प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -37

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

इस दौर का आँसू लिए : 'वो अभी हारा नहीं है'
- के. पी. अनमोल

 


ग़ज़ल को जीवन के खुरदरे धरातल पर लाकर उसे आम, शोषित व्यक्ति की आवाज़ देकर ऊँचाइयों तक पहुँचाने का जो काम दुष्यन्त ने किया, उसके लिए ग़ज़ल का एक पूरा युग उनका एहसानमंद रहेगा। आज जब हम अपने दुःख, दर्द, तकलीफ़ें ग़ज़ल के ज़रिए बाँचते हैं तो मन की पीर को एक अजीब-सा सुकून मिलता है। आज की हिन्दी ग़ज़लों को पढ़ना, अपने ही दिल के ज़ख़्मों को सहलाने जैसा है।

डॉ. राकेश जोशी का हाल ही में प्रकाशित ग़ज़ल-संग्रह 'वो अभी हारा नहीं है' हिन्दी ग़ज़लों की उसी धारा को आगे बढ़ाता है, जिसे दुष्यन्त कुमार और अदम गोंडवी की ग़ज़लों ने वेग दिया था। इनकी ग़ज़लों में लोक, उसकी समस्याएं और चुनौतियाँ, पूँजीवाद के प्रति असंतोष, मज़दूरों और किसानों के जीवन की कठिनाइयाँ, समाज की विसंगतियाँ आदि कथ्य की विषयवस्तु के बतौर उपस्थित हैं। दुष्यन्त कुमार की स्मृतियों को समर्पित यह संग्रह उसी दुष्यन्त कुमार वाले लहजे में यथार्थ के धरातल पर चलते हुए आम आदमी के संघर्षों को आवाज़ देता है। भूमिका से बकौल ज्ञान प्रकाश विवेक, जो स्वयं इस धारा के बड़े हस्ताक्षर माने जाते हैं- "पूरा समाज विसंगत को जीवन-मूल्य बनाने की ज़िद पर अड़ा हुआ है। ग़ज़लकार राकेश जोशी उस विसंगत का संज्ञान लेते हुए ग़ज़लकार के अतिरिक्त किसी समाजशास्त्री का भी दायित्व निभाते प्रतीत होते हैं।"

शब्दांकुर प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित इस संग्रह में डॉ. राकेश जोशी की कुल 82 ग़ज़लें संगृहीत हैं। ये सभी ग़ज़लें तमाम जटिलताओं और बनावटीपन से कोसों दूर रहकर बहुत ही सादी-सी कहन के ज़रिए बातचीत की शैली में कही गयी हैं। संग्रह में शुरू से आख़िर तक एक व्याकुलता की गूँज सुनाई देती है। ग़ज़लकार व्यवस्था से, समाज से और यहाँ तक कि उस सत्ता से भी सवाल करता है, जो सृष्टि का सञ्चालन करती है। वह पूछता है कि वे लोग ऐसा कौन-सा ध्यान लगाकर बैठे हैं कि उन तक ज़रूरतमंदों की पुकारें, शोषितों की आहें तक नहीं पहुँच पातीं!

दुःख में डूबी आवाज़ें न सुन पाए
ऐसा भी क्या ध्यान लगाकर बैठे हो


यूँ तो लोकतन्त्र के नाम पर हर पाँच साल में चुनावों के द्वारा जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है ताकि उनकी आवाज़ दिल्ली के गलियारों में गूँजे लेकिन यह प्रक्रिया अब नाम-मात्र के लिए लोकतन्त्र रह गयी है, अस्ल में तो यह सब धौंसतंत्र है जो जितना बलशाली; उतनी उसकी तूती बोलती है यहाँ। प्रतिनिधि तो सारे ही चोर-चोर मौसेरे भाई बने बैठे हैं, जिनका एक ही उद्देश्य रह गया है, "खाओ और खिलाओ तथा वोट-बैंक को बेवकूफ़ बनाओ"। ऐसे वातावरण में ग़ज़लकार उन्हीं प्रतिनिधिओं से सवाल करता है कि हर चुनावों में निज़ाम तो बदलता आया है, क्या कभी यह इंतज़ाम भी बदलेगा कभी!

सच कहो, क्या कभी ये इंतज़ाम बदलेगा
या फ़क़त तख़्तियाँ बदलेंगी, नाम बदलेगा


भ्रष्टाचार-भरे इस दौर में जो योजनाओं के नाम के ढोल पीटे जाते हैं, उनके पीछे की हक़ीक़त आज किससे छिपी है। ऊपर से नीचे तक खाते-डकारते हुए देश और जनता के लिए एक रूपये में से एक आना ही बचता है। मन्त्रालयों और महकमों में कौन है ऐसा, जो बिना अपनी जेब गरम किये काम कर लेता हो फिर चाहे वह काम देश के हित का हो या किसी ग़रीब के लिए ज़रूरी हो, ऐसे में डॉ. राकेश जोशी अपना सवाल लिए मिलते हैं-

