प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -39

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

समकालीन हिन्दी उपन्यासों में परिवर्तित स्त्रीमानस
- रवि रंजन कुमार ठाकुर

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। इस चराचर जगत में परिवर्तन के अभाव में किसी भी समाज का जीवन स्पन्दनहीन, मृतप्राय हो जाता है। देश एवं काल की आवश्यकता अनुसार विभिन्न परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। ये बदली हुई परिस्थितियाँ परिवर्तन की प्रक्रिया को गति प्रदान करती हैं। प्रभा वर्मा के शब्दों में "परिवर्तन समाज में एकाएक उपस्थित नहीं होते हैं। परिवर्तन की एक निश्चित व सतत् प्रक्रिया समाज में निरंतर गतिशील रहती है। प्रक्रिया के पश्चात् वह परिवर्तन जिस रूप में हमारे सामने उपस्थित होता है, वही उसका स्वरूप कहलाता है।"1 अक्सर यह देखा जाता है कि सामाजिक संघर्ष एवं विषमता से नैतिक मान्यताओं में परिवर्तन आने लगता है, परस्पर संबंधों में कटुता आने लगती है जिसके परिणामस्वरूप मूल्य विघटन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।


समकालीन समय में भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद संचार क्रांति, पाश्चात्य प्रभाव के कारण व्यक्तिवादी विकास को अत्यधिक प्रोत्साहन मिला है, जिससे स्त्री एवं पुरुष दोनों के मानस पटल में अनेक परिवर्तन हुए हैं। व्यक्ति-स्वातन्त्रय चेतना का प्रसार स्त्रीवर्ग में सुगमता से देखा जा सकता है। "युग की परिवर्तित आवश्यकताओं के अनुरूप स्त्रीमानस में जो परिवर्तन हुआ, उसमें आत्म स्वावलंबन एवं स्व को पहचानने की भावना अंतर्निहित है। आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न नारी ने पुरुष की दासता को अस्वीकार किया है। घर की चार दिवारी से निकलकर उसने सार्वजनिक क्षेत्रों में पदार्पण किया है। राजनीति में भी उसका सहभागी रूप ही अधिक उभरकर आया है। परिवार के साथ-साथ समाज सेवा को भी सहर्ष स्वीकार किया है। नारी स्वातन्त्रय एवं नारी शिक्षा से नैतिक-मूल्यों में परिवर्तन आया है।"2 कहा जा सकता है कि इस बदलाव का प्रमुख कारण स्त्रीमानस में हुए विभिन्न परिवर्तन है क्योंकि बिना मानसिक परिवर्तन के बदलाव संभव नहीं हो सकता है।
 

स्त्री को आधी दुनिया कहे जाने की पीछे वही आदिम मनोवृत्ति है, जिसमें नर एवं मादा दो ध्रुव सत्य हैं। जिनके बिना सृष्टि का संचालन संभव नहीं है। पुरुष की भाँति स्त्री भी एक सामान्य प्राणी है। यह सत्य है कि समय के साथ-साथ पुरुष मानस जिस प्रबलता से परिवर्तित हुआ, उस अनुरूप स्त्रीमानस में परिवर्तन की रफ्त्तार कम रही। यह भी एक कारण रहा कि स्त्री पुरुष की अनुगूंज मात्र बनकर रह गई। पुरुष उसका भाग्य विधाता और जीवननियन्ता बन गया और स्त्री-पुरुष की अनुगामिनी होकर रह गई। कालांतर में शिक्षा के प्रकाश ने स्त्रीमानस को आंदोलित किया। शिक्षा ने स्त्रीमानस को परिष्कृत करने का सार्थक कार्य किया। शिक्षा के प्रकाश से प्रदीप्त, आर्थिक स्वावलंबन की ओर गतिशील स्त्री जो आज हमें दिखाई पड़ती है, उसके पीछे समाज-सुधारकों, राजनेताओं एवं महिला आंदोलनकारियों के सवा सौ वर्ष का रोचक इतिहास है। इस सफल संघर्षमय इतिहास की मुखर अभिव्यक्ति भारतीय संविधान तथा हिन्दू कोड बिल में देखी जा सकती है, जिसे सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों में स्त्री-पुरुष के समानाधिकारों की घोषणा की।
 

समय के साथ स्त्री ने अपने मानवी रूप को समझकर शोषण, दमन, कुंठा इत्यादि का प्रतिकार करना शुरु किया, जिसके परिणामस्वरूप स्त्री का नवीन मानस उभरकर सामने आया जिसमें उसकी विभिन्न प्रतिछवियों की दर्शन हुए। समकालीन हिन्दी उपन्यासों में परिवर्तित स्त्रीमानस का सफल चित्रण किया गया है। स्त्री का यह नवीन स्वरूप अपने अधिकारों को प्राप्त करने की लिए तत्पर दिखाई देता है।

