प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

स्मृति

हिन्दी के प्रसिद्ध कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार एवं कवि दूधनाथ सिंह का 11 जनवरी, 2018 को निधन हो गया। बलिया में जन्मे दूधनाथ जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया था। अपने साहित्यिक जीवन में आपको भारतेंदु सम्मान', 'शरद जोशी स्मृति सम्मान', 'कथाक्रम सम्मान', 'साहित्य भूषण सम्मान' एवं अन्य कई सम्मानों से अलंकृत किया गया। 

हस्ताक्षर परिवार की ओर से उन्हें नमन एवं भावभीनी श्रद्धांजलि!
 

दूधनाथ सिंह जी की कविताएँ-
 

जा रहा हूँ जीवन की खोज में
 
जा रहा हूँ जीवन की खोज में
सम्भवत: मृत्यु मिले
सम्भवत: मिले एक सभ्य
सुसंस्कृत जीवन-व्यवहार
साँझ मिले बाँझ
आँच न मिले
जीवन की राख मिले
दसों-दिशाओं में।
 
क्या ऐसा नहीं हुआ कई बार
कई तथागतों के साथ
कई शताब्दियों में
निरन्तर!
 
जब भी वह निकला उल्लास
लास भौतिक जीवन पर इठलाता
मिली उसे निरी उदासीनता
मिला उसे कठिन कंकाल
मिला उसे भव्य अन्तराल।
क्या वह नहीं लौटा
विकल-विकल लिए
हाथों में अपना ही तरल रक्त
क्या उसकी आँखों से नहीं
टूटा, निपट उदास टिमटिमाता
सितारा एक?
 
पृथ्वी थोड़ी और
समृद्ध क्या नहीं हुई
उसके बाद!
 
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जब मैं हार गया
 
जब मैं हार गया सब कुछ करके
मुझे नींद आ गई।
जब मैं गुहार लगाते-लगाते थक गया
मुझे नींद आ गई
जब मैं भरपेट सोकर उठा
हड़बोंग में फँसा, गुस्सा आया जब
मुझे नींद आ गई।
जब तुम्हारे इधर-उधर
घर के भीतर बिस्तर से
सितारों की दूरी तक
भागते निपटाते पीठ के
उल्टे धनुष में हुक लगाते
चुनरी से उलझते पल्लू में
पिन फँसाते, तर्जनी
की ठोढ़ी पर
छलक आई ख़ून की बूँद को होठों में चूसते
खीझते, याद करते, भूली हुई बातों पर सिर ठोंकते
बाहर-बाहर मेरी आवाज़ की अनसुनी करते
 
यही तो चाहिए था तुम्हें
ऐसा ही निपट आलस्य
ललित लालित्य, विजन में खुले हुए
अस्त-व्यस्त होठों पर नीला आकाश
ऐसी ही ध्वस्त-मस्त निर्जन पराजय
पौरुष की।
इसी तरह हँसती-निहारतीं
बालक को जब तुम गईं
मुझे नींद आ गई।
 
जब तुमने लौटकर जगाया
माथा सहलाया तब मुझको
फिर नींद आ गई।
 
मैं हूँ तुम्हारा उधारखाता
मैं हूँ तुम्हारी चिढ़
तंग-तंग चोली
तुम्हारी स्वतंत्रता पर कसी हुई,
फटी हुई चादर
लुगरी तुम्हारी फेंकी हुई
मैं हूँ तुम्हारा वह सदियों का बूढ़ा अश्व
जिसकी पीठ पर ढेर सारी मक्खियाँ
टूटी हुई नाल से खूँदता
सूना रणस्थल।
 
लो, अब सँभालो
अपनी रणभेरी
मैं जाता हूँ।

 


- दूधनाथ सिंह
 
रचनाकार परिचय
दूधनाथ सिंह

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