प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे!
सरल भाषा के पक्षधर थे महात्मा गाँधी!!
(विश्व हिंदी दिवस- 10 जनवरी )
 
 
आज तक यह मसला नहीं सुलझा है कि हिंदी मातृ-भाषा, राष्ट्र-भाषा, संपर्क-भाषा में से क्या है। राजभाषा घोषित तो की गयी है किन्तु है भी या नहीं? है तो कितनी है? देश की मातृ -भाषा तो वह नहीं है, क्यूंकि देश में अनेक मातृ-भाषाएँ बोली जाती है। राष्ट्र-भाषा एक ऐसा विशेषण है जिसे गाँधी जी मानते थे, लेकिन भारत के संविधान ने मान्यता प्रदान नहीं की। संपर्क-भाषा तो वह निश्चित रूप से है, लेकिन उसे मानने में भी चंद अंग्रेजीदां विद्वान गुरेज करते हैं।
आज जब हम राष्ट्र- भाषा की बात करते हैं तो वह एक राजनीतिक मुद्दा हो जाता है और अनेक प्रकार की दुरभिसंधियां सामने आने लगती है। गाँधी जी का स्पष्ट मत था कि ‘राष्ट्र-भाषा के बिना देश गुंगा है’।( मेरे सपनों का भारत- लेखक- मोहनदस करमचंद गाँधी, पृष्ठ -169) वे जानते थे कि जन-मन की भाषा हिंदी और हिन्दुस्तानी है और देश के अधिकांश लोग इन्हीं भाषाओँ में संपर्क करते हैं। गाँधी जी क्लिष्ट और दुरूह हिंदी  की जगह ऐसी हिंदी के पक्षधर थे, जिसमे हिंदी-उर्दू का शब्द -संस्कार और ज्ञान समाहित हो।
 
संविधान निर्माताओं ने संविधान में राष्ट्र-भाषा का कोई कौलम नहीं बनाया। हिंदी को प्रमुख रखने की कोशिश की, लेकिन देश की सभी महत्वपूर्ण भाषाओँ को भी उनका स्थान दे दिया। आजादी मिलने के बाद तात्कालिक दबाव कुछ ऐसे रहे कि संविधान में हिंदी सिखने-सिखाने की अनिवार्यता को भी ढुलमुल ढंग से लाया गया।
संविधानने अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की भाषा हिंदी और लिपि देवनागरी का विधान था लेकिन संविधान में दी गयी छूट के अनुसार पन्द्र वर्षों तक अर्थात 1965 तक संघ की भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग किया जाना था। संसद को अधिकार भी दिया गया था वह चाहे तो संघ की भाषा के रूप में अंग्रेजी के प्रयोग की अवधि को बढा सकती है, जिसके परिणामस्वरूप संसद ने 1963 में राजभाषा अधिनियम, 1963 पारित करके यह व्यवस्था कर दी कि संघ भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग 1971 तक चलता रहेगा, लेकिन कालांतर में इस नियम में भी संशोधन करके यह व्यवस्था कर दी गयी कि संघ की भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग अनिश्चित काल तक रहेगा।
राष्ट्र- भाषा के क्या गुण होने चाहिए, गांधी जी ने ‘मेरे सपनों का भारत में बहुत स्पष्ट रूप से बताया कि शासन-प्रशासन में काम में आने वाली भाषा सरकारी नौकरों के लिए आसन होनी चाहिए, लेकिन हुआ इसके विपरीत। पारिभाषिक शब्द बनाने वाली समितियों और राजभाषा के तौर पर हिंदी को लागू करने वाले अधिकारिओं ने हिंदी को इतना संस्कृतनिष्ठ और दुरूह बना दिया कि सरकारी कर्मचारियों को अंग्रेजी उससे आसान लगने लगी।
 