समकालीन हिन्दी उपन्यासों में चित्रित परिवर्तित स्त्रीमानस की विविध प्रवृत्तियों के बीच हमारा ध्यान विशेष रूप से आकर्षित होता है। स्त्री के बहुआयामी स्वरूप का वर्णन जो समकालीन उपन्यासों में मिलता है, उसमें स्त्री के मानसपटल पर अंकित परिवर्तन का पता चलता है। स्त्रीचेतना का जो स्वरूप आज हमें दिखाई देता है, वह उसके मानसिक बदलाव का परिचायक है। नासिरा शर्मा का मानना है कि "नारी-जागृति नारी की मानसिकता में ही निहित है। पिछले पाँच हज़ार सालों में मर्द का व्यक्तित्व उतना नहीं बदला है जितना औरत का। वह बदलाव ही वस्तुतः सामाजिक चेतना को प्रेरित करता है। आज की सचेत और जागरुक औरत परिवार से जुड़कर समाज की लिए कुछ रचनात्मक करना चाहती है।"3 आज की सचेत स्त्री की आकांक्षा को पुष्पित होने की प्रक्रिया जो हम समाज में देखते हैं उसकी मूल प्रवृति स्त्री-मुक्ति में निहित है। परिवार एवं समाज दोनों की लिए कुछ करने की चाह यह स्त्री में हुए बदलाव की सूचना देता है।

 

वर्तमान समय में जो परिवर्तन स्त्री में हुए हैं, उसके लिए केवल एक तथ्य ज़िम्मेदार नहीं है। सामाजिक बदलाव जब होता है तो उसमें मूल्यों का निर्माण एवं विघटन दोनों होता है। यह विघटन जनमानस को प्रभावित करता है। जो परिवर्तन को साथ लेकर आता है। बाज़ारवाद एवं संचार क्रांति के कारण जो सामाजिक परिवर्तन हुए हैं, उसमें स्त्री के लिए एक नवीन वातावरण तैयार हुआ है। यह स्त्री की अस्तित्वबोध की तीव्र आकांक्षा से अनुप्राणित है। स्त्री अब केवल पुरुष की अनुगामिनी नहीं, मार्गदर्शिका भी हुई है। परंपरागत सामाजिक मूल्यों को नकारते हुए स्त्री ने नवीन नैतिक प्रतिमानों को महत्व दिया है। व्यक्ति स्वातन्त्रय की भावना ने स्त्री में क्रान्तिकारी परिवर्तन उपस्थित किए हैं। जिसका आकलन समकालीन हिन्दी उपन्यासों में देखा जा सकता है। इन उपन्यासों में व्यष्टि सत्य को समष्टि-सत्य में घुला देने का सार्थक प्रयास किया गया है। समकालीन उपन्यासों के द्वारा समय की तहों को खोलकर भविष्य की झाँकी दिखाना तभी संभव हो सका है जब उपन्यासकार स्त्री-पुरुष की व्यक्तिवादी एवं समष्टिवादी आकांक्षाओं की पहचान कर सका है। स्त्री के मानसिक परिवर्तन ने समकालीन उपन्यासकारों को स्त्री के विभिन्न स्वरूप को गढ़ने में सहायता प्रदान की है। व्यक्ति स्वातन्त्रय की भावना ने एक ओर सृजनात्मकता को जन्म दिया है तो दूसरी ओर व्यक्ति और समाज के बीच टकराहट भी उत्पन्न हुई है। इस टकराहट ने स्त्री एवं पुरुष दोनों को प्रभावित किया है। लेकिन पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के कारण पुरुष ज्यादा प्रभावित नहीं हो सका। पुरुष की अपेक्षा स्त्री को इस टकराहट से अधिक जूझना पड़ा है।
 

स्त्रीमानस में आए परिवर्तन के कारण उसमें खुलकर जीने की आज़ादी को प्रोत्साहन मिला। वह अपने मनुष्य होने के दायित्व को समझने में सक्षम हो सकी तथा जीवन के रंगमंच पर अपने नये कलेवर में अवतरित हुई है। जीवन संघर्ष वह अपने बूते पर करती हुई नजर आयी तथा परंपरा से विद्रोह उसने निष्कवच होकर किया। परिवर्तनमान समाज के साथ सामंजस्य स्थापित करने की लिए स्त्री निरंतर गतिशील है। इस गतिशीलता में महत्वाकांक्षा और व्यावहारिक जीवन के बीच जो अन्तर्विरोध दृष्टिगोचर होता है वह स्त्री सम्बन्धी परंपरागत मान्यताओं को ध्वस्त करता जा रहा है। भारतीय समाज की संरचना में, "स्त्री की सारी घोषित समानता एवं स्वतंत्रता के बावजूद, कुछ ऐसी मूलभूत विसंगतियाँ हैं, जो उसके अनुभव-विस्तार की सम्भावनाओं को बाधित करती हैं। उनके जीवन में प्रेम, विवाह और गृहस्थ की समस्याएँ आज भी महत्वहीन नहीं हो गयी हैं। पढ़ी-लिखी, नौकरीपेशा और अभिजातवर्गीय स्त्रियाँ भी एक ऐसी अंधी सुरंग में बन्द हैं, जिससे बाहर आने की कसमसाहट और जद्दोजहद ही उनके जीवन की सबसे बड़ी वास्तविकता है।"4 स्त्री की यह वास्तविकता उसकी नियति बनकर रह गयी है, जिसे तोड़ने का प्रयास आज की स्त्री करती नज़र आ रही है। समकालीन हिन्दी उपन्यास भारतीय समाज में स्त्री की केन्द्रिय स्थिति और हैसियत को व्याख्यायित करते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में स्त्री के वैचारिक एवं मानसिक संघर्ष के आयाम को रूपायित करने का प्रयास इन उपन्यासों में सफलतापूर्वक हुआ है।
 

