प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़ास-मुलाक़ात

हमें विरासत में प्राप्त हुई है गुटबाजी- श्याम त्रिपाठी
 


'कोशिश करने वालों की हार नहीं होती' इस प्रसिद्ध पंक्ति को अपनी प्रेरक शक्ति बनाकर जीवन के जाने कितने ही बीहड़ों को सकुशल पार किया है श्याम त्रिपाठी जी ने। माता-पिता के स्नेहिल मार्गदर्शन से वंचित एकाकी बचपन ने अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त किया। अथक परिश्रम और कठोर अनुशासन से शिक्षा को अपना सहचर बना लिया और इसी के आलोक में आप जीवन पथ पर निरंतर आगे बढ़ते चले गए। दिल्ली के दयाल सिंह विश्वविद्यालय में कुछ वर्षों तक आपने अंग्रेजी का अध्यापन किया। साथ ही भारत के अमेरिकी दूतावास में हिन्दी शिक्षण कार्य में भी संलग्न रहे। तत्पश्चात इंग्लैंड आ गए और पाँच वर्षों तक गुयाना, सूरीनाम और त्रिनिदाद में अध्यापन कार्य करते हुए 1975 में टोरंटो (कनाडा) आकर बस गए। 'हिन्दी-चेतना' त्रैमासिक पत्रिका से जुड़ने के बाद आपने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित भाव से कार्य करना शुरू कर दिया और आज तक प्रण-प्राण से इस पुण्य कर्म में लगे हैं। साथ ही आप कनाडा में भारतीयों द्वारा स्थापित मंदिरों में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करवाते हैं। बुक क्लब की स्थापना करके हिन्दी भाषा और साहित्य की पुस्तकों से प्रवासी भारतीय बच्चों को निज भाषा व संस्कृति से परिचित कराने में सन्नद्ध हैं। इस बातचीत में श्याम त्रिपाठी जी की सहृदयता से परिचित हुई और आत्मीयता से अभिभूत। आशा है कि यह बातचीत परदेस में मातृभाषा की अलख जगाने वाले इस एकांत साधक के कृतित्व व व्यक्तित्व से पूर्णतः नहीं तो अंशतः ही सही, आप सुधिजनों को परिचित कराएगी- सुमन सिंह


डॉ. सुमन- अपनी अन्तस् की सृजनात्मकता से पहला परिचय कब हुआ?
श्याम त्रिपाठी जी- यूँ तो बाल्याकाल से ही गाँव के लोक गीत, विशेषकर होली के उपलक्ष पर 'होली के गीत' और विवाह के अवसर पर बारातियों को जो सुंदर गालियाँ सुनाई जाती थीं, उन्हें सुनकर बड़ा आनन्द आता था। इसके अतिरिक्त गाँव के कुछ अनपढ़ लोग जब कुंए पर स्नान करते हुए कुछ कवित्त सुनाया करते थे, जिसकी अंतिम पंक्ति में उनका नाम होता था। इन सब अनगढ़ गीतों व कवित्तों में तो साहित्यिक कुछ नहीं था। युवावस्था में कॉलेज में विशेष अवसरों पर अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता में भाग लेता था। मेरे कुछ सहपाठी अंग्रेज़ी कवियों की कविताएँ हिन्दी में अनुवाद करते थे और अपने ग्रुप में सुनाते थे, उनसे मैं बहुत प्रभावित हुआ। हर वर्ष बरेली कॉलेज में एक कवि सम्मेलन आयोजित करने की प्रथा थी। कवि श्याम नारायण पाण्डेय, हरिवंश राय बच्चन, निरंकार देव व तत्कालीन तरुण कवि गोपाल दास नीरज जी के गीतों को सुनकर मेरी सोयी हुयी आत्मा जाग पड़ी। विशेषकर बच्चन जी की 'मधुशाला' ने मुझे इस ओर प्रेरित किया। कॉलेज की मैग़जीन में कुछ न कुछ अवश्य लिखता था। उन्हीं दिनों की स्मृतियाँ मानस पटल पर ऐसी अंकित हो गयीं कि मैं थोड़ा बहुत लिखने लगा। इंग्लैण्ड में नेहरू सेंटर में कभी-कभी गोष्ठियों में भी भाग लिया करता और कुछ न कुछ तुकबन्दी कर लेता था। वास्तविक रूप से 1975 में जब कैनेडा में आया और यहाँ पर कुछ भारतीय जो उतरप्रदेश के निवासी थे और वे समय-समय पर किसी न किसी के घर में अपनी रचनाएं पढ़ा करते थे। विशेषकर होली-दिवाली, दशहरा व नव वर्ष पर। इनमें अधिकाँश लोग हिन्दी में ही बातचीत करते थे और कविताएँ पढ़ते थे। उन्हीं दिनों पहली बार  1980 में टोरंटो के एक हाई स्कूल जिसे 'लैमरू क्लिजियट' कहते हैं, एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें कुछ कवि कैनेडा से थे और कुछ लोग अमेरिका से आये थे। इसके संचालन का भार मुझे सौंपा गया। मुझे प्रतिभागी कवि और कवयित्रियों के परिचय पर कुछ शब्द कहने थे। ये शब्द मैंने कविता के रूप में प्रस्तुत किये। जो सभी लोगों को बहुत ही प्रिय लगे। बस यही वह दिन था, जब मुझे लगा कि मैं भी कुछ कर सकता हूँ। वहीं पर मेरी भेंट कैनेडा के महाकवि हरिशंकर आदेश जी से हुई, जिनके सम्पर्क से मुझे कविता लिखने की प्रेरणा मिली। इसके बाद 'हिन्दी चेतना' का प्रकाशन वास्तव में ठोस कदम था।

