प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

साँवली हूँ मैं

उगते सूरज की रौशनी में जाग उठता है
चढ़ती धूप के साथ और निखरता है

ढलती शाम के साथ सुनहरा लगता है
सावन में वो बादलों-सा लगता है

लगभग हर रंग के साथ जँचता है
बिना किसी गहने के भी प्यारा-सा लगता है
सादगी तो श्रृंगार का गहना है

कृष्ण का जो था रंग
मेरा भी वही है
हाँ, साँवली हूँ मैं।


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तुम और मैं

तुम और मैं
दो ओस की बूँद जैसे
ज़िन्दगी के सफ़र में मिले

जिस राह ज़िन्दगी ले गयी
चल दिए

और फिर
न जाने कब
एक-दूजे में मिल कर
पानी बन गए
सागर में समा गए

हाँ, तुम और मैं
एक हो गए।


- कनकने राखी सुरेन्द्र
 
रचनाकार परिचय
कनकने राखी सुरेन्द्र

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कविता-कानन (1)