कई बरसों से इस पर ही बहस जारी है संसद में
जो भेजा एक रुपया था, तो पहुँचा एक आना क्यों


इनके कई सवाल ऐसे हैं जो ये केवल व्यवस्था से नहीं पूछते, हम सबसे भी पूछते हैं। आख़िर विकास या बदलाव लाने में जितनी जवाबदेही सरकार की है, उतनी ही हमारी भी। यह भी सच है कि हमने उस समस्या को दूर करने के लिए क्या किया! रचनाकार के इस सवाल का जवाब ढूँढिए अपने भीतर-

कब तलक कचरा रहेंगे बीनते यूँ
तुम कहो, बच्चे ये अफ़सर कब बनेंगे


वंचित तबके के लिए फ़िक्र उनकी हर ग़ज़ल में मिलेगी। वे हर जगह ग़रीब, शोषित, वंचित, ज़रूरतमन्द के साथ खड़े मिलेंगे। ज़मीनी स्तर पर जो समस्याएँ हैं वो इनकी ग़ज़लों के कथ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वे किसानों की फ़िक्र करते हैं, वे कचरा बीनते बच्चों की फ़िक्र करते हैं, वे सरकारी दफ़्तरों की ठोकरें खाते साधारण आदमी की फ़िक्र करते हैं। वे विकास की बात करते हैं लेकिन उसके लिए पर्यावरण की क़ीमत देने को राज़ी नहीं, ग़रीब वर्ग की झुग्गियों की भेंट चढाने को राज़ी नहीं। वे कहते हैं कि विकास वह है जो हर वर्ग के लिए बराबर लाभ का हो।
सड़क चौड़ीकरण के लिए अगल-बगल के पेड़ काटे जाना उन्हें मंज़ूर नहीं है। वे ऐसे रास्ते अपनाने की वक़ालत करते हैं जिनसे प्रगति भी बाधक न हो और पर्यावरण भी बचा रहे।


थी सड़क चौड़ी बहुत पर रास्ते में
वो पुराने पेड़, वो जंगल नहीं थे

जब उजाड़ी जाएँगी ये झुग्गियाँ, ये बस्तियाँ
तब सड़क पर इक नई-सी कार लिक्खी जाएगी


ऐसा भी नहीं कि ग़ज़लकार हर जगह निम्न वर्ग की पैरवी लिए खड़ा मिलता है। वे जितना उनका समर्थन लिए हुए हैं उतना ही उनके ग़लत कामों पर लताड़ भी लगाते दिखते हैं। यही तो अपनापन है। अपने किसी ख़ास के हित का सोचते हुए उसकी कमियों पर उसे आगाह भी किया जाना चाहिए ताकि वह उन्हें समय रहते सुधार सके और ख़ुद को बेहतर कर सके। यहाँ वे एक ख़ास वर्ग के अभिभावक के बतौर मिलते हैं।

कभी भी मिलके कोई काम ये नहीं करते
बवाल हो तो ये मिलकर बवाल करते हैं


इस शे'र को अगर आप संसद के सन्दर्भ में देखें तो मुझे पूरा यक़ीन है कि आप निराश नहीं होंगे। वहाँ के माहौल पर बिल्कुल सटीक बैठेगा यह शे'र। लेकिन मैं इसे हमारे देश के सामान्य लोगों पर बिठाकर यूँ देखता हूँ कि जब कोई अच्छे काम का प्रस्ताव उनके सामने रक्खा जाएगा तो वे कतई मिलकर सहयोग नहीं करेंगे। इसकी बजाय उन्हें ऐसे काम में आप ख़ूब एक साथ देखेंगे जहाँ नुक्सान ही नुक्सान हो। चाहे आप उनुचित माँगे रखती समुदाय विशेष की भीड़ को याद कीजिए या बस्तियाँ जलाती अंधे भक्तों की टोली को। डॉ. राकेश जोशी ऐसे ग़ैर-ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ भी खड़े मिलेंगे आपको।

एक जगह एक मज़दूर जो दिन भर हाड़-तोड़ मेहनत करके अपनी मज़दूरी को परिवार और बच्चों के भले के लिए इस्तेमाल करने की बजाय अपनी लत के लिए स्वाहा कर रहा है, उसकी भी ख़बर लेते हैं वे-


दिन-भर खड़ा था धूप में, बेचे थे नारियल
पैसे कमा के शाम को ताड़ी ख़रीद ली


वे अपनों की इन कमियों की पोल खोलते हैं। उन्हें लताड़ लगाते हैं लेकिन वे उन्हें सही-ग़लत समझाते भी हैं और हौसला भी देते हैं। किसी भी समस्या का समाधान बिना मेहनत किये, बिना बलिदान दिये कभी नहीं मिलता; इस बात से ग़ज़लकार अच्छी तरह वाक़िफ़ है।
हालाँकि वे यह भी जानते हैं कि बोलने वालों का सिर हर दौर में कुचला गया है, जबकि चुप रहकर सहने या हाँ में हाँ मिलाने में कई फ़ायदे हैं-


