प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

जो बरतरी को न समझे, न बेहतरी जाने
वो शख्स़ खाक़ भला सिन्फ़े-शायरी जाने

भरी हो जिनकी नज़र में हवस सभी के लिए
वो अपनी बेटी को क्यों नाज़ से परी जाने

तभी तो दाद ज़माने की रास आती नहीं
ये हाले-दिल है मगर लोग शायरी जाने

हज़ार होती कमी है सभी के जीवन में
किसी भी ज़िंदगी को मत हरी भरी जाने

उभर सके जो कभी दायरा-ए-रंज-ओ-ख़ुशी
फिर उसके बाद में इश्क़े-कलंदरी जाने

सुख़नवरी से तो चलता नहीं है घर कोई
ये बिन पगार की 'महबूब' नोकरी जाने


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ग़ज़ल-

पूछो कि मेरी सच्ची ख़बर किस के पास है
मेरी ज़मीं पे आज ये घर किस के पास है

मकतब उधर है और इधर सु-ए-मैक़दा
देखो कि अब वो जाता किधर, किस के पास है

बस्ती है ये ग़रीब की, बस प्यार है यहाँ
मत पूछ के सब लालो-गोहर किस के पास है

ये हौसला है मेरा की बिन पैर दौड़ लूँ
जज़्बा ये भला जिन्नो-बशर किस के पास है

दस बाय दस का मिलता है मुश्किल से झोपड़ा
सपनों का हसीं रंग नगर किस के पास है

रोते हुए जो आदमी को पल में हँसा दे
'महबूब' आज ऐसा हुनर किस के पास है


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ग़ज़ल-

हमें बच्चों से भी चाहत बहुत है
खिलौनों की मगर कीमत बहुत है

किये फ़ाके भी दुनिया से छुपा के
मेरे माँ बाप की इज़्ज़त बहुत है

बहाना खून आसां है यहाँ पर
रगों में बह रही नफ़रत बहुत है

सुकूं मिलता नहीं उस घर में यारो
भले ही ऐश है, दौलत बहुत है

ग़म-ए-फ़ुरकत सताये क्यूँ मुझे अब
मेरे दिल में तेरी क़ुरबत बहुत है

मेरी खुद्दारी बिकती कैसे 'महबूब'
यहाँ अच्छाई की कीमत बहुत है

 


- मेहबूब सोनालिया
 
रचनाकार परिचय
मेहबूब सोनालिया

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