डॉ. सुमन- पहली प्रकाशित रचना कौनसी थी, जिसने आपको आगामी सृजन के लिए प्रेरित किया?
श्याम त्रिपाठी जी- मेरी पहली रचना थी 'आज के नवयुवक' जो 'काव्य किन्जल' नामक पुस्तक में कैनेडा से प्रकाशित ह्ई थी। यही कविता महाकवि आदेश जी के स्थान पर  एक कवि गोष्ठी में सुनायी थी। इसके बाद अनेक कवि गोष्ठियों में उनका संचालन करने का अवसर मिला और हर अवसर पर एक कविता सुनाने का मौक़ा मिला।

डॉ. सुमन- क्या प्रारम्भिक परिवेश लेखन कर्म में सहायक था?
श्याम त्रिपाठी जी- इसमें कोई संदेह नहीं है कि आगे चलकर यह काव्य-गोष्ठियाँ बहुत सहायक सिद्ध हुईं। विशेषकर कवि सम्मेलनों में नयी-नयी रचनाएं लिखने और उन्हें प्रस्तुत करने की इच्छा प्रबल होती जाती है। यदि कवि की कविता श्रोता ध्यान से सुनते हैं और तालियों से उसकी प्रशंसा करते हैं तो अंग्रेज़ी भाषा का अध्यापक होने के नाते मुझे गर्व है कि मैंने जिस स्कूल या कॉलेज में पढाया, वहाँ 'एक लंच पोएट्री क्लब' की स्थापना की और नये-नये विद्यार्थियों को कविता के प्रति प्रेरित किया और वर्ष के अंत में विद्यार्थियों के सहयोग से कविता का संकलन प्रकाशित करना। जिनमें अधिकतर प्रवासी विद्यार्थियों की रचनाएं थीं। इस गतिविधि के कारण ही मैं रिटायर होने के बाद 'हिन्दी चेतना' के विषय में सोच सका।

