प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -37

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

आख़िरी पुरुष

मेरी माँ, दुनिया की पहली औरत नहीं थी
जो सपने देखा करती थी
और फिर छींके पर रख देती
उन सपनों को
माँओं में हम झाँसी की रानियाँ नहीं देखते
पर फिर भी वो पाँच बच्चों को पीठ पर लादे
डटी रही जीवन के रणक्षेत्र में
उनके चाँद लेने की इच्छा के लिए
अपने सपनों को उधेड़ कर
कटोरे बना, उनमें चाँद लाने की असफल कोशिशें करती

मेरी बेटी, दुनिया की आखिरी औरत नहीं होगी
जो सपने देखा करेगी
और फिर उन्हें छींके पर रख देगी

मैं एक पुरूष
किसी भी अन्य पुरुष-सा
अपने पोरूषत्व का दंभ भरता
उनके सपनों को हेय दृष्टि से देखता
अपनी ताकत के मद में चूर
अपने बलात्कारी होने का अभिमान करता
अपनी ही हीन ग्रन्थियों में औरत को हीन समझता
पर फिर भी
मैं बनना चाहता हूँ
इस छद्म पोरूषत्व की केंचुल ओढ़ता आखिरी पुरुष
जो उतार फेंके, नायक्तव की अवधारणा
अपने बेहतर होने का नकली अहसास

औरत सिर्फ एक औरत नहीं
और पुरूष सिर्फ एक पुरूष नहीं
और मैं बन जाऊं उतना ही इंसान
जितनी इंसान एक औरत है।


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प्रतीक

चलिए छोड़ देते हैं
बातें करना
भुखमरी, ग़रीबी और अशिक्षा की
मंहगाई या बेरोजगारी की
व्याप्त भ्रष्टाचार और
मिटती इंसाफ की आस की
अलग विचारधारा वाले
किसी पत्रकार की हत्या की
धरने पर बैठी लड़कियों के
लाठियों से पिटने की
और बच जाते हैं
ओल्ड-फैशंड समाजवादी होने के
लेबल से

आइए चले चलते हैं
सैर करने
बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक
दशहरे के किसी मेले में
अच्छी शाम बिताते हैं
डूब जाते है
दीवाली के पहले
घरों की लिपाई-पुताई में
स्वच्छ भारत में योगदान देते
राष्ट्रवादी का आधुनिक तमगा
चस्पां करते हैं
अपने-अपने माथों पर
कि सच बोलने का मतलब
इन दिनों साम्यवादी होना हो गया है
और
त्यौहारों के प्रतीकों में ही जंचती है सिर्फ
अन्याय के ख़िलाफ़ उठती आवाजें।


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परजीवी सोच

किसने कहा
कि सिर्फ
जीव-जंतु और वनस्पतियाँ ही
परजीवी होती हैं
कि इन दिनों
हमारी सोच और विचार भी
पलने लगे हैं
मीडिया की दी हुई विचारधारा पर
और हम भेड़-बकरियों-से
चरते रहते हैं सारा दिन
जो भी हमें दिया जाता है
हमारी राजनीति द्वारा
घास बताकर

परजीविता का ये एक नया रंग है
हम खुद ही भक्षण कर रहे हैं
अपने अंदर की
सत्य को देखने और
परिकल्पना पैदा करने की शक्ति को
जैसे एक हरा-भरा पेड़ स्वयं ही
अमर-बेल बन धीरे-धीरे
स्वयं को ही निगल रहा हो।


- हरदीप सबरवाल
 
रचनाकार परिचय
हरदीप सबरवाल

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