प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

धारावाहिक

गवाक्ष: 3
 


सत्यव्रत  कोई नाम है भला! मित्रों ने जब उसको सैवी के नाम से पुकारना शुरू किया और सैवी ने अपना देश,अपना आचरण, अपनी तहज़ीब,अपने संस्कार भूलकर अंग्रेज़ियत का जामा  पहना तब वह भूल गया माँ की कोख! एक बार क्षुधा बढ़ती है तो बढ़ती ही जाती है, सैवी की क्षुधा का किनारा ही नहीं था। वह उस प्रत्येक वस्तु अथवा व्यक्ति को पा लेना चाहता था जो उसे आकर्षित करती थी। उसके साथ मित्रता करने के लिए लड़के,लड़कियों में होड़ लगी रहती। अपने बड़े से बंगले के 'आऊट-हाऊस' को सैवी ने अपनी इच्छा व आवश्यकतानुसार सजवा लिया था। माँ तो पिता के जाते ही अधमरी हो गईं थीं, सेवकों  की भीड़ की कमी न थी। सैवी सुबह-शाम माँ के पास एक चक्कर  काटकर अपने कर्त्तव्य की पूर्ति कर देता।

उसकी अपनी ज़िंदगी में शोर-शराबा,विदेशी मदिरा,विदेशी संगीत,देशी-विदेशी लड़के-लड़कियों का  जमघट –- और बेइंतिहा धन! उसके शुभेच्छुओं ने उसे कई बार समझाने का प्रयास किया परन्तु उस समय  धन की अधिकता ने उसकी दुनिया को सात रंगों व सात सुरों से भर दिया था।किसी को कुछ न मानना उसका शगल  हो गया था । हाँ,दिन में एक बार वह अपने व्यवसाय की मुख्य शाखा में जाता अवश्य था संभवत:यह महसूस करने  के लिए कि वह इतने बड़े 'साम्राज्य' का एकमात्र मालिक है।

 

वह बिना इधर-उधर देखे सीधा अपने 'चैंबर' में जाता,कुछ देर वहाँ की व्यवस्था देखता ,मैनेजरों की टोली ,कर्मचारियों का हुजूम, क्लर्क,चपरासी से लेकर'सी.ए' तक की सुव्यवस्था उसके पिता के समय से चल रही थीं ।अपने गर्व व  अकड़ में जकड़ा वह कर्मचारियों  से कुछ समय  वार्तालाप करता, उन महत्वूर्ण अधिकारियों  से चर्चा करता जिनके कंधों पर व्यवसाय का संपूर्ण उत्तरदायित्व था और जितना धन उसे निकालना होता, लेकर आ जाता। वह भली  प्रकार जानता था उसके सभी व्यवसाय लाभ में चल रहे हैं। पिता की अनुपस्थिति में अब उसके लिए कोई व्यवधान नहीं था।

 

एक दिन सैवी  ने अपने कॉलेज की ज़हीन छात्रा स्वाति को अपनी  'फैक्ट्री' के द्वार पर ऑटोरिक्शा से उतरते  देखा और वह बैचैन हो उठा। अपने कॉलेज के दिनों से वह उसे पसंद करने लगा था परन्तु वह एक मध्यवर्गीय स्वाभिमानी छात्रा थी । उसने पैसे वाले उस बिगड़ैल रईस की ओर कभी ध्यान  नहीं दिया था। कई बार प्रयास करने पर भी वह उसके हाथ न लगी। उस लड़की में अवश्य ही ऐसा कुछ था जिसे वह कई वर्ष पश्चात भी भुला नहीं पाया था। वह अपने कार्यालय  में किसी से उसके बारे में कुछ पूछ नहीं  सकता था,यह उस जैसे अकड़ू रईस  के लिए असम्मानजनक व अशोभनीय था । अपने अहं में वह उसके बारे में अपनी मित्र-मंडली से भी बात नहीं कर सकता था,उसे अपनी मखौल बनने का भय था ।फिर भी उस युवती के बारे में जानने के लिए  वह इधर-उधर  हाथ  -पैर मारता रहा। कुछ दिनों में उसे ज्ञात हुआ लड़की उसकी ही फैक्ट्री के कर्मचारी की बेटी थी जो अपने पिता की अस्वस्थता के कारण उन्हें कुछ दिनों से दवाई व भोजन देने आती थी। अब उसका साहस  बढ़ गया, उसने चुपचाप स्वाति का पीछा करना शुरू किया और एक दिन उसके सामने जाकर अपनी गाड़ी रोक दी,स्वाति आश्चर्य में भर उठी । उसे यह ज्ञात नहीं था कि उसके पिता सैवी के यहाँ  साधारण से कर्मचारी हैं। 