डॉ. सुमन- प्रवासवास का संयोग कैसे घटित हुआ?
श्याम त्रिपाठी जी- बरेली कालिज से एम.ए .अंग्रेज़ी में पास करके  मैं नौकरी की तलाश में दिल्ली चला गया | सच में दिल्ली मेरे लिए लन्दन और टोरंटो से कम नहीं है | वहां पर  यूपी वालों के साथ असमानता और पक्षपात की भावना से टकराना होता है | विशेषकर सेवा के क्षेत्र में | मैं कुर्ता -पैजामा पहननेवाला  किस प्रकार अंग्रेज़ी का शिक्षक बन सकता | खैर ! कैम्प कालिज में मुझे अपने साहस के बूते पर रात्रि के कालिज में अंग्रेज़ी पढाने का अवसर मिल गया | किन्तु मैं संतुष्ट नहीं था | स्टाफ के लोगों का व्यवहार  ... उसी समय मुझे अमेरिकन दूतावास में अमेरिकन लोगों को हिन्दी पढाने की नौकरी मिल गयी | वहाँ अध्यापन  करने से मेरी अंग्रेज़ी अच्छी हो गयी | मुझे  मेरे अमेरिकन मित्रों ने मुझे विदेश के बारे में विकास की आशा दी और उन्ही के सहयोग और प्रेरणा ने  मुझे प्रवास इंग्लैण्ड पहुंचा दिया |

डॉ. सुमन- प्रवासवास ने आपकी रचनात्मक गतिविधियों को बाधित किया या कि नए आयाम दिए?
श्याम त्रिपाठी जी ---  प्रवासी जीवन बहुत ही संघर्षमय रहा | दस  वर्ष इंग्लैण्ड में  एकाकी जीवन और रंग -भेद की अमानुषिक यंत्रणाओं से पीड़ित रहा।रोटी कपड़ा और मकान आदि के सरंजाम जुटाने के फेर में लेखिनी थम गयी |  केवल एक-दो पत्र तक हिन्दी भाषा सीमित हो गयी | हिंदी भाषा से ऎसी विरक्ति हो गयी कि कोई भी  हिन्दी बोलने वाला ही नहीं मिल पाता था ।स्थानीय पुस्तकालयों में हिन्दी की कोई  पुस्तक नहीं थी । मेरा भारत में अपने परिवार का कोइ सदस्य न होने के कारण  सम्बन्ध बिलकुल कट सा गया | किन्तु  कैनेडा में आने के बाद मुझे ऐसा लगा कि मैं भारत के उत्तर प्रदेश में आ गया | मुझे  हिन्दी भाषा के प्रति वास्तविक प्रगाढ़ता की अनुभूति तभी हुयी जब देश और भाषा से दूर हुआ।

डॉ. सुमन- आपने गुयाना ,सूरीनाम और त्रिनिदाद आदि देशों की विभिन्न संस्थाओं में काम किया है ,यहाँ से मिले अनुभवों ने निश्चित रूप से आपके जीवन को समृद्ध किया होगा, इन जीवनानुभवों में से कुछ ख़ास अनुभवों से हमें भी परिचित कराइये ?
श्याम त्रिपाठी जी- गयाना ,त्रिनीडाड -सूरीनाम का जन जीवन बहुत ही विलासितापूर्ण था | वहां के लोग 'खाओ पियो और मौज करो ' की विचारधारा के थे | मैं तरुणवस्था में था। वहां का समाज बड़ा ही मस्त मौला है | सभी जाति  और धर्म के लोग एक साथ रहते हैं | हिन्दू -मुस्लिम और अफ्रीकन मूल के लोग एक दूसरे के साथ शादी -विवाह करते हैं | भारतीय मूल के लोग अपने लोक गीत, नृत्य ,भोजन और अपनी  परम्परा को बचाए हुए हैं | गन्ने और चावल की खेती करते हैं | उन्हें भारत के लोगों और भारतीय फिल्मों से बहुत प्यार है | ट्रिनिडाड में भारतीय लोग एक जुट होकर रहते हैं | वहां के विश्वविद्यालयों में  भारतीय इतिहास ,दर्शन और भाषाएँ पढाई जाती हैं | मन्दिर -  मस्जिद  गिरजा अनेकों हैं | वहां पर सिख सम्प्रदाय के लोग नहीं के बराबर हैं | सुरीनाम के लोग पक्के बिहारी हैं | उनका 'राधिका रेडियो ' भारत के रेडियो स्टेशन से कम नहीं हैं | स्थानीय संगीतकार अपनी शैली और अधिकतर भोजपुरी में  गीत सुनाते हैं|  उनका रहन -सहन  बिलकुल भारतीय है | स्त्री -पुरुष अधिकतर मांसाहारी हैं और मदिरा पान करते हैं | होली -दीवाली तथा अन्य पर्व भारत की तरह ही मनाते हैं किन्तु क्रिसमस सबसे बड़ा त्यौहार है  भारतीय लोग बहुत मेहनती हैं | अफ्रीकन मूल के लोग काफी सुस्त और कामचोर दिखे | भ्रटाचार चरम सीमा पर है | मुझे कार चलानी नहीं आती थी लेकिन एक दो दिन के बाद मेरे एक मित्र ने अपने पुलिस अफसर को घर बुलाकर कुछ डालर दे कर मुझे लाइसेंस दिलवा दिया | जिसका मैंने कभी भी  प्रयोग  नहीं किया |

