प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
कहानी- ठूँठ
 
 
"आख़िरी महीना चल रहा है, अब ज़्यादा सावधानी की ज़रूरत है। हालाँकि प्रेगनेंसी की जो असली परेशानी थी शुरूआत में, उससे हम उबर गये हैं। अब वैसा कोई ख़तरा नहीं है। फिर भी ऐसे हालात में सावधानी तो जरूरी है। किसी भी चीज़ को हल्के में नहीं लेना है।" डॉक्टर वीना ने जैसे हिदायत दी।
"और देखो, किसी भी रूप में तुम्हारा एलएफटी और शुगर लेवल नहीं बढ़ना चाहिये, अन्यथा परेशानी बढ़ जायेगी। हम इस तरह का कोई रिस्क नहीं ले सकते। और, इसके लिये मैं कोई एलोपैथिक मेडिसिन भी नहीं देना चाहती। तुम्हारा जो घरेलू ट्रीटमेंट है ना, वही इफेक्टिव है। वही लेती रहना।" डॉक्टर वीना ने मेरी रिपोर्ट् देखते हुये कहा।
"वैसे मैं हैरान हूँ कि तुमने बिना किसी एलोपैथिक दवाई के अपना एलएफटी और शुगर कैसे कंट्रोल कर लिया। क्या खाती हो भई, ऐसा!" डॉक्टर वीना ने बड़े ही दोस्ताना लहजे में कहा।
 
डॉक्टर वीना मेरी गॉयनेकॉलोजिस्ट हैं। शुरू से ही मेरा ट्रीटमेंट कर रही हैं। किसी के रेफेरेंस से हम उन तक पहुँचे थे। पूरी तरह से प्रोफेशनल हैं। मरीज़ को सही बात बतलाने की पूरी हिमायती। पहले मेरे साथ इतनी दोस्ताना नहीं थी, पर तक़रीबन एक साल से ज्यादा हो गया, हमें उनके यहाँ आते-आते। तो कभी-कभी दोस्ताना हो ही जाती है। मूड में होती हैं तो अपने पति और बच्चों की चर्चा भी छेड़ देती हैं। आखिर कोई कब तक प्रोफेशलइज्म का चोला ओढ़े रखेगा। शुरू में हम उन पर विश्वास नहीं कर पाये थे। एक तरह से डर गये थे। जब उन्होंने कहा था कि मेरी यूटेरस में कुछ प्रॉब्लम है, जिससे एग पूरी तरह से डेवलप ही नहीं हो पाता। परिणाम यह होता है कि बच्चा ठहर ही नहीं पाता और अपने आप एबॉर्शन हो जाता है। अब तक किसी भी डॉक्टर ने इस बारे में हमें नहीं बतलाया था, इसीलिये विश्वास करना थोड़ा मुश्किल लग रहा था।
 
मेरे लिये एक बच्चे की बड़ी चाह थी। चाह से ज्यादा ज़रूरत थी। प्रशांत तो अपने ऑफ़िस चले जाते थे और मैं सारा दिन घर की दीवारों से बतियाती थी। आखिर कब तक बतियाती। कोई तो हाड़-माँस का व्यक्ति होना चाहिये। वैसे भी इस अंजान शहर में कौन था अपना, जिसके पास दो घड़ी बैठ कर अपना दुख दर्द कह पाती। नितांत अकेली हो गयी थी। प्रशांत को तो जैसे शादी करके सबकुछ मिल गया था। ऐसा नहीं था कि उन्हें बच्चे की चाह नहीं थी। पर वे मेरी तरह बच्चे न होने की वजह से अनावश्यक परेशान नहीं थे। बच्चे के सवाल को लेकर अक्सर वे टाल जाते या ज़्यादा से ज़्यादा कहते, "जब होना होगा हो जायेगा, तुम क्यों परेशान होती हो।"
 
