प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -35

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख
ईसाईयत और संस्कृत
 
 
ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने जैसे-जैसे भारत में अपने पाँव पसारे, ईसाई धर्मप्रचारकों या पादरियों की इस देश में आवाजाही का सिलसिला शुरू हुआ। इन पादरियों ने संस्कृत सीख कर संस्कृत में धर्म-प्रचार की दृष्टि से पुस्तकें लिखीं, या बाइबिल के संस्कृत में अनुवाद किये। संस्कृत के पण्डितों से संवाद का भी उपक्रम उन्होंने किया। इन्ही में से एक रोजरियो थे, जिन्होने ‘ब्राह्मणरोमनकैथोलिकसंवादः’ नामक अपनी पुस्तक में ब्राह्मण और कैथोलिक प्रचारक के बीच वाद और संवाद में ईसाई मत को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। संस्कृत के कुछ पण्डित इन पादरियों की संस्कृत रचनाओं से प्रभावित हुए। इनमें से रामराय ने अपने ‘ईसाईविवरणामृतम्’ में हिन्दू धर्म का खण्डन करते हुए मसीही धर्म के पक्ष का पोषण किया।
 
जान म्यूर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के द्वारा संस्थापित हेलीबरी के महाविद्यालय में भारतीय इतिहास व प्रशासन का प्रशिक्षण प्राप्त कर के सन् 1828 ई. में आइ.सी.एस. अधिकारी के रूप में भारत आये तथा सन् 1853 ई. तक यहाँ रहे। एक वर्ष इन्होंने विलियम कैरी से कलकत्ता के फोर्ट विलियम कालेज में बंगला भाषा सीखी। तदनन्तर संस्कृत भाषा का अध्ययन किया। संस्कृत गद्य व पद्य रचना में ये दक्ष थे। इलाहाबाद में बोर्ड आफ रेवेन्यू  के सचिव तथा आज़मगढ़ में कलेक्टर के रूप में कार्य किया और सन् 1844-45 ई. में संस्कृत कालेज के अध्यक्ष रहे। इन्होंने अंग्रेज जाति के इतिहास पर संस्कृत में ‘नूत्नोदन्तोत्सः’ (नूत्न-उदन्त-उत्सः) नामक ग्रन्थ लिखा, जिसका अन्य नाम ‘इङ्ग्लैण्डाख्यदेशरीतिवर्णनम्’ था। उन्होंने पण्डितों को झिंझोड़ते हुए ईसाई धर्मप्रचार की भावना से संस्कृत में ‘मतपरीक्षा’ नामक खण्डनग्रन्थ का प्रणयन किया। इस ग्रन्थ में हिन्दू धर्म के बहुदेववाद आदि सिद्धान्तों की अनुपयुक्तता बताते हुए ईसाई धर्म को प्रतिष्टित करने का प्रयास था, पर संस्कृत माध्यम से संस्कृतशास्त्रों के अध्यापन के म्यूर हिमायती थे। इन्होंने ईश्वरवाद पर संस्कृत में ग्रन्थ लिखने के लिये पचास रुपये के पुरस्कार की घोषणा की।
 
जे.आर.बेलेंटाइन (सन् 1813-1864 ई.) सन् 1846-61 ई. की अवधि में बनारस संस्कृत कालेज के अध्यक्ष रहे। संस्कृत व्याकरण की रचना की, सांख्यसूत्रों तथा वेदान्तसार का अंग्रेजी अनुवाद किया। भारत से लौटकर इण्डिया ऑफिस लाइब्रेरी के अध्यक्ष रहे। बेलेंटाइन ने बाइबिल के अनेक अंशों का संस्कृत अनुवाद कर के प्रकाशित कर पण्डितों को उकसाया कि वे अपने शास्त्रों के आधार पर क्रिश्चियन धर्मग्रन्थों की प्रामाणिकता की मीमांसा करें। उनकी पुस्तक Christianity Contrasted with Hindu Philosophy ने भी पण्डितों के बीच खलबली मचा दी थी। बेलेंटाइन को कट्टर क्रिश्चियनों का भी कोपभाजन बनना पड़ा क्योंकि उन्होंने क्रिश्चिन ईश्वर की वेदान्त के निर्गुण ब्रह्म से तुलना करने का साहस किया था। विचलित होकर बेलेंटाइन ने काशी के जाने माने पण्डितों से इस विषय पर अभिमत या व्यवस्था देने का अनुरोध किया। उनके अनुरोध पर विट्ठल शास्त्री और बापूदेव शास्त्री जैसे दिग्गज पण्डितों के साथ काशी के सोलह पण्डितों ने हस्ताक्षर कर के जो व्यवस्था दी, उसे वैलेंटाइन ने ‘Bible for Pundits’ नामक अपनी पुस्तक में प्रकाशित किया। बनारस संस्कृत कालेज में बेलेंटाइन के ही प्रशासन के दौरान पण्डितों के बीच अरस्तू के सत्ताविमर्श पर एक परिसंवाद का आयोजन हुआ।
 