डॉ. सुमन- आप कई वर्षों तक टोरंटो विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे,अध्यापन से जुड़ा तोष अनिवर्चनीय होता है ?वहाँ की शिक्षण पद्धति पर कोई टिप्पणी ?
श्याम त्रिपाठी जी- मैं  कैनेडा में अंग्रेजी भाषा का ही शिक्षक रहा हूँ | हिन्दी से प्रेम अवश्य रहा किन्तु इन देशों में जीविका - पार्जन   के लिए हिन्दी अर्थहीन है | पहले पंद्रह वर्ष यहाँ के स्कारबरो बोर्ड में एक अधिकारी के रूप में शिक्षा सुधार व प्रवासी बच्चों की समस्याअों के समाधान के लिए कार्य करता रहा | इस कार्य में कैनेडा की शिक्षा प्रणाली का पर्याप्त अनुभव प्राप्त  किया | प्रवासी देशों से आने वाले विद्यार्थियों के साथ उनके दाखिले के साथ पक्षपात, असमानता ,उनके उचित प्रवेश  में अड़चने , इन्हें अंग्रेज़ी का ज्ञान न होने के कारण पीछे क्लासों में दाखिला देना ।,वे विश्वविद्यालयों में न जा सकें इसके लिए नये -नये हथकंडों प्रयोग किया जाना | कल्चर वायस टेस्टों का प्रयोग आदि | इन मनमानियों और ज़्यादतियों पर आपत्ति दर्ज़  करना और प्रवासी बच्चों की आयु और योग्यता के आधार पर प्रवेश में अपने विचार देना | फिर हाई स्कूल में विद्यार्थ्यों को अंग्रेज़ी पढाना रहा | रिटायर होने के बाद हिन्दी चेतना के प्रति पूर्णतः समर्पण । उसी समय टोरंटो वि.वि. में ४ वर्ष तक हिन्दी का शिक्ष्ण किया | यह अपने आप में बहुत ही सार्थक और लाभदायक सिद्ध हुआ | हिंदी ,संस्कृत,उर्दू और कुछ अन्य भारतीय भाषाएँ पढाई जाती हैं | इसका सारा नियन्त्रण यूनिवर्सिटी  के नियन्त्रण में है | शास्त्री जी जब प्रधान मंत्री थे तो उस समय भारत की ओर से कैनेडा को प्रचुर मात्रा में हिन्दी साहित्य की अमूल्य पुस्तकें भेंट की | यही कारण है कि इस वि.वि. के प्रांगण में हिन्दी की सबसे श्रेष्ठ पुस्तकें उपलब्ध हैं | मैंने  हिंदी का  शिक्षण करते हुए बहुत कुछ सीखा | यहाँ पर जो हिन्दी की पाठ्य पुस्तकें हैं वे अधिकतर अमेरिकन ,और अँगरेज़ लेखकों की लिखी हुयी हैं इसलिए हिन्दी का शिक्षण भारत की तरह नहीं है | लिखना -पढ़ना और बोलना ही इसका मूल उद्देश्य है | एक भाषा का अनुभव होने के कारण और अमेरिकन दूतावास में हिन्दी के शिक्षण से बहुत लाभ हुआ | मैं इन विद्यार्थियों को अधिकतर उनकी रुचि के अनुसार पढाता था | भाषा को प्रयोग करके | जैसे उन्हें कैनेडा में भारतीय रेस्टोरेंट , धार्मिक स्थलों का भ्रमण ,और उन्ही के द्वारा सामूहिक रूप से एक क्लास का मासिक न्यूज़ लेटर निकालना और उन्हें विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिता , भारतीय फिल्म की कहानियाँ दिखाना, और उनके सहयोग से होली का त्यौहार मनाना आदि को कोर्स का भाग बनाना | इसी के आधार पर उनका मूल्यांकन करना था | फ्रेंच और जर्मन भाषाएं भी यहाँ इसी प्रकार से पढाई जाती हैं | इसमें से कुछ विद्यार्थी हिन्दी चेतना में भी अपनी रचनाएं लिखते थे | मेरे लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण अनुभव रहा | ये विद्यार्थी हिन्दी न जानते हुए  बहुत कुछ सीख पाए | साथ ही उन्हें अच्छे नम्बर भी मिले | आजकल इस वि.वि. में दो सौ से अधिक विद्यार्थी हिन्दी सीख रहे हैं |

