प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -35

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फिल्म-समीक्षा

माइनस 22 डिग्री के तापमान की देशभक्ति से भरपूर फ़िल्म है: टाइगर जिन्दा है
 



निर्माता /निर्देशक: आदित्य चोपड़ा, अली अब्बास ज़फर
संगीत: विशाल शेखर
कलाकार: सलमान ख़ान, कैटरीना कैफ़, सज्जाद डेलफ्रूज़, अंगद बेदी, कुमुद मिश्रा, गिरीश कर्नाड


भारतीय एजेंट (सलमान खान) के हाथों में जब एम् जी 42 मशीनगन जो 30 किलो वजनी और 1200 राउंड्स प्रति मिनट की स्पीड गन जब नजर आती है तो वह फ़िल्म का बेहतरीन सीन बन जाता है और उनका फौलादी सीन उन्हें हमेशा कि तरह सुपरस्टार बनाता है। इसी सुपरस्टार को देखने के लिए दर्शक और उनके फैन पूरे साल इन्तजार करते हैं। सलमान के स्टारडम को मैच करती फ़िल्म लार्जर देन लाइफ है परन्तु फ़िल्म में गन चलाने का सीन एनिमेशन का रूप भी लगता है। यह फ़िल्म साल 2012 में आई सलमान की एक एनी फ़िल्म ‘एक था टाइगर” का सीक्वल है।


इस फ़िल्म में भी पिछली बार की तरह एक भारतीय एजेंट है तो दूसरा पाकिस्तानी जासूस और दोनों ही  मिलकर अपने-अपने मिशन को अंजाम देते हैं। हालांकि 'टाइगर जिंदा है' के ट्रेलर से ही कहानी का अंदाजा लग जाता है। इराक में भारतीय नर्सों को अपहरणकर्ताओं ने बंधक बना लिया है जिन्हें छुड़ाने का जिम्मा टाइगर (सलमान) को सौंपा गया है। फ़िल्म का रोमांच इस बात में है कि मिशन को कैसे अंजाम दिया जा रहा है। हालांकि फाइलों में मान लिया जाता है  कि क्यूबा में टाइगर की मौत हो गई है जबकि वह ज़ोया से शादी के बाद सब कुछ छोड़-छाड़ कर ऑस्ट्रिया में पारिवारिक जिंदगी जीने लगता है और जूनियर नामक एक उनका बेटा भी है। नर्सों को छुड़ाने की जब बात आती है तो शिनॉय सर को टाइगर की याद आती है और वे 24 घंटों में टाइगर को ढूंढ निकालते हैं। 40 नर्सों में कुछ पाकिस्तानी भी हैं। यह बात पता चलते ही ज़ोया भी टाइगर के मिशन में शामिल हो जाती हैं। एक तीसरे ही देश में भारतीय और पाकिस्तानी एजेंट्स मिल कर इस मिशन को अंजाम देते हैं। फ़िल्म भारत की अगवा नर्सों को इराक में रखे जाने से सम्बंधित सच्ची घटना पर आधारित है और फ़िल्म में इन नर्सों को वहां से निकालने का काम भारत के एजेंट टाइगर को सौंपा जाता है।
टाइगर की सलमान टाइगर की तरह दहाड़ते हुए कहते हैं कि "शिकार तो सब करते हैं, लेकिन टाइगर से बेहतर शिकार कोई नहीं करता।' सलमान के इस संवाद से ही साफ हो जाता है कि टाइगर का अस्तित्व खतरे में नहीं है बल्कि टाइगर पूरी तरह से तंदुरुस्त और अपना अस्तित्व बचाए रखने में सक्षम है। उसे शिकार करना आता है, खुद को बचाना आता है और दूसरों को ठिकाने लगाना भी वह अच्छे से जानता है। टाइगर पहले से ज्यादा खतरनाक हो गया है। इस बार वो अब अपने प्यार की खातिर नहीं देश की खातिर जंग कर रहा है। इस बार उसका दुश्मन कोई एजेंसी नहीं बल्कि एक आतंकी संगठन है।टाइगर की भूमिका में सलमान खान हैं। उनकी टुकड़ी में अंगद बेदी के साथ बाकी अन्य कलाकार भी हैं। किस तरह से टाइगर के साथी और उनकी महबूबा जोया (टाइगर) जो आईएसआई एजेंट हैं इराक में फंसी हुई नर्सों को वहां से निकालते हैं दिखाया गया है। कहानी में परेश रावल और कुमुद मिश्रा की कैसे एंट्री होती और विलेन के रूप में सज्जाद की किस तरह की मौजूदगी है। अंतत क्या होता है, क्या भारत और पाकिस्तान के एजेंट, मिलकर नर्सों को बचा पाएंगे ये सब कुछ जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।


