प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संपादकीय
उत्तर की तलाश सभी को है पर प्रश्न करने का जोख़िम कोई नहीं उठाना चाहता!
 
समस्त राजनैतिक दल जब देशवासियों से परस्पर मिलजुलकर रहने का आह्वान करते हैं तो 'उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे' कहावत चरितार्थ होती नज़र आती है। इनकी भाषा, व्यवहार और पद की गरिमा को भूल किये गए तंज का सीधा प्रसारण प्रत्येक चैनल करता ही आया है। इसलिए इन्हें हमें समझाने की आवश्यकता तो तब है जब ये स्वयं यह सीख जाएं। यूँ भी नब्बे प्रतिशत भारतीय तो भाईचारे से ही जीना जानते हैं और जी भी रहे हैं पर क्या हमने कभी इन दलों को, किसी भी मुद्दे पर एक साथ खड़े देखा है? बचे दस प्रतिशत, इनकी खरीदी हुई भीड़ की नाचती कठपुतलियाँ हैं और भीड़ का मस्तिष्क नहीं होता यह सर्वविदित सत्य है। अधिकांश नेतागण भ्रष्टाचार से लड़ने, देश को गरीबी से मुक्त करने, रोजगार उपलब्ध कराने के खोखले वायदे तो ख़ूब करते हैं लेकिन अपनी-अपनी सुविधा और मौके के अनुसार। क्या इन्होंने देश की किसी भी समस्या का समाधान मिलजुलकर निकालने की कोशिश की है? ये तो ख़ुद ही भ्रष्टाचार में फंसे और अपनी गरीबी दूर करते नज़र आते हैं। दुर्भाग्य से, दस प्रतिशत ही ऐसे राजनीतिज्ञ शेष हैं जिन्हें सचमुच अपनी मातृभूमि से स्नेह है। तो बचे नब्बे प्रतिशत नेता हमारा भला करेंगे? कैसे और कब? क्योंकि इनका तो पूरा समय एक दूसरे पर कीचड़ उछालने, आरोप-प्रत्यारोप और बेतुकी बातों में जाया होता है। ये हमारे देश के दुश्मनों के नहीं बल्कि एक-दूसरे के ख़िलाफ़ सबूत ढूँढने में ज्यादा रूचि लेते हैं। इन्हें देश की नहीं अपनी कुर्सी की चिंता है और इनका पूरा समय उसे टिकाने की कोशिशों में और स्वयं को दूसरी पार्टी से बेहतर बताने में ही बीत जाता है। पार्टियाँ आती-जाती रहीं, स्वयं को श्रेष्ठ बताती रहीं और अपने कार्यकाल में विरोधी पार्टी की कमियाँ गिनाती रहीं। उनके बंद केस खुलवाकर जनता के सामने रखती रहीं। क्या इससे देश का विकास हुआ? सत्तारूढ़ पार्टी के जाने के बाद आने वाली हर पार्टी ने भी यही प्रोटोकाल दोहराया। इतिहास को हर बार उल्टा-पलटा गया। जनता ने हर बार धोख़ा खाया, हर बार ही उसने अपने निर्णय के लिए ख़ुद को धिक्कारा। और अगली बार दिमाग़ से वोट डालने की सोची, पर फिर वही ढाक के तीन पात। क्योंकि हम बेवकूफ़ से कहीं ज्यादा मजबूर हैं। हमारे पास विकल्प ही नहीं रहे।
 
राजनीति में सारे नेता ही बुरे हों, ऐसा भी नहीं! पर अकेला चना तो भाड़ नहीं फोड़ सकता न! दुर्भाग्य यह है कि इस 'व्यवसाय' में मात्र अच्छी सोच रखने से ही कुछ नहीं होता, सर्वसम्मति की आवश्यकता होती है जो कि मिलती ही नहीं क्योंकि दूसरे दलों को देश से ज्यादा अपनी नाक की फ़िक्र है। इसलिए समस्याएँ अब तक इसलिए नहीं जीवित हैं कि इनमें सुलझाने का माद्दा नहीं, समस्याएँ इसलिए भी जीवित हैं क्योंकि इनमें सुलझाने की चाहत ही नहीं!
 
