प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -37

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- ऐसा भी


"रोज़ रात को मेरा पति मेरे पास आकर सो जाता है। शारीरिक सम्बन्ध के लिए मना करती हूँ तो छत पर चला जाता है। डरकर मुझे भी छत पर जाना पड़ता है कहीं कुछ कर न ले और फिर वही.....।" तीसरी-चौथी मुलाकात में ही हम खुल गए थे और लम्बी-लम्बी बातें कर ली थीं। इसी में उसने यह कहा था।
मैंने पूछा, "तो तुमको मज़ा नहीं आता?" "आता है लेकिन रोज़-रोज़ क्या! ये तो फ़ालतू का काम है, टाइम बिगाड़ना है।"

उसकी उम्र 30-32 की होगी और सेक्स के प्रति उसका ये बेरुखापन मुझे चौंका रहा था। वैसे वह सुन्दर है, शरीर गदराया हुआ है, उन्नत उरोज है, रहने का तरीका और बातचीत मे खुलापन और सोच प्रगतिशील है पर इस विषय में वह प्राचीन, परम्परागत महिलाओं जैसी लगती है।


एक दिन जब मैं उसे उसके घर छोड़ने जा रहा था तो केमिस्ट की दुकान पर रुक गई। पैकेट लेकर आई। पूछने पर बोली, "कन्डोम है...." "इतने सारे" मेरे आश्चर्य पर बोली "महिना भर चल जाएंगे।" "इसमें भी राशनिंग?" "हाँ, क्या करूँ, ऐसा न करूँ तो ये मुझे निचोड़ कर रख देंगे। जब भी मौका मिलता है, दबोच लेते हैं। जैसे-तैसे बचती हूँ फिर भी....।" फिर उसने वही बात कही, अपनी अरुचि दिखाई। कभी-कभार मैं उसको जान-बूझकर छू लेता। वो कोई रिएक्शन नहीं करती है, इसको सामान्य बताती लेकिन दूसरे ही पल कुछ ऐसा कह देती है कि दोहरा चरित्र लगने लगता है। बरसात के एक दिन बोली, "मैंने एक ड्रेस लाकर ऑफिस में रख ली है, भीग जाऊं तो बदल लूं।" मैंने मज़ाक में पूछा, "सारे कपड़े?" पहले तो हाँ कहा, फिर हँसकर बोली, "सारे क्यों, भीगते तो ऊपरी ही है न!" फिर बोली, "मारूंगी तुझको।" "बदलोगी कहाँ?" पूछने पर हँस दी। "तुमको दरवाज़े पर खड़ा कर दूँगी और बदल लूंगी, तुम पर विश्वास है मुझे।" मैं कहना चाहता था कि सबसे बुरा तो मैं ही हूँ और भक्षण को आतुर हूँ और तुम रक्षक बना रही हो, पर बोला नहीं।

मुझे उसका साथ पसन्द है। उसे भी मेरा साथ पसन्द है। मैंने कभी अपनी पारिवारिक समस्या उससे शेयर नहीं की लेकिन उसने सब कुछ शेयर कर दिया। यहाँ तक कि अपना सेक्स जीवन भी। एक दिन बोली, "कल एक घंटा बिगड़ गया।" मैंने पूछा, "क्यों?" बोली, "वही पति का शारीरिक सम्बन्ध बनाना।" मैंने पूछा, "इतना वक्त लगा?" वह हँस दी, फिर बोली, "रूठना-मनाना फिर सम्बन्ध, फिर रूठना फिर मनाना फिर सम्बन्ध यही तो....इसमें ही इतना वक्त लग जाता है। मुझे मज़ा नहीं आता है पर पति को रोज़-रोज़ मना करना भी ठीक नहीं लगता है।" "तो फिर तुम्हारा पति कुंठित होता होगा?" "हाँ; होता है, मैंने उसको कह दिया है कि वो सहेली बना ले, मुझे आपत्ति नहीं है पर वो तो मुझे ही चूमना-चाटना चाहता है।" कहकर उसने मुँह बनाया। मैं विस्मित नज़रों से उसे देखता ही रह गया।
उसमें गुण भी बहुत है। कभी मुझसे गिफ्ट नहीं मांगा और कभी उस पर केन्टिन में खर्च किया तो तुरन्त ही अपना शेयर दे दिया। कई बार खुद ही केल्कुलेट करके बाइक में पेट्रोल भी भरवा देती है।


एक बार हम ऑफिस में बैठे कम्प्यूटर पर काम कर रहे थे। हँसी-मज़ाक भी चल रहा था कि मैंने उसके गाल पर चूम लिया। उसने अनजान-सी निगाह से मुझे देखा फिर बोली, "आगे से ऐसा मत करना।" कुछ दिन बाद मैंने फिर यही हरकत की तो रूंआसी होकर बोली, "मैं तुझसे ऐसी उम्मीद नहीं रखती। तुझसे शरीर से ऊपर आत्मा का रिश्ता चाहती हूँ। फिर ऐसा मत करना।" फिर मैंने ऐसा नहीं किया। मैं उसकी इस बड़ी-बड़ी भावुक अपील में फँस गया।
मेरे दिमाग मे उसके पति को लेकर छवि बन गई थी। वह मुझे अत्यधिक सेक्सी लगा। मुझे यह भी लगा कि वह शरीर व मस्तिष्क से कमज़ोर होगा तभी इसके साथ इतना कठोर है। मुझे उससे मिलने की इच्छा बलवती हो गई थी। वैसे मैंने इन दोनों को कभी साथ नहीं देखा। यहाँ तक कि उसको देखने की इच्छा में इसके घर की रेकी भी की लेकिन असफल रहा।


एक दिन मैंने हिम्मत कर ही ली। जब यह ऑफिस में थी, मैं उसके घर चला गया, बेल बजाई, बहुत बार बजाई पर दरवाज़ा नहीं खुला। शायद भीतर कोई नहीं था। जब वापस आने लगा तो पड़ोसी फ्लेट का दरवाज़ा खुला। एक महिला ने प्रश्नवाचाक नज़र से देखा।
पूछने पर बोली, "कहा, शर्माजी तो असम में पोस्टेड हैं। सालभर से आए भी नहीं है। मेघा तो अकेली रहती है यहाँ।" मैं आश्चर्यचकित था। मेरी आँखें डबडबा गयीं। इतना छलकपट, इतना झूठ क्यों?

वापस आॅफिस जाने की मेरी इच्छा नहीं हुई, उसका मोबाइल नम्बर ब्लॉक कर दिया। उसके चेहरे से नफ़रत हो गई थी। अफ़सर को कहकर ट्रान्सफर करवा दिया और तुरन्त नये शहर मे उपस्थिति दे दी।


- भारत दोसी
 
रचनाकार परिचय
भारत दोसी

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कथा-कुसुम (3)