प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -39

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविताएँ
स्त्रियाँ 
 
स्त्रियाँ हैं अभिशप्त
अपने जन्मकाल से
हाँ, समय ज़रूर बदला है
पहले सब मूक था
अब शब्द हैं
मगर शब्दों के अर्थ भी
समयानुसार बदले हैं
 
स्त्री के लिए अलग
और पुरुष के लिए अलग
पुरुष ब्रह्मार्थ लिए है
इसलिए वह गुंजायमान है
स्त्री के शब्दों का अर्थ
निश्चल ध्वनिरहित है
 
गढ़े गए स्त्रियों के लिए
अभिव्यक्ति के अर्थ
अलग-अलग रूपों में
दयनीय से पूज्यनीय तक
अपेक्षित से उपेक्षित तक
वांछित से अवांछित में
 
चुम्बकीय आवरणों में लिपट
कोमल संवेदनाएँ
भ्रमित होती रहीं
टूटती बिखरती रहीं
और हर बार अभिशप्त स्त्री
होती रही अचंभित
हर क्रिया की प्रतिक्रिया पर
 
स्त्रियों की इच्छा और अनिच्छा का
प्रश्न ही नहीं था कभी
सीता ने भी कहाँ किया था प्रश्न
बस गुज़रते हुए अग्नि से
देखा था एक नज़र भर
मर्यादा के उत्तम अर्थ को
समा गई थी फिर
धरती की कोख में
हमेशा के लिए
 
भरी सभा में
ठहाकों और बेबसी के मध्य
द्रौपदी की चीख़ की ख़ामोशी के साथ
समस्त स्त्रियों के रुद्ध प्रश्न
युगों-युगों के लिए
अभिशप्त हो गए थे
अपमानित होने के लिए
 
गांधारी दिव्य स्त्री थी
महाकाल के महा इतिहास की
जानती थी वह
स्त्रियाँ हमेशा ही रहेंगी
प्रश्नों के केंद्र में
लेकिन प्रश्नकर्ता के रूप में नहीं
अपितु एक विचारणीय वस्तु के रूप में
और इसीलिए सारे प्रश्नों को भूल कर
बाँध ली थी उसने
अपनी आँखों पर पट्टी
 
अनुत्तरित प्रश्न सीता के
या फिर द्रौपदी के
या समस्त निर्भया जैसियों के
धरती की कोख में
पनपते और जन्मते रहते हैं
कभी-कभी भ्रूण में ही खंडित हो जाते हैं
 
इसीलिए युगों-युगों से
अस्तित्व के अग्नि-कुंड में
अपनी ही आत्मा की
आहुति देती स्त्रियाँ
मुस्कुराती रहतीं हैं हर रोज़
और ढल जातीं हैं फिर
मौन के महाकाव्य में
 
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तुममें होने का अर्थ
 
एक बार भाव
अपनी सुनहरी आँखों पर
ख्वाबों की रंगीन पट्टी बाँधकर
कर रहे थे कोशि
शब्दों को छूने की
और पहुँच गए
आनन-फानन में
तुम्हारी किताब के पन्ने तक
जिसे पढ़ रहे थे तुम उस वक़्त
 
तुमने कई कई बार पलटा
उस पन्ने को
जैसे कुछ तलाश रहे थे
जैसे कुछ अचंभित हो रहे थे
जैसे तुमने महसूस कर लिया था
कि उस वक़्त उन पन्नो में
कोई शब्द नहीं
'मैं' खुद अंकित थी
 
मैंने देखा
तुमने असहज होकर
किताब को बंद कर
दूसरी किताबों के मध्य
उसे रख दिया
और अपनी उँगलियों की
कम्पन पर क़ाबू पाने के लिए
अपने दोनों हाथों को
कोट की जेब में डाल लिया
 
तुम्हारी आँखे लेकिन
उस वक़्त भी
बार-बार उसी किताब पर
फिर-फिर आ रही थीं
जिसमें अंकित थी मैं
तुम्हारी चाहत में!
 
जानती हूँ तुम्हें भी प्रिय हैं
वे सारे भाव
जिसे तुमने
बंद करके रख दिए हैं
मगर मैं किताबों में नहीं हूँ
तुम्हारे अन्दर हूँ
तुम्हारी साँसों में हूँ
तुम्हारी परछाई हूँ
शायद कभी समझोगे
तुममें होने का अर्थ क्या है मेरे लिए!

- उमा झुनझुनवाला
 
रचनाकार परिचय
उमा झुनझुनवाला

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