डॉ. सुमन- कनाडा में आपने हिन्दी-साहित्य और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित भाव से काम किया है ,जान सकती हूँ कि तब जबकि भारत में अपनी संस्कृति और भाषा के प्रति अधिकतर उपेक्षा का भाव दिखायी देता है परदेस की धरती पर भाषा-साहित्य को संरक्षित-संवर्धित करना आपके लिए कितना विघ्न-बाधाओं से भरा था?
श्याम त्रिपाठी जी- आपका यह प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है | जैसे कि राम की अयोध्या सदा राम के साथ थी वैसे ही भारत दूर होकर भी साथ रहता है | भारत में जो कुछ हो रहा है वह  तो भारत की समस्या है | किन्तु भारत में हिन्दी संघर्ष में है और देश की जनता और सरकार अंग्रेज़ी के पीछे दौड़ रही है | किन्तु भारत  से बाहर जो भारत बसा  है| उसके सामने भाषा सम्बन्धी कुछ और समस्याएं हैं | उदाहरणार्थ , मारीशस, गयाना फीजी ,सूरीनाम, ट्रिनिडाड ,अब ब्रिटेन अमेरिका ,यूरुप कैनेडा जैसे देशों में जहां अंग्रेज़ी और फ्रेंच का जोर है प्रवासी लोगों के लिए अपनी भाषा और संस्कृति को सुरक्षित रखने लिए बहुत कठिन है | हमारे बच्चे जो यहाँ के वातावरण में पल रहे  हैं ,उनपर ईसाई धर्म का बहुत प्रभाव है | इसीलिए हमारे समाज के नेताओं ने भाषा और धर्म की शिक्षा के लिए मन्दिर ,मस्जिद गुरुद्वारे , तथा हिन्दी के स्कूल खोले हैं |  हम सब लोग कैनेडियन हैं और  इस देश का नमक खाते हैं  लेकिन भारत हमारी जड़  है | यदि हमारी भाषा समाप्त हो गयी तो हमारी संस्कृति, सभ्यता ,आचार -विचार, हेरिटिज सब कुछ लुप्त हो जायेगा | मैंने अपनी ओर  से नि:स्वार्थ , हिन्दी के बुक क्लब , हिन्दी की कक्षाए, बच्चों के लिए मन्दिरों में स्थापित की हैं | जहां ये बच्चे अपनी भाषा के साथ धर्म और अपनी परम्पराएं जानते हैं | उन्हें अपने पुराने ग्रंथों , वेद ,पुराण ,रामायण और महाभारत की कहानियाँ और भारतीय इतिहास के उन महान पुरुषों की भी बातें बताते हैं जिनसे उन्हें भारत की संस्कृति पर गर्व हो | यहाँ की सरकार भी अन्य देश की भाषा-  संस्कृति और धर्म के प्रति बहुत संवेदनशील है | कैनेडा के विधान में इन सभी बातों का उल्लेख किया और इसके लिए प्रवासी लोगों को अधिकार है कि वे अपनी भाषा का प्रयोग कर सकते हैं | यहाँ की सरकार ने अँगरेज़ी और फ्रेंच के अतिरिक्त अन्य भाषाओं के लिए  प्राइमरी स्कूलों में हेरिटीज भाषाओं को हर प्रकार की सुविधा प्रदान की है | किन्तु एक बात देखने में आयी है कि अन्य भाषाएँ बहुत अच्छी तरह चल रही हैं लेकिन हिन्दी की दशा भारत जैसी है | हिन्दी भाषी लोग इसे गम्भीरता से नही ले रहे हैं | फिर भी जागरूगता बढ़ रही है और लोग इसका महत्व समझ रहे हैं | संस्कृति और धर्म का यहाँ पर बहुत प्रचार हो रहा है | मुरारी बापू हर वर्ष यहाँ आते हैं और हजारों की भीड़ उन्हें सुनने जाती है | प्रधान मंत्री मोदी जी जब यहाँ आये थे तो उनका भाषण हिन्दी में था जिसका बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा | हिन्दी चेतना के माध्यम से मुझे इस दिशा में बहुत सफलता और सम्मान प्राप्त हुआ है |