 

"स्वाति ! तुम मुझसे इतना क्यों भागती हो?" उसने  स्वाति से पूछा ।

"हम एक ही कॉलेज में पढ़ते थे, एक-दूसरे से भली-प्रकार से परिचित हैं। तुम इतनी अकेली क्यों रहती हो? आखिर मैं एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हूँ , तुम्हारे साथ कोई ---।" उसके प्रत्येक शब्द से 'अहं' रिस रहा था। 

"अपनी प्रतिष्ठा से अधिक अपने चरित्र पर ध्यान देना बेहतर है क्योंकि चरित्र वह  है जो वास्तव में आप  हैं और प्रतिष्ठा वह है जो आपके बाहरी आचरण से लोग आपके  बारे में बनाते हैं।" उस चुप रहने वाली लड़की ने उसकी बात बीच में ही काट दी थी और उस अकड़ू के समक्ष  वह इतनी बड़ी बात कह गई थी।अपने  एक साधारण से कर्मचारी  की अदनी सी बेटी से इस प्रकार के तीक्ष्ण प्रहार की बात तो वह स्वप्न में भी सोच नहीं सकता था, वह बगलें झाँकने लगा था। 

"जहाँ तक अकेले होने की बात है, मैं कभी अकेली नहीं हूँ। मेरा वास्तविक मित्र मेरा ज़मीर, मेरा परमात्मा हर पल मेरे भीतर रहता है,मेरे पास रहता है। आपके मित्र तब तक आपके साथ हैं जब तक आपकी जेबें भारी हैं। कभी आवश्यकता पड़ने पर इन मित्रों को आज़मा लीजिएगा  --और हाँ,किसीको  जीतने के लिए केवल विनम्रता,स्नेह व प्रेम की ज़रुरत होती है न कि दिखावे ,धन अथवा घमंड की ----"

 

वह स्वाति की बात सुनकर भन्ना गया था परन्तु न जाने क्यों इस घटना के पश्चात वह उसकी ओर अधिक झुकाव महसूस करने लगा। जो उसके जीवन से तिरोहित हो चुकी थी अचानक ही उसके मस्तिष्क के अंधियारे को चीरकर ध्रुव तारे की भाँति जगमग करने लगी। वह अपने इस बदलाव को समझ नहीं पा रहा था। उसके मन के भीतर से मानो कोई बरबस स्वाति के शब्दों की पुनरावृत्ति कर रहा था।उसने अपने मित्रों से  इस विषय पर बात करने की चेष्टा की तो स्वयं ही उपहास का पात्र बनने लगा। उसे लगा स्वाति उसकी लपेट में कभी नहीं आ सकेगी। हाँ,संभवत: विवाह का बंधन उसे उसके समीप ला  सके। न जाने क्यों इस बार उसे उस माँ का ध्यान आया जिसे उसने पिता के दिवंगत होने के पश्चात केवल 'माँ 'के 'शो-पीस'  के रूप में  जैसे घर में एकाकी रहने के लिए बाध्य कर दिया था। उसने इस विषय पर 'माँ' से चर्चा करना उचित समझा। माँ एक सुलझी हुई स्त्री थीं जो बेटे से भली-भाँति परिचित थीं। उन्हें एक साधारण वर्ग की लड़की के प्रति  अपने बेटे का झुकाव उसके व परिवार के लिए हितकर लगा । वे  अपने पति की मृत्यु के पश्चात अपनी तथा घर की स्थिति व परिस्थिति सब कुछ समझती थीं,यहां प्रश्न केवल उनके बेटे व परिवार का नहीं था किसीकी लाड़ली ,बुद्धिमति ,स्नेहमयी युवा लड़की के भविष्य का भी था । बेटे पर उन्हें रत्ती भर भी विश्वास नहीं था किन्तु  उन्होंने स्पष्ट रूप से बेटे से पूछा था ; " सत्य ! तुम उस लड़की से विवाह करोगे? विवाह-संस्था पवित्र संस्था  है, इसका तुम्हें ध्यान रखना होगा और उस लड़की को परिवार में पूरा सम्मान देना होगा। "