निर्देशक अली जानते थे कि उनके पास प्रस्तुत करने के लिए सीधी और सरल कहानी है इसलिए उन्होंने एक्शन का जोरदार तड़का लगाकर फिल्म को बेहतर बनाने की कोशिश की है। फिल्म में एक्शन का स्तर इतना ऊंचा रखा है कि उसके रोमांच में खोकर दर्शक अन्य बातों को भूल जाता है। फिल्म में ऐसे कई दृश्य डाले गए हैं जो दर्शकों को सीटियां और तालियां बजाने पर मजबूर करते हैं, जैसे- कैटरीना कैफ का एंट्री सीन लाजवाब है जब वे कैमरे में बिना आए पल भर में गुंडों को ठिकाने लगा देती हैं। दो भारतीय एजेंट्स के बैग को ऊपर रखने के लिए विवाद करना और बैग खोलने पर तिरंगे का निकलना, भारतीय और पाकिस्तानी एजेंट्स का साथ में बैठकर बातें करना कि यदि दोनों देश एक होते तो क्या समां होता। लेकिन इन कुछ दृश्यों में महसूस होता है कि देशभक्ति की लहर बेवजह पैदा की जा रही है। फिल्म के एक्शन सीन जबरदस्त हैं।


जहां तक कमियों का सवाल है तो अली अब्बास ज़फर ने फिल्म के नाम पर खूब छूट ली है। खतरनाक आतंकवादियों द्वारा भारतीय नर्सों तथा टाइगर और उसकी गैंग को इस तरह खुला छोड़ देना, साथ ही टाइगर गैंग कई चीजें बड़ी आसानी से कर देती है, ये बातें फ़िल्म देखते समय थोड़ा अखरती हैं। खाने में बेहोशी की दवा मिलाने का फॉर्मूला तो मनमोहन देसाई के जमाने से चला आ रहा है और इसी पुराने नुस्खे को दादी-नानी के नुस्खे की तरह इस फ़िल्म में भी डाला गया है।  फ़िल्म जितने खतरनाक आतंकवादी बताए गए हैं उस हिसाब से ये नुस्खे ज्यादा जंचते नहीं। दुनिया में अशांति के माहौल के लिए वे व्यवसायी जिम्मेदार हैं जो हथियार बनाते हैं, जैसी बातों को हौले से छुआ गया है। टाइगर जिंदा है देखते समय बेबी, एअरलिफ्ट और एजेंट विनोद जैसी फिल्में भी याद आती हैं। इन फिल्मों में इसी तरह के मिशन दिखाई दिए थे। 'टाइगर जिंदा है' में वही दोहराव देखने को मिलता है, लेकिन इस फिल्म को उन फिल्मों से जो बात जुदा करती है वो है सलमान खान का स्टारडम।