मेरे पास उनके इस क्यों का कोई जबाव नहीं था। यदि होता तो भी मैं नहीं देना चाहती थी। चाहती थी वक्त ही इसका जबाव दे और वक्त ने लाइफ़ के इस मुक़ाम पर लाकर छोड़ा था कि लगता था, कोई तो दुख हरने वाला होना चाहिये। हाँ, मैं अपने बच्चे को अपना दुख हरने वाला ही समझ रही थी. जिससे मैं अपने दिल की हर बात कह सकूँ। वो बातें जो मैं प्रशांत को भी नहीं बताना चाहती थी। और वो बाते भी जो मैं प्रशांत को बताना तो चाहती थी, पर चाह कर भी बता नहीं पाती थी। दुनिया जहान की सब बातें। अपने डर की बातें। अपने प्यार की बातें। बहुत कुछ कहना चाहती थी, सिर्फ और सिर्फ अपने बच्चे से, और किसी से नहीं। मैं चाहती थी, नासूर हो चुके वक्त के लम्हों को बच्चे की तुतलाती जुबान में ठेंगा दिखाना। यह बात बचकानी लग सकती है, पर है बिल्कुल सही। मैं हर हाल में अपना बच्चा चाहती थी।
 
लेकिन कई डॉक्टर्स को दिखलाने और कोई फ़ायदा न होने की वजह से हम थक गये थे। सोच रहे थे पता नहीं ईश्वर को क्या मंजूर है। डॉक्टर वीना से मिलने के बाद फिर एक नयी बात पता चली थी। मतलब फिर तमाम तरह के मेडिकल टेस्टों की बारी। हम चिंतित थे, पर इस चिंता में आशा की किरण छुपी थी। यह आशा की किरण ही है कि आज मेरी गोद हरी-भरी होने के कगार पर है।
"अरे, मिताली! कहाँ खो गयी!" डॉक्टर वीना ने जैसे नींद से जगाया।
"हूँ" मैंने गरदन हिलाई।
"दादी माँ के नुस्ख़े हमें नहीं बतलाओगी?"
"कुछ नहीं, बस भिंडी का पानी एक गिलास पी जाओ, रोज़, शुगर लेवल अपने आप नीचे आ जाता है। और गर्म पानी में अजवाइन पेट को हल्का करने का रामबाण है। मैं तो रोज़ाना एक कप गर्म पानी में अजवाइन लेती हूँ। इससे काफी राहत रहती है।" मैंने कहा।
"अच्छा, यह बात है. दादी माँ से बहुत कुछ सीख कर आयी हो"
"दादी से तो नहीं... हाँ, माँ ने ज़रूर यह देसी नुस्ख़े बतलाये हैं।" मुँह से अनायास निकला, जैसे दूर आकाश में एक तारा चटका।
"ओके, मिताली। फिर ठीक है, अपना ध्यान रखना।" डॉक्टर वीना पर प्रोफेशनलइज्म हावी होने लगा।
"और हाँ, जैसे ही लेबर पेन शुरू हो, मुझे फ़ोन करना।" कहते हुये डॉक्टर वीना ने अगले पेशेंट के लिये घंटी बजा दी।
 
मैं प्रशांत के साथ धीरे-धीरे क्लीनिक की सीढ़ियाँ उतरने लगी। मन में हल्का-सा महसूस हो रहा था। अब वो समय आने वाला है, जिसका मैं बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी। मन में आने वाले बच्चे की छवि उभरने लगी। मैं मुस्कुराने लगी। प्रशांत कैब बुक करने लिये मोबाइल में जुटे थे।
"बस पाँच मिनट में आ जायेगी।" प्रशांत ने कहा।
अब तो ख़ुश हो ना, डॉक्टर ने सब पॉज़िटिव बताया है।
जबाव सुने बिना ही प्रशांत ड्राइवर को फ़ोन लगाने लगे। मैं अकबकाई। यह क्या बात हुई। इन्हें बस अपनी कहनी है। अपने मन का तो पा लिया ना सबकुछ, अब मुझे सुनने की क्या ज़रूरत। मन के किसी कोने में हूक उठी। मैंने फिर अपना ध्यान बच्चे की तरफ लगा दिया। सच में माँ और बच्चे का रिश्ता बड़ा अजीब होता है, जिसे शब्दो के दायरे में नहीं बाँधा जा सकता। मैं इस समय कैसा महसूस करती हूँ, किसी को बयान नहीं कर सकती। मन में तमाम तरह की हलचलें होती हैं और चीकू तो पेट से ही बड़ा शैतान है। हाँ, चीकू नाम रखा है मैंने उसका। बचपन में चंपक में पढ़ा था, चीकू नाम का ख़रगोश, जो हर परेशानी को चुटकी में हल कर लेता था। मेरा चीकू भी हर परेशानी को चुटकी में हल कर लेगा। अभी से शैतानी में अव्वल है। जब तब शैतानी में अपना सर अड़ा देता है, मेरे पेट में। फिर मुझे बहुत मनुहार करनी पड़ती है, चीकू से। तब कहीं जाकर मानता है। मेरी हर बात ध्यान से सुनता है। न जाने क्या समझता है, अचानक ज़ोर से पैर मारता है। यह एक ऐसा अहसास है, जिसे सोच-सोच कर मैं घंटों अकेले में हँसती रहती हूँ।
 