 

'हाँ, कहने में कितनी देर लगती है? ज़रा सी गर्दन ही तो हिलानी पड़ती है',उसने सोचा। वह स्वाति की ओर आकर्षित था परन्तु उसको नीचा भी दिखाना चाहता था। विवाह के अतिरिक्त उसके निकट जाने का उसके पास कोई और उपाय नहीं था। 

हमारे समाज में विवाह जीवन का लक्ष्य माना जाता है। सत्यव्रत की माँ उसका विवाह करके अपना  कर्तव्य पूरा करना चाहती थीं, वे उसके 'हाँ' की प्रतीक्षा कर रहीं थीं। उन्होंने तुरंत ही स्वाति के पिता को बुलवाकर उनके सम्मुख सत्यव्रत उर्फ़ सैवी के विवाह का प्रस्ताव रख दिया। स्वाति  के पिता हतप्रभ थे किन्तु वे इस  तथ्य से परिचित थे कि उनका मालिक उनकी बेटी का सहपाठी रह चुका है।

 

"बेटा ,क्या तुम इस रिश्ते को स्वीकार करोगी?" स्वाति की माँ ने उसके पिता से चर्चा करने के पश्चात  अपनी योग्य बिटिया से पूछा।  पहले उसने अपनी असहमति दिखाई बाद में संभवत: अपने पिता की आर्थिक स्थिति व चार अन्य बहनों के बारे में सोचकर उसने  सहमति दे दी।उसे आभास था संभवत:विवाह के पश्चात उसकी स्थिति 'जल बिन मीन' सी हो सकती थी परन्तु बहुत से तथ्यों को जानते हुए भी  कई कारणों से उसने स्वीकार कर  ही लिया। जीवन में मनुष्य कई बार ऐसे चौराहों पर आकर अटक जाता है कि वह सचेतावस्था में भी गलत मार्ग  चुनने के लिए बाध्य  होता है  फिर उसे सही मार्ग तलाशने के लिए जूझना पड़ता है, कमर कसकर समस्याओं के  लिए जीवन-संग्राम में उतरना पड़ता है। यही स्वाति के साथ घटित हुआ ।

 

 

स्वाति की सभी बहनें योग्य थीं ,तीन अपने पैरों पर भी खडी हो चुकी थीं परन्तु उसके माता-पिता को बेटियों के विवाह की चिंता में घुन लग रहा था। स्वाति ने कुछ अधिक नहीं सोचा, वह सबसे बड़ी थी, उसके  विवाह के पश्चात उसकी अन्य बहनों के विवाह का मार्ग खुलने की संभावना थी।

 शर्त रखी गई परिवार की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए उसे नौकरी छोड़नी होगी और आनन-फानन में विवाह हो गया। बेमेल परिवारों के इस मेल से पूरा समाज आश्चर्यचकित था। सैवी का बदला पूरा हो चुका था।

 

प्रथम मिलन की रात्रि में स्वाति ने अपने संस्कारों के तहत पति के पैर छुए "यह क्या बकवासबाज़ी  है ----यह मत समझना  इन दिखावटी बातों से मैं तुम्हारे प्रभाव में आ जाऊंगा ---" और वह झल्लाकर कमरे से बाहर निकल गया। स्वाति चुपचाप उसे देखती रही थी। वह पुरातन अंधविश्वासी परंपराओं से जकड़ी हुई नहीं थी। सब कुछ जानते, समझते, बूझते उसने सत्यव्रत जैसे लड़के को पति के रूप में  स्वीकार किया था। विवाह उसके लिए चुनौती था तो पति को सदमार्ग पर लाना, माँ व  पुत्र के बीच सेतु बनना, सत्यप्रिय  के ह्रदय में माँ के प्रति आदर व मान-सम्मान को प्रस्थापित करना और भी  बड़ी चुनौती थी। उसे सोचना यह था कि किस प्रकार से अपने अड़ियल पति को हितकारी मार्ग पर लाया जा सकता था ?  