समकालीन उपन्यासों में ऐसी नायिकाओं का चित्रण हुआ है, जो अपने व्यक्तित्व के आधार पर नयापन स्वीकार करती चलती है। बदलती हुई परिस्थितियों में मानसिक परिवर्तन के कारण स्त्रियों का विद्रोही रूप इन उपन्यासों में दिखाई देता है। 'छिन्नमस्ता' की प्रिया, ‘अनाम प्रसंग’ की ममता, ‘कठगुलाब’ की असीमा, ‘आवां’ की नमिता, स्मिता, ‘दिलो-दानिश’ की छुन्ना बीबी, ‘चाक’ की सारंग, 'हमारा शहर उस बरस’ की श्रुति, ‘एक और पंचवटी’ की साध्वी में इस मानसिक परिवर्तन का आकलन किया जा सकता है। इन नायिकाओं में परिस्थितियों से जूझने की शक्ति है। उनमें संघर्ष का भाव है। अब वह आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से अग्रसर हैं। दुःखों के पारावार से आहत स्त्री ने अपने साहस को बटोरकर इसे लांघा है तथा अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दिया है। वह नैसर्गिक प्रक्रिया स्वीकार कर आधुनिकता बोध से संपन्न वैचारिकता का समर्थन करने लगी है। समाज की थोथी आरोपित मान्यताएँ हिल उठीं और स्त्री ने आत्मनिर्भर होकर अपनी जागरूकता का प्रमाण दिया है। मोतीलाल गुप्ता के अनुसार "आधुनिक सभ्यता के परिणामस्वरूप लोगों की विचारों, भावनाओं, आदर्शों, मूल्यों एवं अभिवृत्तियों में द्रुतगति से परिवर्तन आ रहे हैं। ये परिवर्तन धीरे-धीरे लोगों के व्यवहार, आचरण अथवा उनकी क्रियाओं में परिवर्तन लाने के आधार बन जाते हैं।"5

 

आज की स्त्री समाज में अपना अधिकार उतना ही पाना चाहती है, जितना की पुरुषों को प्राप्त है। इसकी लिए वह निरंतर प्रयासरत भी है। वह अपने को हेय या थाती के रूप में नहीं मानती। वह स्वयं को पुरुष के समकक्ष मानती है। अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व की परिस्थापना की लिए जो संघर्ष उसने किया है, उसके पीछे स्त्री की मानसिकता पुरुषवादी सोच से मुक्त होने को ही है। समाज और परिवार की ओर से उसे हताश करने की लिए निरंतर प्रहार होते रहते हैं लेकिन स्त्री हताश न होकर सतत् रूप से अपने प्रगति के पथ पर अग्रसर है। आज नारी समानता के भाव से बढ़ रही है और व्यक्तित्व के प्रति सजग है, जो परंपरागत सामाजिकता से मेल नहीं खाती। यह अन्तर्विरोधी तत्व है, "जिनके लिए उदार-संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है ताकि उसके भावों को अनुप्राणित किया जा सके और आधुनिकता तथा प्राचीनता का समन्वय हो सके और परिवार की स्नेहिल छाया में अपने सहज विकास के साथ सरल-तरल भाव बनाए बढ़ती जाए, बढ़ती चली जाए। अपने को चौखट में जड़ा हुआ अनुभव न करे, क्योंकि नैतिक आग्रहों में बन्दी नारी उत्सर्ग कर के भी अपरिपूर्ण रह जाती है।"6 निश्चित तौर पर यह कहना आवश्यक है कि नैतिकता के बंधनों में बंधकर स्त्री का संपूर्ण विकास हो यह संभव नहीं हो सकता है। वैसे भी विकास और बंधन एक साथ नहीं चला करते। आज स्त्री ने जिस बदलाव को चुना है, वह अहितकारी नहीं है। संपूर्ण समाज की लिए हितकारी है।
 