डॉ. सुमन- आपके प्रिय साहित्यकार कौन हैं , जिन्होंने आपको प्रेरित -प्रभावित किया ?
श्याम त्रिपाठी जी- भारत के साहित्यकारों में सूर ,तुलसी ,जायसी ,मीरा  रवीन्द्र नाथ टैगोर, डा. राधाकृष्णन, मुंशी प्रेमचन्द, निराला , सुभद्रा कुमारी चौहान, श्याम नारायन पाण्डेय , पन्त, महादेवी, बच्चन, उपाध्याय , हजारीप्रसाद द्विवेदी,  महावीर प्रसाद द्विवेदी, सोहनलाल द्वेवेदी ,  जयशंकर प्रसाद , कबीर , रहीम ,मीरा ,रसखान , मिल्टन , वर्डस्वर्थ कीट्स ,शैली , आर्नोल्ड, बेकन , टेनीसन ,आस्टिन ,डा. जांसन, गोल्डस्मिथ, स्कॉट , हार्डी , मैन्सफील्ड  टीएस इलियट आदि | टैगोर के साहित्य से मुझे बहुत प्रेरणा मिली |

डॉ. सुमन- कनाडा-अमेरिका की पत्रिका ' हिन्दी -चेतना '  के आप मुख्य संपादक हैं ,इतने लम्बे समय तक आपने इसका संपादन अडिगता से कैसे किया ? क्या इस बीच कोई व्यवधान नहीं आया ?
श्याम त्रिपाठी जी- मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ' हिन्दी चेतना' का सानिध्य  भगवान की ओर से मुझे उत्तरदायित्व के रूप में मिला है जिसे मैं आखिरी सांस तक निभाऊंगा | मुझे बच्चन जी की ये पंक्तियाँ सदैव प्रेरित करती हैं ,-"कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती | "
'चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए , विपति बिघ्न जो पड़ें उन्हें धकेलते हुए | नर  हो न निराश करो मन को !गुप्त जी|  "He is not fit to live ,who is not fit to die,.He is not fit to die who is not fit to live."
चेतना के प्रकाशन में अनेकों समस्याए और रुकावटें आयीं लेकिन  मैं हतोत्साहित नहीं हुआ |


डॉ. सुमन- आप मूलतः कवि हैं, कविता को कैसे परिभाषित करेंगे?
श्याम त्रिपाठी जी- कविता को परिभाषा के पिजड़े में मत डालो , यह तो स्वछन्द, स्वतंत्र एक हिरनी है | हृदय की धड़कन से जो निकले आवाज़ ,वही सच्ची कविता है | मेरे विचार से  ' .वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान , निकलकर नयनों से चुपचाप ,बही होगी कविताअनजान | पन्त जी की ये पंक्तियाँ यहाँ मौजू हैं।