 

उसने स्वाति को नक्षत्र की पवित्र बूँद के रूप में स्वीकार नहीं किया था वरन अपना आसमान तलाशती एक कोमल चिड़िया के पँख कतरकर उसे सोने-जवाहरात के जगमगाते पिंजरे में कैद कर दिया था।सैवी ने अपना बदला बहुत उस्तादी से ले लिया था। स्वाति बहुत गंभीर व बुद्धिशाली थी, सब कुछ समझते हुए भी विरोध न करने वाली लड़की ने अपनी सास के साथ रहकर उनके जीवन का एकाकीपन समाप्त कर दिया था। 

"अपने भीतर के मित्र के साथ आनंद करो और मुझे अपने मित्रों के साथ मस्ती करने दो।" विवाह के पश्चात सैवी फिर से बनावटी मित्रों की दुनिया में अपने ‘आउट-हाऊस’ में लौट गया था।

 

"ये ही आपकी दिवंगत पत्नी हैं न?" कॉस्मॉस ने मंत्री जी के पलँग के ठीक सामने की दीवार पर लगी उस सौम्य महिला की तस्वीर को आदर की दृष्टि से  देखते हुए पूछा। 

" हाँ,कॉस्मॉस! तुमने ठीक पहचाना। वास्तव में चेहरे का दर्पण मनुष्य के भीतर की सादगी प्रतिबिम्बित कर ही कर देता है किन्तु मैं तो महामूर्ख व अहं से भरा हुआ था। मैं कहाँ उस समय जानता था कि मैं जिसे धूप में चमकता हुआ काँच का टुकड़ा समझ रहा हूँ ,वह तो एक नायाब  हीरा है!"मंत्री जी ने अपनी  पलकों पर आए आँसू पोंछ लिए । आँसुओं को अपनी हथेलियों में  समेटते हुए मंत्री जी के काँपते हाथों को कॉस्मॉस ने देखा। 

"वह एक अलग ही दौर था कॉस्मॉस! उस समय  मैं  इंसान को इंसान कहाँ समझता था। कहाँ इस संवेदन को महसूस कर पाता था कि सबके भीतर एक जैसी ही तो भावनाएं हैं , संवेदनाएं हैं । मुझ जैसे ही प्राण उसके भीतर भी है,उसकी भी कुछ इच्छाएँ हो सकती हैं,सपने हो सकते हैं। मैं तो अपने ही जवानी व पैसे के गुरूर में भीतर तक डूबा  हुआ था।लेकिन हर बार तो आपकी ही तूती नहीं बोल सकती? कभी  न कभी सबको कड़वा स्वाद भी चखना पड़ता है।" मंत्री सत्यव्रत जी के मन के आँगन में न जाने  कितने धुंध भरे द्वार खुलने लगे थे ।

 

"स्वाति को मैं एक मिट्टी का लौंदा समझकर लाया था जहाँ  बैठा दो, वहीं बैठ जाएगी, यह कहाँ सोचा था कि वह मिट्टी की माधो नहीं थी! कभी-कभी मनुष्य सब कुछ जानता ,समझता है,सब बातों से सुपरिचित भी होता है किन्तु उसकी 'अकड़',उसका बेतुका 'अहं' उसका पीछा छोड़ता ही नहीं। बस कुछ ऐसी ही परिस्थिति से सत्यव्रत गुज़र रहा था। धन की गरमी के आगे तो अच्छे अच्छे पिघल जाते हैं लेकिन यह स्वाति थी, अपने स्वयं के  संस्कारों में रची-बसी, कर्तव्यों तथा अधिकारों के प्रति भी खूब चैतन्य!वह समय को अपने श्रम व गंभीरता से जीतना जानती थी। अपने कर्तव्य  करने के पश्चात ही अधिकार समक्ष रखती व उन्हें प्राप्त करती थी "

 

मंत्री जी अपने जीवन की पुस्तक के कई दीमक लगे पृष्ठ पलटने लगे थे ।

                                                                                                           क्रमशः


- डॉ. प्रणव भारती