निर्देशक के रूप में अली अब्बास ज़फर ने फिल्म को हॉलीवुड स्टाइल लुक दिया है। उन्होंने फिल्म में संतुलन बनाए रखा है और दर्शकों को हर तरह के मसाले परोसे हैं। एक्शन फिल्म होने के बावजूद उन्होंने हर दर्शक और वर्ग का ख्याल रखा है और एक्शन का ओवरडोज नहीं होने दिया। अच्छी बात यह है कि वे दर्शक की फिल्म में रूचि बनाए रखते हैं। अली ने सलमान के स्टार पॉवर का बखूबी उपयोग किया है। सलमान को उसी स्टाइल और अदा के साथ पेश किया है जो दर्शकों अच्छी लगती है। हर सीन में सलमान का दबदबा नजर आता है। सलमान का एंट्री सीन भी शानदार है। थोड़ी देर चेहरा आधा ढंका नजर आता है। फिर पूरा चेहरा तब नजर आता है जब वे खतरनाक भेड़ियों से अपने बेटे को इस शर्त के साथ बचाते हैं कि कोई भी भेड़िया मारा न जाए। यह सीक्वेंस फिल्म का माहौल बना देता है। इस फ़िल्म में एक बार फिर शर्टलेस सलमान को भी एक्शन करते देखा गया है यह आज के समय में ख़ास कर सलमान कि फिल्मों की एक अलग पहचान भी बन चुका है।


सलमान खान ने इस फिल्म के लिए अपना वजन कम किया है। वे फिट और हैंडसम लगे हैं। एक्शन दृश्यों में उन्होंने विशेष मेहनत की है। टाइगर के रूप में वे ऐसे शख्स लगे हैं जो इतनी भारी भरकम जिम्मेदारी को अपने मजबूत कंधों पर उठा सकता है। अभिनय के नाम पर उनका एक विशेष अंदाज है, वही उन्होंने दोहराया है और अपने फैंस को ताली और सीटी बजाने के कई मौके दिए हैं। कैटरीना कैफ के सीन कम हैं, लेकिन जो भी उन्हें मिले हैं उनमें उन्हें कुछ कर दिखाने का मौका मिला है। कुछ एक्शन सीन भी कैटरीना को करने को मिले हैं और वे इनको बखूबी निभाती दिखी हैं। गिरीश कर्नाड, अंगद बेदी, सज्जाद डेलफ्रूज़, कुमुद मिश्रा, परेश रावल काबिल अभिनेता हैं और इनका सपोर्ट भी फिल्म को मिला है। जूलियस पैकियम इस फिल्म में महत्वपूर्ण रोल निभाते हैं। उनक बैकग्राउंड म्युजिक तारीफ के काबिल है। फिल्म देखते समय यह दर्शकों में रोमांच उत्पन्न करता है। विशाल-शेखर द्वारा संगीतबद्ध किए गीत 'स्वैग से करेंगे सबका स्वागत' और 'दिल दियां गलां' सुनने लायक हैं।
फिल्म की सिनेमाटोग्राफी जबरदस्त है। बर्फीले पहाड़ों की 22 डिग्री की हाड़ कंपाने वाली सर्दी से लेकर शरीर को जलाने वाले और तपते रेगिस्तान तक सभी को कैमरे के सामने खूब घुमाया गया है। फिल्म के लिए स्टंट सीन हॉलीवुड के एक्शन डायरेक्टर टॉम स्ट्रूथर्स के निर्देश में फिल्माए गए हैं, जो ‘बैटमैन’ सीरीज में एक्शान डायरेक्टएर रह चुके हैं। ‘टाइगर जिंदा है’ के क्लाइमेक्स सीन में दस हजार राउंड फायर किया गया है। इस फिल्म में कैटरीना ने भी कई एक्शन सीन्स किए हैं। फ़िल्म की ख़ास बातें हैं कि:-  सलमान खान और कटरीना कैफ़ एक बार फिर साथ-साथ नजर आए हैं और फ़िल्म में ज़बरदस्त ऐक्शन और देशभक्ति और रोमांच से भरपूर है।  इसके अलावा हिंदुस्तान और पाकिस्तान की एकता बेहतरीन लगती है। फ़िल्म कि कहानी दर्शकों को आख़िरी तक बांधे रखती है। ख़ास बातों के अलावा फ़िल्म में कुछ कमिया भी हैं मसलन:- फ़िल्म के पहले हिस्से की शुरुआत धीमी होती है। फ़िल्म की लम्बाई कहीं कहीं उबाऊ लगने लगती है जो छोटी हो सकती थी। कहानी में कोई नई बात नजर नहीं आती है।


- तेजस पूनिया