गाँधी जी को हिंदी में गुण ही गुण दिखाई देते थे। इसी कारण वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ‘जिस भाषा को करोड़ों हिन्दू-मुसलमान बोल सकते हैं, वही अखिल भारतवर्ष की सामान्य भाषा हो सकती है’। गाँधी जी का विचार था कि ‘समूचे हिन्दुस्तान के साथ व्यवहार करने के लिए हमको भाषाओँ में से एक ऐसी भाषा या जवाब की जरुरत है जिसे आज ज्यादा से ज्यादा लोग जानते और समझते हों और बाकी लोग उसे झट से सीख सकें। इसमें शक नहीं कि हिंदी ऐसी ही भाषा है(राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी, पृष्ठ स. 113)। वे मानते थे कि भारत गरीब लोगों का देश है, उन्ही की भाषा बोलेगा तो उसका स्वरुप, उसके जनतंत्र का स्वरुप भी अलग होगा। अगर वह संपन्न लोगों की भाषा अंग्रेजी बोलेगा तो यह जनतंत्र संपन्न लोगों का हो जायेगा। ‘मरे सपनों का भारत’ में उन्होंने लिखा है कि ‘अगर स्वराज्य करोड़ों भूखों का, करोड़ों निरक्षर बहनों और दलितों का व अन्त्यजों का हो और हम सबके लिए हों तो हिंदी ही एक राष्ट्र-भाषा हो सकती है (मेरे सपनों का भारत, पृष्ठ स. 182)। 
गाँधी जी हिंदी को राष्ट्र-भाषा मानते थे, क्यूंकि वह राष्ट्र-भाषा होने के लायक थी एवं सीखने में उनके अनुसार सरल एवं सुगम थी। उनका कहना था कि अगर हिन्दुस्तान को सचमुच हमें एक राष्ट्र बनाना है तो चाहे कोई माने य न माने राष्ट्र-भाषा हिंदी बन ही सकती है, क्यूंकि जो स्थान हिंदी को प्राप्त है, वह किसी दूसरी भाषा को कभी नहीं मिल सकता।( मेरे सपनों का भारत, पृष्ठ स. 183) गाँधी जी का साफगोई प्रांतवादी चिंतकों को रास नहीं आई और इसी कारण संविधान के निर्माण के साथ ही हमारी भाषाई समस्या के बीज पद गए जो कि आज विकराल रूप ले चुके हैं।
 
क्षेत्रीयतावादी नजरिया बोलियों को भी भाषा का दर्जा दिलाने पर उतारू है। संविधान सम्मत 22 भाषाओँ के अलावा उनकी संख्या 58 होने तक की नौबत आ रही है। हमारी कागजी मुद्रा पर सभी 22 भाषाओँ का उल्लेख है। वह दिन दूर नहीं कि रूपये के नोट भाषाओँ की संख्यायों और भाषाओँ के विवरणों से भर जायेंगे और गाँधी जी का चित्र उसमे से गायब हो जायेगा, क्यूंकि रूपये में स्थान ही न बचेगा। 
प्रांतीय भाषाओँ का अपना महत्व होता है, लेकिन हिंदी के राष्ट्र-भाषा होने का स्वाभाविक स्वरुप उनके कारण न बिगड़े, ऐसा गांधी जी का मत था। उन्होंने लिखा कि हमारी पहली और बड़ी से बड़ी समाज सेवा यह होगी कि हम प्रांतीय भाषाओँ का उपयोग शुरू करें। हिंदी को राष्ट्र-भाषा के रूप में उसका स्वाभाविक स्थान दें।(पृष्ठ स. 116) । गाँधी जी प्रांतीय भाषाओँ के पक्षधर थे और उन्होंने यहाँ तक कहा कि ‘प्रांतीय कामकाज प्रांतीय भाषाओँ में करें और राष्ट्रिय कामकाज हिंदी में करें’।(पृष्ठ स.- 146) । गाँधी जी ने कितना सीधा, सरल फार्मूला उन्होंने दिया, जो आजतक हमारे देश के शासक समझ नहीं पाए।
 
राज्यों में प्राथमिक स्तर पर हिंदी को अनिवार्य करने के मुद्दे को दक्षिण भारतीयों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण हिंदी की अनिवार्यता को नकार दिया। गाँधी जी की भाषा नीति यह चाहती थी कि ‘हमें अपनी सभी भाषाओँ को उज्जवल-शानदार बनाना चाहिए। हमें अपनी ही भाषा में शिक्षा लेनी चाहिए’।( हिन्द स्वराज, पृष्ठ स. 74)
गाँधी जी भाषा को सांस्कृतिक, राजनैतिक स्तर पर देखते थे और खुलकर कहते थे थे कि अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है। ‘अंग्रेजी शिक्षा से देश में दंभ, द्वेष,जुल्म आदि बढ़ रहे हैं। अंग्रेजी शिक्षा  पाय हुए लोगों ने प्रजा को लुटने में, उसे परेशान करने में कोई कसर नहीं उठा रखा है’। (हिन्द स्वराज, पृष्ठ स. 73) जिस देश में न्याय अंग्रेजी में मिलता हो, वहां जन-मन को इन्साफ नहीं मिल सकता। 
गाँधी जी व्यंग्य में कहते थे कि ‘अगर कोई हमें यह कहता है कि हम अंग्रेजों की तरह अंग्रेजी बोल सकते हैं तो हम मरे ख़ुशी के फुले नहीं समाते। इससे बढ़कर दयनीय गुलामी और क्या हो सकती है? (पृष्ठ स. 115) यह गुलामी आज अपने विकराल रूप में है। गाँधी जी को बार-बार राजनैतिक मंचों पर अलग-अलग दल इस्तेमाल कर रहे हैं, काश कि वे उनकी भाषा-नीति को अमल में ला सके होते।

- नीरज कृष्ण