"चलो, कैब आ गयी।" प्रशांत ने मेरे लिये कैब का दरवाज़ा खोला। हम दोनों, नहीं तीनों, चीकू भी है ना, घर के लिये रवाना हुए। कैब ने घर की राह पकड़ी। शीशे से देखती हूँ, भीड़ अटी पड़ी है हर तरफ। चारों तरफ लोग भाग रहे हैं। लगा, हर कोई बस भाग रहा है, न मालूम लोगों को कहाँ जाना है। हम भी बस भाग रहे थे, हर किसी से। दुनिया से, समाज से, घरवालों से। आखिर कहाँ जायेंगे। समझ नहीं आता आखिर ऐसा कौनसा गुनाह कर दिया। अपनी पसंद से शादी ही तो की है। किसी का क़त्ल तो नहीं। और जो समाज हमें रोज़ाना ताने दे देकर क़त्ल कर कहा है, उसका क्या। नहीं, उसको कहने की किसी की हिम्मत नहीं। सच तो यह है कि भाग हम नहीं रहे। समाज हम से भाग रहा है। वो इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा कि दरिया में काफी पानी बह गया है, अब इन रूढ़िवादी मान्यताओं का कोई मतलब नहीं।
 
फिर हम कोई पहला उदाहरण कौनसा हैं! जाने कितने लोग अपनी पसंद से शादी करते हैं। तो क्या उन सबको यह ज़िल्लत उठानी पड़ती है। समाज की तो छोड़ो, जब अपने सगे माँ-बाप आप के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार करते हैं, तो समझ नहीं आता कि क्या कहा जाये। आप कुछ कहने के क़ाबिल ही नहीं रह पाते। उसे पिताजी की पड़ी मार सालने लगती है। एक समय तक मेरे आदर्श हुआ करते थे मेरे पिताजी। एक आदर्श पिता, जो हमारे जीवन को सार्थक बनाने के लिये अपना सर्वस्व लुटाने को सदैव तत्पर रहते हैं। इस घटना से पहले वो थे भी ऐसे। यदि हमारे पैर में मोच भी आ जाये तो सारा घर सर पर उठा लेते थे। तुरंत डॉक्टर को ले जाते थे। पर मुझे पीटते उनके हाथ ज़रा भी नहीं काँपे। एक पिता को समाज कैसा बदल देता है! समाज में जाति, इज़्ज़त अपनी इकलौती बेटी से भी ज़्यादा क़ीमती हो जाती है। मेरी आँखों में किरमिचें-सी चुभती हैं।
 
 
शीशे से नज़र हटा लेती हूँ। रूमाल निकाल, चुपचाप आँखों की कोरों को साफ़ कर लेती हूँ। प्रशांत का ध्यान मेरी तरफ नहीं है। वे चीकू की ख़रीदारी को लेकर मुझसे बात कर रहे हैं। बहुत एक्साइटिड हैं। मैं हाँ हूँ में जबाव भी दे रही हूँ। मेरे मन में उठे विचारो से उन्हें कोई लेना-देना नहीं। कभी लगता कि उन्हें अपने अतीत से कोई मतलब नहीं। सबकुछ भुला बैठे हैं। वैसे भी वो अपने में मस्त रहने वाला इंसान है। ज़्यादा किसी की परवाह नहीं करता। मेरी भी नहीं। कुछ भी हो उनका परिवार तो उनके साथ है, पर मेरे परिवार ने तो मुझे मरा हुआ मान लिया। क्या ख़ून के रिश्ते इतने कमज़ोर होते हैं!
 