डॉ. सुमन- क्या अप्रवासी भारतीय साहित्यकारों के साहित्य का उचित मूल्यांकन हो पाता है ?
श्याम त्रिपाठी जी- यह एक बड़ी विकट समस्या रही है प्रवासी साहित्य के साथ | यहाँ पर महाकवि आदेश जैसे साहित्यकार  जिन्होंने सात महाकाव्य प्रकाशित किये हैं | भाषा और संगीत पर जिनका पूर्ण अधिकार है | जिनकी पुस्तकें वि.वि. के पाठ्यक्रम में आदर के साथ पढाई जाती हैं और जिन पर शोध के विद्यार्थी काम कर रहे हैं जिन्हें राष्ट्रपति द्ववारा सम्मानित किया जा चुका है किन्तु अभी तक उन्हें जो आदर मिलना चाहिए वह नहीं मिल सका | जहां तक मेरा अनुभव है भारत के प्रमुख साहित्यकार प्रवासी साहित्यकारों को मुख्यधारा में जोड़ने के पक्ष में नहीं हैं |
 

डॉ. सुमन- साहित्यिक गुटबाजियों और खेमों ने हिन्दी भाषा और साहित्य को कैसे और कितना प्रभावित किया है ?
श्याम त्रिपाठी जी- हमारे भारतीयों को भारत से विरासत में प्राप्त हुयी है गुटबाजी | जहां भी हम जाते यह बीमारी हमारा पीछा नहीं छोडती है | मैं यदि अपने व्यक्तिगत अनुभवों को बताने लगूँगा तो पूरी किताब बन जायेगी और ये समाप्त नहीं होंगे | यहाँ  इस देश में गिने चुने हिन्दी प्रेमी लोग रहते हैं और जो साहित्यिक कर्म करते हैं | किन्तु वे जितने ब्राह्मण उतने ही चूल्हे जैसी बात |  हिन्दी चेतना के प्रकाशन में बहुत रोड़े आये। कुछ संस्थाओं ने इसका घोर विरोध किया और इसे  बंद करवाने की धमकी दे डाली | गोष्ठियों में आक्रमण तक करवाए और मुझे भयभीत किया गया | मेरे परिवार को और मेरे बच्चों को जान से मारने  की धमकी दी गयी | किन्तु जैसे कि हाथी चला जाता है और कुते भौंकते रहते हैं  वैसे ही मैं आपने काम में लगा रहा ।किन्तु फिर भी इसका मानसिक रूप से बहुत प्रभाव पड़ता है और साहित्य सृजन में व्यवधान आने लगता है | किन्तु यह विरोध व अवरोध तो हम लोगों के रक्त में है जिसे हम धो रहे हैं |

डॉ. सुमन- संपादन से जुड़े अनुभव साझा करना चाहेंगे?
श्याम त्रिपाठी जी- मेरे लिए इस कार्य का कोई  अनुभव नहीं था । न ही पत्रकारिता का न ही हिन्दी का बहुत बड़ा ज्ञाता हूँ | मुझे हिन्दी साहित्य और विशेषकर हिंदी काव्य से बड़ी अनुरक्ति थी | मैं सरल शब्दों से अपने हृदय के विचार प्रस्तुत कर देता था और धीरे -धीरे पाठकों और लेखकों की प्रतिक्रियाओं को पढ़कर उनमें संशोधन करता रहता | "करत -करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान " | और तुलसी दास की चौपाई ," कवि न होंहूँ  न चतुर प्रवीनों || सकल कला विद्या सब हीनो || इसी से प्रेरित होकर अपनी बात हर अंक में स्पष्ट रूप से कहने का प्रयास करता हूँ | यही मेरे लिए सम्पादकीय अनुभव है | मैं 'हंस' पुरवाई, कथा संसार 'साहित्य अमृत , राष्ट्रभाषा और आधारशिला नामक पत्रिकाओं को नियिमित रूप से पढ़ता हूँ ।  उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है | मेरा विचार है कि लेखक को लिखने के लिए लेनी पडती है | यदि उसके मस्तिष्क में यह भय रहा कि लोग क्या कहेंगे तो वह कुछ नहीं कर सकता है | इसलिए मैं वही लिखता हूँ जो मेरे हृदय में होता है | मुझे यह भी ज्ञाते है ,to error is human and to forgive is  not our company's policy. -