कभी बीजेपी है, कभी कांग्रेस है, कभी आप है, कभी समाजवादी पार्टी, और भी कई नाम.....लेकिन इन सबके बीच अपना देश ढूँढे नहीं मिलता! क्योंकि इनके मुद्दों में देश कहीं है ही नहीं। हास्यास्पद है कि जो देशवासियों से एकता का आह्वान करते हैं वे ही संसद में खुद जूतमपैज़ार करते हैं। 
 
मीडिया हाउस में भी स्वयं को नंबर 1 पर देखने की होड़ है। कितना अच्छा होता यदि सारे चैनल मिलकर देश को प्रथम रख इसकी उन्नति के लिए कार्य करते। पर कुछ सत्ता के चाटुकार बने बैठे हैं और कुछ ने विपक्ष का मोर्चा संभाल लिया है। इक्का-दुक्का को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी दूध पीने वाले पत्थर, चोटी काटने वाला भूत, मक्कार स्वामी ओम और लोगों को बेवकूफ़ बनाती राधे माँ में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। राम-रहीम, हनीप्रीत टाइप तथाकथित लव स्टोरी या किसी मंत्री की सेक्स सी डी मिलते ही इनकी बांछें खिल उठती हैं। क्या इन समाचारों की देश को वाक़ई जरुरत है? 
अंधविश्वास की ख़बरों को दिखाकर उन्हें बुरा बोलने वाले ये चैनल सुबह से आपकी राशि और भविष्यफल की दुकान खोल लेते हैं। दोपहर में कोई प्रायोजित शक्तिवर्धक या लम्बाई बढ़ाने का टॉनिक बेचता एक घंटे का विज्ञापन चलता है तो कहीं निर्मल बाबा जैसे 'सुधारक' और 'कल्याणकारी बाबा' लोगों की समस्याओं का इलाज समोसे-चटनी के साथ करते नज़र आते हैं। क्या इन चैनलों ने आम आदमी की समस्या और सुधार पर विस्तार से बात की है कभी?? यदि की है तो कितने मिनट? हत्या हो या कोई भी अपराध, उसकी लम्बी चर्चा भी ये तभी करते हैं जब वो हाई प्रोफाइल केस हो। आरुषि हत्याकांड में भी हेमराज का नाम लेने वाला कोई न था।
 
हाँ इस बात से कोई इंकार नहीं कि मीडिया पूरी संवेदनशीलता का परिचय भले ही न दे पाता हो पर हम तक ख़बरें पहुंचाने के लिए धन्यवाद का पात्र तो बनता ही है। स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ कैम्पेन को हम सब तक पहुँचाने में और पर्यावरण को बचाने सम्बन्धी संदेशों के माध्यम से इन्होने देश के विकास में भूमिका तो निभाई है। ख़ुशी की बात है कि कुछ हैं जो सही स्टोरी दिखाते हैं, सच को सामने रखने का हौसला रखते हैं पर दुःख यह है कि ज्यादा सच बोलना अब देशद्रोह में गिना जाने लगा है। 
कहने को तो हम सहिष्णु भारत के सहिष्णु नागरिक हैं लेकिन विडंबना यह है कि जब अपनी पर आती है तो बर्दाश्त नहीं होता। कभी बैन लगा दिया जाता है तो कभी फ़तवे का ख़तरा लहराता है। करोड़ों के इनाम भी घोषित हो जाते हैं। इनके बड़े बोल और उनसे पनपता भय, जनता की चुप्पी के रूप में पसर जाता है। यही मौन इन 'आहत' इंसानों के हौसले बुलंद कर देता है। इन्हें न वर्तमान की चिंता है और न भविष्य की...इनका सारा ध्यान तो हड़प्पा की खुदाई पर ही केंद्रित रहता है। मज़ेदार बात यह है कि इन्हें उसका भी ककहरा नहीं मालूम होता। 
 