ड्राइवर रेड लाइट पर ब्रेक लगाता है। मैं ख़्यालों से बाहर निकल आती हूँ। गाड़ी रुकते ही माँगने वालों की चिल्ल-पौं दिखाई पड़ती है। गाड़ियों के शीशे चढ़े हैं। बाहर का कुछ सुनाई नहीं पड़ता। पर इतना है कि गिड़गिड़ाने के स्वभाव में कुछ आवाज़ें हैं, जो कि गाड़ी के अंदर बैठे लोगों को सुनाई नहीं पड़ रही। सिर्फ दिखाई पड़ रही हैं। माँगने वाले भी पूरे प्रोफ़ेशनल हैं। अच्छे से पता है कि किस गाड़ी से कुछ मिलने की उम्मीद है, इसीलिये उसी गाड़ी पर ज़्यादा देर तक गिड़गिड़ाते हैं, वरना अन्य गाड़ियों पर सिर्फ माँगने का धर्म ही निभाते हैं, और आगे बढ़ जाते हैं। सामने वाली गाड़ी के शीशे पर एक औरत अपनी गोद में बच्चा लिये चिपकी पड़ी है। उसे उम्मीद है कि कुछ न कुछ ज़रूर मिलेगा। पर तब तक ग्रीन लाइट हो जाती है। कहीं से कुछ नहीं मिलता। मेरा मन होता है कि कैब को रुकवाऊँ। उस औरत को कुछ दे ही दूँ। पर कर नहीं पाती। ग्रीन लाइट होते ही गाड़ियों की रफ़्तार बढ़ जाती है। मुड़ कर देखती हूँ, औरत अपनी गोद से बच्चा नीचे गिरा फुटपाथ के नज़दीक बैठी है। सोचती हूँ कैसी माँ है! बच्चे को नीचे फेंक दिया।
 
ड्राइवर कहता है। सर, यह देखिये! माँगने वालों ने माँ जैसे पवित्र रिश्ते को भी नहीं छोड़ा। झूठ-मूठ का बच्चा बनाकर ख़ूब पैसा ऐंठते हैं।
"क्या....!" प्रशांत के साथ मेरी निगाहें भी उस औरत की तरफ पीछे घूमी।
"तभी तो लोग और संवेदनहीन होते जा रहे हैं। और इस चक्कर में ज़रूरतमंदों की भी कोई मदद नहीं करता।" प्रशांत ने औरत की ओर देखते हुये कहा।
"देखा, तुमने! उस माँगने वाली औरत के हाथ में कोई बच्चा नहीं था। माँगने के लिये ही उसने सारा ढोंग रचा था।" मेरी ओर देखते हुये प्रशांत बोले।
माँ जैसे रिश्ते भी कितने प्रोफेशनल हो गये हैं। मैं जैसे बुदबुदायी। माँ शब्द के आते ही। फिर ध्यान चीकू पर आ जाता है। मेरी आकांक्षाएँ और उम्मीदें बढ़ जाती हैं। जो मैं न कर सकी, उसकी छवि चीकू में देखती हूँ। अचानक मुझमें और उस माँगने वाली औरत में कोई अंतर नज़र नहीं आता। वो भी तो अपनी उम्मीदों को पूरा करने लिये एक ठूँठ को अपना बच्चा बनायी बैठी है और मैं भी तो चीकू को अपनी उम्मीदों का बोझ ढोने के लिये ठूँठ बनाने पर तुली हूँ। मेरे पिताजी भी कहाँ अलग हैं। वे भी तो मुझसे यही उम्मीद और आकांक्षा पाले थे, जो मैं अब चीकू में देखने की कोशिश कर रही हूँ। नहीं...नहीं, मैं चीकू को ठूँठ नहीं बनने दूँगी।
 
गाड़ी झटके साथ रुकती है। घर आ गया था।

- अमित पमासी
 
रचनाकार परिचय
अमित पमासी

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कथा-कुसुम (1)