लेखक की युग-द्रष्टा होने मंे कोई संदेह नहीं, परंतु यह भी सत्य है कि युगीन परिस्थितियों से लेखक की कृति प्रभावित होती है। समकालीन उपन्यासकारों ने युग-वाणी को अपनी कृतियों में मुखरित करने का प्रयास किया है। समाज की जटिल से जटिल समस्या को तथा उससे उत्पन्न विभिन्न हलचलों को समकालीन उपन्यास में परिलक्षित किया जा सकता है। चित्रा मुद्गल की उपन्यास ‘आवां’ की स्त्रीपात्र ‘स्मिता’ और ‘गौतमी’ की उपकथाएं मूल रूप से ‘बोल्ड और मिलीटैंट फेमीनिज्म’ के प्रभावशाली उदाहरण के रूप में व्याख्यायित किये जा सकते हैं। अपने दैहिक सुख एवं यौन तृप्ति की प्राप्ति की लिए ये पुरुषों की समान अखेटक भी हैं। समकालीन उपन्यासों में स्मिता एवं गौतमी जैसे पात्रों की कमी नहीं है और ये पात्रकेवल कल्पना से उपजे नहीं हैं। इन पात्रों की परिस्थितियाँ चाहे जो भी हो लेकिन मानसिकता का मेल आपस मंे हो जाता है। इस संदर्भ में वर्षा और दिव्या ;मुझे चाँद चाहिए, असीमा ;कठगुलाब,शीरी और प्रिया ;मछली मरी हुई, तारा झावेरी ;कुरु-कुरु स्वाहा, मनिषा ;उसके हिस्से की धूप इत्यादि स्त्रीपात्रों को देखा जा सकता है। ये ऐसे स्त्रीपात्र हैं जिन्होंने बदलाव को सहजता से स्वीकारा है। इन स्त्री पात्रों की मानसिकता उस प्राचीन स्त्री के साँचे में ढाले जाने की घोर विरोधी है जो पुरुष प्रधन समाज में स्त्रियों की लिए निर्धारित किए गये हैं।
 

समाज में जो मूल्य पहले से चले आ रहे थे उसे अस्वीकार करने वाली स्त्रीको कलंकित होना पड़ता था। आधुनिक युग में स्त्रीने अपने देखने की जहाँ कई दृष्टि अपनाई वहाँ पुरुष ने भी स्त्रीको स्वतंत्रा इकाई की रूप में स्वीकार करना शुरु कर दिया है। समकालीन उपन्यासकारों ने, स्त्रीपुरुष कीस्त्रीकी प्रति एवं स्त्रीकी स्वयं के प्रति दृष्टिकोण में जो परिवर्तन आया, उसे उजागर करने का प्रयास किया है। ‘करवट’ में देशदीपक सोचता है, “इस बेचारी का क्या दोष, इसका पति दो-तीन वर्षों से घर नहीं आया। उसने तो शायद बम्बई मेें काम-पिपासा बुझाने की लिए वहाँ कोई स्थायी या अस्थायी प्रबंध भी कर लिया हो और इधर जिस मुहल्ले मंे खट्टर जैसे दुश्चरित्र युवक रहते हैं, वहाँ की वातावरण में स्त्री-पुरुषों की अवैध नातों की कमी न हो और जहाँ अधभूखे सन्त्रस्त लोग अपने भीतर की अनबुझी पीड़ावश दूसरों को सदा पीड़ा पहुँचाने की ताक में ही लगे रहते हों, वहाँ इस युवती को ही अकेले दोषी क्यों माना जा सकता है।”7 इस तरह की सहानुभूति स्त्रियों के प्रति जो पुरुषों में देखी जा सकती है उसकी पीछे नई दृष्टि से स्थितियों को देखने की क्षमता सबलता पूर्वक कार्यरत है। परिवर्तित दृष्टि से उत्पन्न इस नए वातावरण में उस चिन्तन का कहीं अधिक महत्व है, जो स्त्रीद्वारा स्वयं अपने विचारों मंे नयापन लाकर सम्भव बनाया गया है।
 