दुनिया के सामने हम एक हैं लेकिन चुनाव के समय कोई ठाकुर है, राजपूत है, शिया-सुन्नी है, यादव है, पंडित है, ईसाई है, पारसी है, सिख है, जैन है, पिछड़ा वर्ग है, अल्पसंख्यक है। सबके टैग बाहर निकल आते हैं। सबकी अपनी-अपनी ध्वजा है। 
एडमिशन के समय भी हम यूँ ही अलगअलग धर्मों में बँट जाते हैं।
दंगों में तो अलग-अलग होना नियम ही बन गया है। हम अपने ही देश की जमीं पर खड़े हो, उसी का सत्यानाश मिलजुलकर करते हैं। सुनियोजित तोड़फोड़ करते हैं, आग लगाते हैं। 
हम ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की संकल्पना पर मिल-बाँटकर खाने की बात करते हैं लेकिन एक राज्य जब दूसरे का पानी रोक ले तो हम अपनी-अपनी पाली में जाकर उसका समर्थन करने लगते हैं और एक-दूसरे को ही नोच खाने को तैयार हो जाते हैं। विचारणीय है कि ये किसके कहने पर और क्यों हो रहा है? किसकी स्वार्थसिद्धि में आप एक उपकरण भर हैं?
 
'सर्व धर्म समभाव' हमारा स्वभाव है और हमें सबके गुणों का आंकलन उनके कर्मों के आधार पर करने की सीख दी गई है लेकिन आजकल हम गुजराती, बिहारी, मराठी, पंजाबी, सिख, उत्तर-दक्षिण भारतीय बन एक-दूसरे की भाषा, बोली और त्यौहारों की धज्जियाँ उड़ाने लगे हैं। नार्थ ईस्ट वालों को तो हम भारतीय मानते ही नहीं! कभी मुंबई से फ़रमान जारी होता है कि बिहारी और यू पी वाले चले जाएँ तो दूसरे प्रदेश भी अन्य प्रदेश को कोसने लग जाते हैं। दुःखद है कि इन सबके बीच में 'हमारा भारत' कहीं खो जाता है।
 
आख़िर हम कब अपने-अपने धर्म और पार्टी के खोलों से बाहर आएँगे ? कब हम हर राज्य और उसके निवासी को अपना मानेंगे? कब हम राष्ट्रीय संपत्ति को अपना समझ उसकी रक्षा में सहायक बनेंगे? कब हम अपने देश को स्वार्थ से ऊपर रखकर सोचेंगे? हमारे देश के विकास में सबसे बड़ी अड़चन हम ख़ुद ही हैं और हमें ही सुधरना होगा। नेताओं और दलों के कहने से नहीं, अपने बुद्धिबल का प्रयोग करना होगा। 
कोई कट्टर हिन्दू है तो कोई कट्टर मुसलमान। जो कट्टर भारतीय हैं, वो चेहरे कितने हैं? कहाँ हैं?
साधारण सा प्रश्न है....हम कट्टर भारतीय क्यों नहीं हो सकते? हमारा धर्म भारत क्यों नहीं हो सकता? देश के विकास के लिए सारे दल, सारे मीडिया हाउस एकजुट क्यों नहीं हो सकते? सिर्फ़ किताबी निबंधों में ही नहीं.....हम सच में एक क्यों नहीं हो सकते?
 
वर्ष का अंतिम महीना, मनन का समय होता है। हिसाब लगता है कि हमने इस वर्ष जो चाहा था, क्या उसे प्राप्त कर सके? जनवरी माह में बनी सूची में से कितना कर पाए हैं? हमें यह भी विचार करना होगा कि हमने देश और समाज को क्या दिया? अपने परिवार और मित्रों से कैसा व्यवहार किया? कहीं किसी के दुःख का कारण तो नहीं बने!
विकास से पहले मन की प्रसन्नता आवश्यक है। जब अपने प्रसन्न होंगे, तो साथ चलेंगे और साथ की शक्ति अपार होती है। दुःखी मन के विकसित होने की संभावना सदैव क्षीण ही रहती है।
 
पुरानी गलतियों से सीख लेकर, नकारात्मक ऊर्जा से दूर होकर.......विदा, दिसंबर!
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चलते-चलते: बीते वर्ष को 'हाइकु शताब्दी वर्ष' के रूप में मनाया गया था। उसी से प्रेरित हो, आज 'हाइकु दिवस' पर 'हस्ताक्षर' का दिसंबर अंक प्रकाशित हो रहा है। सभी स्थायी स्तम्भों के साथ-साथ इस बार हमारी टीम के द्वारा हाइकु से सम्बंधित विशेष जानकारियाँ जुटाने का प्रयास किया गया है। आशा है, हमारी इस पहल को भी आपका पूर्ववत स्नेह प्राप्त होगा। आपकी प्रतिक्रियाओं एवं सुझावों का सदैव स्वागत है। 

 


- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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