जो ज़ुबां लेकर चले थे मिट गए
बे-ज़ुबानों का सफ़र अच्छा रहा


लेकिन फिर भी वे ख़तरे उठाने के लिए प्रेरित करते हैं। वे सच को सच कहने का दुस्साहस करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। और कहते हैं-

ख़ंजर को ख़ंजर कहना है
ऐसा अब अक्सर कहना है

शीशों के इस शहर में आकर
पत्थर को पत्थर कहना है


उन्हें हारे और डरे हुए लोग अच्छे नहीं लगते। वे उन लोगों से डरते हैं जो सच को सच कहने का साहस नहीं रखते। वे उन लोगों से डरते हैं जो बिना क़ीमत चुकाए फल खाने को लालायित रहते हैं। वे आगाह करते हैं-

नई तहज़ीब के लोगो, मैं झूठों से नहीं डरता
मैं उन सच्चों से डरता हूँ, जो सच कहने से डरते हैं

मुझे हारे हुए किरदार अब अच्छे नहीं लगते
तभी नाटक में उनका घाव सहलाना नहीं रखता

वो कोई और होगा जो हमें आवाज़ देता है
डरा सहमा-सा है ये तो सवेरा हो नहीं सकता


डॉ. राकेश जोशी के यहाँ शब्दों की दुरुहता का कोई आडम्बर नहीं है। वे स्वयं एक सरल व्यक्तित्व रखते हैं और अपनी रचनाओं को भी दिखावे और बनावटीपन से दूर रखना पसन्द करते हैं। वे अपनी ग़ज़लों को हिन्दी की ग़ज़लें कहे जाने के लिए ठोस हिन्दी शब्दों का सहारा नहीं लेते बल्कि एक ऐसा हिन्दी परिवेश रचते हैं कि ग़ज़लें पढ़ते ही कहा जाये कि हाँ, ये परम्परागत उर्दू ग़ज़लों से कुछ भिन्न हैं। हिन्दी ग़ज़ल, जो लगभग पाँच दशकों की यात्रा करते हुए यहाँ जिस मुकाम पर आ खड़ी है उससे डॉ. राकेश ख़ुश ज़रूर हैं लेकिन संतुष्ट कतई नहीं। वे अपनी भूमिका में स्पष्ट करते हैं कि हिन्दी ग़ज़ल कथ्य और शिल्प दोनों पक्षों पर हिन्दी की होनी चाहिए।
पेशे से अंग्रेज़ी के लेक्चरर डॉ. राकेश जोशी अंग्रेज़ी साहित्य से भी बहुत गहराई से जुड़े हैं इसीलिए वे भूमिका में 'सॉनेट्स' का उदाहरण देते हुए बहुत बारीक़ी से समझाते हैं कि शिल्प में किस तरह से एक ग़ज़लकार को हाथ-पैर पसारने की छूट होनी चाहिए। ख़ैर, यह तो बहस के विषय हैं, फ़िलहाल यह कि जो लोग एक सुधी पाठक की तरह ग़ज़ल का आनन्द लेना चाहें उनके लिए बहुत कुछ है इस संग्रह में लेकिन जो मानक लिए 'नियमों' का चश्मा लगाकर ग़ज़ल पढ़ते हों उन्हें ढेर-सारी कमियाँ भी मिल जाएँगी इसमें।

बहरहाल, हिन्दी की ग़ज़लें किस तरह से एक आम आदमी की भावनाओं के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल रही हैं, उसके दुखों को- उसकी ख़ुशियों को किस तरह से अपने आप में समेट रही हैं, यह देखना है तो आप यह संग्रह ज़रूर पढ़ें। इन कुछ शेरों के साथ ग़ज़लकार को पुस्तक प्रकाशन के लिए शुभकामनाएँ सौंपता हूँ।


कहीं भी घूमने का मन अगर तेरा कभी होगा
तू अफ़सर है, वहाँ तू काम सरकारी दिखा देगा

अजब चलन है नए शहर का
ज़ालिम को भी 'सर' कहना है

जिनको मेरे सिवा याद कुछ भी न था
अब सिवा मेरे सारा जहाँ याद है

हम तो ताबीर माँगने आए
आप तो फिर से ख़्वाब देते हैं

अब ग़ज़ल मेरी सुनो, इस दौर का आँसू हूँ मैं
ख़ूब चाहे जौ़क़, ग़ालिब, दाग़ की बातें करो


पुस्तक मँगवाने के लिए आप प्रकाशन से यहाँ संपर्क कर सकते हैं-
मो.- 9811863500, मेल- [email protected]







समीक्ष्य पुस्तक- वो अभी हारा नहीं है
विधा- ग़ज़ल
रचनाकार- डॉ. राकेश जोशी
प्रकाशन- शब्दांकुर प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण- प्रथम 2017 (हार्ड बाउंड)
मूल्य- 200 रूपये


- के. पी. अनमोल
 
रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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