समकालीन उपन्यासों में स्त्रीको समग्र व्यक्ति के रूप मंे देखने का प्रयास किया गया है। व्यक्ति इकाई की यह अवधरणा एक विशेष अर्थ में सामाजिक संदर्भ से अलग स्वतंत्र अस्तित्व रखती है, जिसकी मूल में स्वातन्त्रयोत्तर काल में प्रभावशाली रूप मंे फैलने वाली विचारधाराएँ हैं। मनोविश्लेषणवाद, अस्तित्ववाद आदि विचारधाराओं ने ही नहीं बल्कि आध्ुनिकता की प्रभाव में भारत में विकसित विचार आन्दोलन ने भी इस नए परिवेश को जन्म दिया है। “बीसवीं शताब्दी बीतते-बीतते व्यक्ति और व्यक्ति मूल्यों का प्रभाव व्यापक धरातल पर दिखाई देने लगा। वही प्रभाव इक्कीसवीं शताब्दी की व्यक्ति को परिचालित करने की तैयारी कर चुका है।”8 अर्थात् इस नवीन परिवेश मंे जो दृष्टि स्त्री-पुरुषों की विकसित हुई है वह कई आन्दोलनों एवं वैचारिक क्रांति की देन है। इस क्रांति ने व्यक्ति मानस को कई प्रकार से उद्वेलित किया जिसने उसकी चेतना में नवीन रक्त संचार किया फलतः जनमानस में परिवर्तन होने लगा। जिससे स्त्रीभी अछूती न रह सकी। इस मानस परिवर्तन की कारण स्त्रीको कई प्रकार से प्रताडि़त भी किया गया। स्त्रीकी मानसिकता में जो बदलाव हुए जिसकी कारण वह परिवार समाज में प्रताडि़त हुई उसका वर्णन समकालीन हिन्दी उपन्यासों में देखा जा सकता है। ‘धरती धन न अपना’, ‘काला जल’, ‘सूखा बरगद’, ‘शाल्मली’, ‘चाक’, ‘अर्धनारीश्वर’, ‘अकेला पलाश’, ‘आवां’ इत्यादि में स्त्रीकी मनोव्यथा का वर्णन देखने को मिलता है। यह मनोव्यथा उसे सामाजिक विकृतियों के कारण ही झेलनी पड़ती है।
 

समकालीन उपन्यास में स्त्री के हरेक दिशा मंे हुए मानसिक परिवर्तन का चित्रण मिलता है। समकालीन उपन्यासकारों में कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने स्त्री स्वतंत्रता के भिन्न पक्ष को छुआ है, वह है, स्वयं स्त्री द्वारा स्वाधीनता और उच्छृंखलता को सार्थक मानकर सारी सीमाएँ लाँघ जाना और अपनी स्वाधीनता की रक्षा के नाम पर पति, परिवार, समाज को अवांछित ढंग से भयभीत करने की कोशिश करना। “स्वतंत्रता का तात्पर्य एकान्तिक रूप से बन्धन मुक्ति नहीं होता, बल्कि उन बंधनों से मुक्ति होता है जो जीवन की मौलिक स्वाभाविकता और व्यक्तित्व की विकास मंे बाधक बनते हैं। स्वतंत्रता अपनी मुक्ति की साथ दूसरों की मुक्ति का भी सम्मान करती है और यह अनजाने ही उन बन्धनों को मान लेती है, जो दूसरों की न्यायोचित अधिकारों का हनन करते हों। यह दशा अधिकारों के साथ कत्र्तव्य बोध प्रदान करती है। स्त्री जहाँ भी स्वतंत्रता और मुक्ति के इस अर्थ को भूलती है, वहीं वह अपने और समाज कीलिए अनेक समस्याएँ पैदा करती हैं।”9 इस संदर्भ में विष्णु प्रभाकर की सामाजिक दर्शन प्रधन उपन्यास ‘अर्धनारीश्वर’ में इसी संकट को इन शब्दों मंे प्रकट किया गया है -“मैं उँचे पद पर हूँ, पूरी स्वतन्त्रता है मुझे। परन्तु क्या आप नहीं मानेंगी कि स्वतंत्रता बिना विश्वास के अभिशाप है? क्या आप आधुनिक समाज में उस स्वतंत्रता का रूप नहीं देख रही हैं? क्या आधुनिक शिक्षा ने नारी को स्वाभिमानिनी की स्थान पर अहंकारी नहीं बना दिया? सहनशक्ति का अर्थ अत्याचार नहीं है, पर उसकी स्थान पर क्या तुनकमिजाज होना पसंद करेंगी आप? नम्रता एक सकारात्मक गुण है। आज नारी उसे अपमान समझती है और उसकी स्थान पर अकड़ से भर उठी है और जो स्वच्छंदता प्रिय हैं वे आत्मदाह और तलाक की धमकी भी देती हैं। सैक्स इमेज को ही वे नारी स्वतंत्रता समझती हैं।”10
 