एफ.ई.हाल सन् 1851 ई. में जब बैलेंटाइन संस्कृत महाविद्यालय के अध्यक्ष थे, तब उस संस्था में सहायक प्राचार्य रहे। इन्होंने नीलकण्ठ शास्त्री गोरे द्वारा लिखित भारतीय दर्शन के खण्डनपरक ग्रन्थ षड्दर्शनदर्पण का अंग्रेजी अनुवाद किया।
विलियम केरी ने बाइबिल का संस्कृत में अनुवाद ‘धर्मपुस्तकम्’ के नाम से कराया। ये कलकत्ता में बाप्टिस्ट चर्च से सम्बद्ध रहे। इनका बाइबिल का संस्कृत अनुवाद तीन खण्डों में सन् 1808 ई. से सन् 1811 ई. के बीच छपा। कलकत्ता में बिशप कालेज के प्राचार्य डब्ल्यू. एच्. मिल ने अनेक ईसाई धर्मग्रन्थों के संस्कृत अनुवाद किये, 5000 श्लोकों में खृष्टसङ्गीतम् या ईसाई गीता का भी इन्होंने प्रणयन किया तथा चर्च में संस्कृत में प्रार्थनाएँ कराने की पद्धति का भी आरम्भ किया। म्यूर ने इतिहासतमोमणिः, निस्तारमार्गदीपिका, ईशुख्रिष्टमाहात्म्य, पापमोचनम्, यथार्थे पापदर्शनम्, परमात्मस्तवः, ईश्वरोक्तशास्त्रधारा आदि अनेक परिचयात्मक पुस्तकें संस्कृत में लिखीं। इससे खिन्न तथा उत्तेजित होकर संस्कृत के अनेक पण्डितों ने विल्सन, केरी या म्यूर जैसे अंग्रेज विद्वानों के इस प्रकार के साहित्य के खण्डन में लेखनी उठाई। खण्डनात्मक लेखन करने वाले पण्डित थे– नीलकण्ठ गोरे, हरचन्द्र  तर्कपंचानन, सौमनाथ पण्डित आदि। इनमें नीलकण्ठ गोरे प्रारम्भ में ईसाई विद्वानों के द्वारा किये जा रहे इस धर्मप्रचार के विरुद्ध थे, बाद में वे स्वयं ईसाई हो गये और उन्होंने षट्दर्शनों के खण्डन पर पुस्तक लिख डाली। के.पी. ऊर्मिस ने गिरिगीता में Sermons on the Mountain का संस्कृत अनुवाद किया।
 
पी. सी. देवस्सिया (जन्म सन् 1906 ई.) ने क्रिस्तुभागवतम् में ईसा मसीह का गरिमामय जीवन चरित महाकाव्यात्मक शैली में निबद्ध किया है। इस महाकाव्य में 33 सर्ग तथा 1600 पद्य हैं। प्रथम छह सर्गों में ईशु के जन्म के पूर्व की वर्जिन मेरी से सम्बद्ध वृतान्त हैं। सप्तम सर्ग में ईशु जन्म का निरूपण है। नवम सर्ग में मासूम जनों के नरसंहार के चित्रण में करुण, भयानक व बीभत्स रसों का उद्रेक हुआ है। दसवें सर्ग में यीशु का बचपन, तेरहवें में विवाह भोज तथा यीशु के द्वारा किये गये चमत्कारों का चित्रण है। पच्चीसवें में नका जेरूसलम् में प्रवेश, 26वें में प्रलय, सत्ताइसवें में अंतिम भोज, अट्ठाइसवें में क्रॉस पर यीशु की यन्त्रणा तथा बत्तीसवें और तैंतीसवें सर्गों में उनका पुनरुत्थान व आरोहण वर्णित है । यीशु के वचनों को बेबाक व गरिमामय भाषा में ढाला गया है।
भविष्यपुराण के प्रतिसर्ग पर्व में बाइबिल में वर्णित नोह की कथा के साथ यीशु मसीह का चरित्र बताया गया है। यीशु के भारत आगमन की चर्चा इस पुराण में नहीं की गई। एम.जी. धळफळे ने हाल ही में पालि में लिखी एक पाण्डुलिपि प्रकाशित की है, जिसमें यीशु के भारतप्रवास का वर्णन है।
 
(तथ्य मेरी पुस्तकों– 'संस्कत साहित्य का समग्र इतिहास' तथा Theory and Practcice of Vāda से संकलित)

- राधा वल्लभ त्रिपाठी
 
रचनाकार परिचय
राधा वल्लभ त्रिपाठी

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