डॉ. सुमन- अब तक की सृजनात्मक-यात्रा कितना संतुष्ट करती है?
श्याम त्रिपाठी जी- मैं स्वयं मिया मिट्ठू नहीं बनना चाहता हूँ | किन्तु एक बात आप तक पहुंचाना चाहता हूँ कि मुझे इस साहित्यिक यात्रा से मन को शन्ति मिली ,ख्याति मिली और हिन्दी की सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ | हर तीन माह के बाद 'हिन्दी चेतना का' अंक जन्म लेता है और मुझे वैसी ही खुशी का अनुभव होता है जैसे कि किसी को नव शिशु के आगमन पर | भगवान सबको ऐसा सुख दे | मुझे अब तक की यात्रा बड़ी आनन्दमयी लगी।

डॉ. सुमन सिंह- स्वदेश अब कितना और क्यों आकर्षित करता है?
श्याम त्रिपाठी जी- स्वदेश ने मुझे बहुत कुछ दिया | भारत जब छोड़ा था तो मेरे पास कुछ भी नहीं था केवल भारत माता का आशीर्वाद था | जो भी मेरे गुरु जनों ने मुझे पढ़ाया  वही मेरे जीवन में काम आया | माता-पिता  और परिवार के संस्कारों ने मुझे एक अच्छा नागरिक बनाया | भारत की संस्कृति और माटी  की सुगंध कभी नही भूल पाया | मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मैं भारत अपने गाँव में जाकर ही अंतिम सांस लूँ | मुझे मेरा गाँव बहुत याद आता है और बढ़ती हुयी आयु के साथ शायर  इकबाल  की ये पंक्तियाँ  हमेशा ओंठों पर आ जाती है ,कि सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा | हम बुलबुले हैं इसकी,
यह गुलिस्ताँ  हमारा।।
गुरवत  हूँ, अगर मैं रहता है दिल वतन में, समझो मुझे वहीं ही दिल है जहां हमारा | ऐ मेरे प्यारे वतन ,उजड़े चमन  .....और क्या कहूँ स्वदेश प्रेम के विषय  में -----


डॉ. सुमन- आजकल क्या व्यस्तता है?
श्याम त्रिपाठी जी-.आजकल मैं और मेरी पत्नी दोनों  ही रिटायर हैं | वह  अपने जीवन में परोपकार और समाज सेवा में व्यस्त रहती हैं | मैं अपनी 'चेतना'  में व्यस्त रहता हूँ और अनेकों चेतना प्रेमियों की ई मेल और फोन के साथ व्यस्त रहता हूँ | कभी -कभी मेरे दोनों पोते आ जाते हैं तो उनके साथ हम हिन्दी बोलते हैं | साथ ही मैंने हिन्दी की सेवा के लिए कुछ पुस्तकालयों में हिन्दी के बुक क्लब प्रारम्भ किये जिनमें पुस्तकों पर चर्चा होती है | प्रति रविवार एक मन्दिर में हिन्दी के बच्चे अपनी भाषा और संस्कृति सीखने  आते हैं उनके  साथ मेरे कुछ अन्य सहायकों सहित उनकी रुचिके अनुसार उन्हें समय देता हूँ | वर्ष में एक बार देश के बाहर यात्रा के लिए जाता हूँ | इस वर्ष मॉरीशस ,दुबई ओमान ,आबूदाबी मित्र मंडली के साथ गया था । बस इसी प्रकार मेरा जीवन व्यतीत होता है | कभी -कभी हिन्दी प्रेमियों के साथ साहित्यिक कवि गोष्ठियों में भी भाग लेता हूँ।


- श्याम त्रिपाठी
 
रचनाकार परिचय
श्याम त्रिपाठी

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