झूला नट’ मैत्रेयी पुष्पा द्वारा रचित उपन्यास है। ‘शीलो’ इस उपन्यास की नायिका है। वह परंपरा तथा पराधीनता की समस्या से गुजरती है। शीलो की सास एक ऐसी स्त्रीपात्र है जो कहीं-कहीं परंपरा मुक्त अवश्य दिखती है लेकिन वह परंपरावादी ही अधिक है। शीलो परंपरामुक्त अवश्य है। उसका अपने हिसाब से चलना उसकी परिष्कृत मानस का परिचायक है। देवर से अंतरंग संबंध बनाकर भी उससे विवाह नहीं करना चाहती क्योंकि उसके विचार में परंपरा से विवाह होने पर उसे कुछ हासिल नहीं हुए। सुमेर उसे ब्याहकर अवश्य लाता है लेकिन उसकी रूप रंग को देखकर त्याग कर चला जाता है। लेकिन समाज परिवार ने वुफछ नहीं किया। वह अपनी सास से कहती है परंपरा की आड़ मंे सब बकवास है। शीलो सामाजिक व्यवस्था की उपेक्षा करती है। वह पुनर्विवाह के खिलाफ समाज आस-पड़ोस तथा जाति-बिरादरी के नियमों का खंडन करती है। उसे किसी की परवाह नहीं। वह सामाजिक तथा जाति के नियम ठुकराकर अपने देवर के साथ रहती है। शीलो जैसी स्त्रीको देखते हुए कहना उचित होगा कि “बदलते सामाजिक परिवेश में नारी ने स्वयं को एक स्वतंत्र इकाई की रूप में घोषित किया है। अपने स्वतंत्र अस्तित्व तथा अस्मिता के प्रति सचेत होकर नारी पुरुष की समकक्षता प्राप्त करने लगी है। जीवन के सभी कर्म-क्षेत्रों में आगे बढ़कर उसने परम्परागत अबला नारी के मूल्य के स्थान पर सबला नारी के मूल्य की स्थापना कर दिखाई। समसामयिक नारी अपने कार्य व्यवहार एवं वैचारिक चिन्तन में नई मानसिकता लिए हुए है। परम्पराओं की सारहीन सन्दर्भ उसे मान्य नहीं।”11
 

स्त्रीमानस में हुए परिवर्तन का असर वर्तमान समय में सबसे अध्कि विवाह संबंध पर देखने को मिलता है। इस संबंध मंे सभी तरह की स्त्री मौजूद हैं। ये स्त्रियाँ जिनकी संख्या ज्यादा है वे अपने परिवार को बचाने की पक्ष में होती है लेकिन पति एवं परिवार की ज्यादती को ज्यादा सहन भी नहीं करती हैं। स्त्रीका दूसरा रूप इस संबंध मंे भी हर तरह की स्वच्छंदता पाना चाहती है। वह पुरुष जितनी ही स्वतंत्रता इस संबंध सूत्रा में भी रखने की हिमायती है। तीसरे रूप मंे वे स्त्रियाँ हैं जो परंपरा के अनुसार चलती हैं लेकिन तथ्यों का आकलन आध्ुनिक संदर्भ में करते हुए। जैसे पहले की परंपरागत स्त्रीपति का नाम तक नहीं लेती थी। लेकिन अब जो स्त्रीहै वे बदलाव की रूप में ऐसे बहुत सारे मानदंड को छोड़ चुकी हैं। जो विवाह बंधन में बंधने कक बाद उन्हें अनिवार्य रूप से मानने होते थे। वैवाहिक संबंध में आये परिवर्तन विस्फोटक रूप में हमें देखने को मिलते हैं जिसमें अकेले स्त्रीदोषी नहीं होती। समकालीन उपन्यासकारों ने इस संदर्भ का विश्लेषण बहुत ही तल्लीनता से किया है। जिसमें स्त्रीमानस की विभिन्न परिवर्तन से हुए हानि-लाभ का अवलोकन किया जा सकता है। कमलेश्वर, प्रभा खेतान, गिरिराज किशोर, राजेन्द्र यादव, मैत्रेयी पुष्पा, कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, रविन्द्र कालिया, नमिता सिंह, सूर्यबाला इत्यादि उपन्यासकारों के उपन्यास इस संदर्भ मंे द्रष्टव्य है। लक्ष्मी सागर वाष्र्णेय की शब्दों में “उपन्यास साहित्य ने नये साँचे में ढले नर-नारी प्रस्तुत कर विधाता की सर्वकर्तृत्व की समकक्षता की है। मध्यवर्गीय समाज की पीठिका में वह अधोगति, कूप-मंडूकता और अन्धविश्वास के प्रति विद्रोह का साक्षात प्रतीक और भावी मानव जाति का भाग्य विधाता बना।”12
 

