा कदाचिद् गर्जनं कृत्वा । 
कपाटं वीक्ष्य सामोदं शरीरं गाहते नित्यम्।4।
 
क्वचिच्चोन्मोचनं कृत्वा क्वचिच्चाच्छादनं धृत्वा ।
अनेकै रूपर्सौन्दर्यैस्तया ह्यनुरज्यते नित्यम्।5।
 
कराग्रे स्थापिता रेखा प्रकृत्या वक्रतां लब्ध्वा। 
ग्रहाणां दुष्प्रभावैर्वै गृहस्थ:पीड्यते नित्यम्।6।
 
वियोगे वाऽत्र संयोगे रसं प्राप्नोति रसराज:। 
जनानां जीवनं लोके विपत्या क्लिश्यते नित्यम्।।
 

- डॉ.राजेन्द्र त्रिपाठी रसराज
 
रचनाकार परिचय
डॉ.राजेन्द्र त्रिपाठी रसराज

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जयतु संस्कृतम् (2)