समकालीन हिन्दी उपन्यासों में स्त्री-पुरुष संबंधों के नये आयामों को कुशल अभिव्यक्ति मिली है। स्त्रीको सतीत्व व देवी की कटघरे से निकालकर मानवी रूप मंे चित्रित करने का प्रयास यहाँ प्रमुखता से हुआ है। इन उपन्यासों के चरित्र विन्यास बिल्कुल वैसे ही होते हैं जैसा कि समाज मंे हम देखते हैं। इन उपन्यासों की स्त्रीजीवंत कल्पना की उपज है, जिनका प्रेरणा स्रोत समाज है। पुरुष स्वेच्छाचारिता के परिणामस्वरूप स्त्रीमानस मंे कई प्रकार के परिवर्तन हुए। स्त्रीको कीवल उपभोग की वस्तु बनकर रहना मंजूर नहीं। वह अपने जीवन की सार्थकता को पाना चाहती है। ‘चाक’ उपन्यास की सारंग नैनी, ‘अल्मा कबूतरी’ की अल्मा, ‘अर्धनारीश्वर’ की श्यामला, ‘पीली आँधी’ की सोमा, ‘दिलो-दानिश’ की कुटुंब प्यारी, ‘एक ज़मीन अपनी’ की अंकिता ये ऐसे स्त्रीपात्र हैं जो विवाह के पश्चात स्त्रीजीवन की सार्थकता को पाना चाहती है। लेकिन जब पुरुष उसे केवल अपने हाथों की कठपुतली बनाकर रखने का प्रयास करता है एवं अपनी स्वेच्छाचारिता के सामने उसे झुकाना चाहता है तो वह बर्दाश्त नहीं करती। एक ज़मीन अपनी की अंकिता कहती है -“मुझे तुमसे घृणा है... घृणा... तुम्हारी अय्याशियों और ज्यादतियों को सती-साध्वी बनी मांग में सजाए झेलती जाना... इस मुगालते में मत रहना कि मैं स्त्रीत्व की पूर्णता के भ्रम में जीती रहूँगी... लो, इस वक्त यह रिश्ता खत्म। उसने अपनी कलाईयों की चूडि़याँ झन्न से फर्श पर उछाल दी थी और पैरों की बिछुए लोढ़़े से कुचल दिए थे।”13 इस घटना की बाद अंकिता में जो मानसिक बदलाव होता है वह वैवाहिक जीवन की असफलता है। यही कारण है कि वह दुबारा इस बंधन मंे बँधना नहीं चाहती स्वतंत्रता की साथ नौकरी करके जीवनयापन करती है।
 

स्त्री-पुरुष के मतभेद जब अत्यधिक बढ़ते हैं तो वैवाहिक संबंध खत्म होने की कगार पर पहुँच जाते हैं। कोई भी पति समाज में स्त्रीको उसके नियमों की हिसाब से चलते रहने से ही खुश होता है। जैसे ही स्त्रीसभी संहिताओं को तोड़ती है अपने हक की लिए सजग होती है तो पति ही क्या पूरा समाज भी सहन नहीं कर पाता और उस स्त्रीकी विरुद्व होकर उसे भला-बुरा कहने लगता है। स्त्रीअगर इन सभी का परवाह करती है तो अपने अस्तित्व को खो देती है और अगर बेपरवाह रहे तो कुलटा कहलाती है। ‘चाक’ उपन्यास की सारंग नैनी की द्वारा से मैत्रेयी पुष्पा ने इस कटु सत्य को उजागर करने का प्रयास किया है। ‘दिलो-दानिश’ की छुन्ना बीबी की माध्यम से कृष्णा सोबती ने इसी सत्य को उभारा गया है। समकालीन उपन्यास में ऐसे अनेक स्त्री पात्र हैं जो इस सच्चाई की ओर हमारा ध्यान खींचती हैं। पुरुष वर्चस्ववादी समाज स्त्री को अधीनस्थ बनाये रखने का पक्षपाती है। सारी दुनिया में स्त्री को अधीनस्थ रहने की लिए बाध्य किया जाता है। इस व्यवस्था मंे स्त्री वस्तु मात्र बनकर रह जाती है। उसकी स्वतंत्रता कोई मायने नहीं रखती। प्रभा खेतान के उपन्यास ‘आओ पेपे घर चलें’ की एक पात्र आइलिन कहती है - “औरत कहाँ नहीं रोती और कब नहीं रोती, वह जितना भी रोती उतनी ही औरत हो जाती है।”14 औरत का औरत होना बुरा नहीं है बुराई तो उसकी औरत होने की सज़ा दिए जाने में है। समकालीन उपन्यास का मुख्य उद्देश्य इसी सत्य को उद्घाटित करने में है।
 

कहा जा सकता है कि स्त्री मानसिकता में जो बदलाव हुए हैं उसने स्त्री की स्थिति को सुधारा है। इससे स्त्री को एक नया आयाम मिला है जहाँ वह अपने स्व को स्वीकार सकती है। स्त्रीऔर पुरुष की मानसिक भिन्नता का अनेक प्रकार से विश्लेषण करने पर यह तथ्य सामने आता है कि स्त्रीकी मानसिकता उसकी शारीरिक संरचना-विशेष की कारण ही पुरुष से भिन्न है। सामाजिक परिवेश, पारिवारिक तथा व्यक्तिगत परिस्थितियाँ संस्कार और मूल्य, सब मिलकर स्त्रीमानसिकता को निर्मित करते हैं। जन्म से शैशवा अवस्था तक पुरुष-स्त्रीकी मानसिकता में कोई विशेष अंतर नहीं होता है। सिमोन दि बोउवार मानती हैं कि “कोई भी शारीरिक, आर्थिक और मानसिक कारण नारी की पुरुष से भिन्न मानसिकता को जन्म नहीं देते। हमारी सभ्यता, संस्कृति और समाजीकरण की प्रक्रिया ही स्त्रीऔर पुरुष की मानसिकता में आधरभूत अंतर ला देती है।”15 सामाजिक संरचना ही ऐसी है जिसमंे स्त्रीको घर की भीतर एवं पुरुष को घर की बाहर रहने का प्रोत्साहन मिलता है। इसलिए उनका लालन-पालन भी उसी अनुरूप होता है। जिसका प्रभाव स्त्रीएवं पुरुष दोनों की मानसिकता पर पड़ता है जो उसके व्यक्तित्व विकास में सहायक होते हैं।
 

बदलते समय मंे कई प्रकार के बदलाव हुए हैं जिसने सामाजिक, पारिवारिक मान्यताओं में बदल करके फिर से नए मूल्यों को प्रोत्साहन दिया है। इससे स्त्रीकी मानसिक स्थिति में भी कई प्रकार की परिवर्तन हुए हैं। स्त्रीकी मानसिक परिवर्तन के लिए विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ भी जिम्मेदार रही हैं। कुल मिलाकर स्त्रीने परिवर्तन को स्वीकार कर स्वयं को साबित करने का प्रयास किया है। जिससे समाज मंे कई पुराने मूल्य ध्वस्त हुए हैं तो कई नवीन मूल्यों की प्रतिस्थापना हुई है। जिसे पुरुषों द्वारा भी स्वीकार किया गया है एवं पुरुषों द्वारा स्त्रीको प्रोत्साहन भी मिला है। लेकिन यह परिवर्तन संपूर्ण समाज मंे फिलहाल नहीं दिखाई दे रहा है। लेकिन शनैः शनैः इसका प्रसार चैतरफा अवश्य हो रहा है। यह उस अंकुरण के समान है जो शुरु तो मात्र दो पत्तियों से होता है और एक दिन विशाल छायादार वृक्ष मंे तब्दील हो जाता है।
 

हिन्दी साहित्य मंे समकालीन उपन्यास जगत मंे जितना सटीक वर्णन स्त्रीमानसिकता में आए बदलाव एवं इससे उत्पन्न परिस्थितियों एवं समस्याओं का है वैसा अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। स्त्री अपनी समग्रता मंे यहाँ चित्रित दिखाई देती है। उसके सभी रूप इन उपन्यासों में मौजूद हैं। समकालीन हिन्दी उपन्यासों को पढ़कर स्त्रीमानसिकता मंे हुए परिवर्तन की कारण एवं परिणामों की समुचित व्याख्या की जा सकती है। इस संदर्भ मंे समकालीन हिन्दी उपन्यासों कीस्त्री पात्र बहुत उपयोगी जान पड़ते हैं।


संदर्भ सूची-

1.    हिन्दी उपन्यास: सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया और स्वरूप - प्रभा वर्मा, संस्करण-1990, पृ. 342.
2.    वही, पृ. 344.
3.    स्त्रीकी दुनिया- मध्ुारेश, संस्करण-2015, पृ. 22.
4.    वही, पृ. 32.
5.    हिन्दी उपन्यास: सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया और स्वरूप - प्रभा वर्मा, संस्करण-1990, पृ. 279.
6.    स्वातन्त्रयोत्तर हिन्दी उपन्यास साहित्य की समाजशास्त्रीय पृष्ठभूमि - डाॅ. स्वर्ण लता, संस्करण-1975, पृ. 47.
7.    करवट - अमृत लाल नागर, संस्करण-1994, पृ. 309.
8.    समकालीन हिन्दी उपन्यास: समय से साक्षात्कार - डाॅ. एलाडबम विजय लक्ष्मी, संस्करण-2006, पृ. 79
9.    वही, पृ. 87.
10.    अर्धनारीश्वर -विष्णु प्रभाकर, संस्करण-1997, पृ. 95.
11.    साठोत्तरी हिन्दी मुस्लिम उपन्यासकार- डाॅ. दिलशाद जीलानी, प्रथम संस्करण-1998, पृ. 12.
12.    हिन्दी उपन्यास की उपलब्ध्यिाँ - डाॅ. लक्ष्मी सागर वाष्र्णेय, संस्करण-1970, पृ. 11.
13.    एक ज़मीन अपनी - चित्रा मुद्गल, संस्करण-1990, पृ. 51.
14.    आओ पेपे घर चलें - प्रभा खेतान, संस्करण-1990, पृ. 116-117.
15.    द सेकिंड सेक्स - सिमोन द बोउवार, संस्करण-1983, पृ. 295


- रवि रंजन कुमार ठाकुर
 
रचनाकार परिचय
रवि रंजन कुमार ठाकुर

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