प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे
इतिहास-लेखन:- अपने होने का सच!!
 
बृत, थलेंन, संरक्षते वित्त आयाति याति च:।
अक्षिणो वित्ततः, क्षीण, ब्रतस्तु हताहत:।।
- महाभारत 
 
अर्थात अपने इतिहास की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए, धन तो आता जाता है, धनहीन होने से कोई नष्ट नहीं होता है किन्तु अपने इतिहास नष्ट होने से विनाश निश्चित है।
इतिहास को लेकर मेरी यह व्यक्तिगत धारणा है कि ‘इतिहास एक ऐसी चीज है जिसे हर व्यक्ति अपनी मर्जी से तोड़ मरोड़कर पेश करता है। इतिहास एवं ऐतिहासिक उपन्यास में एक मूल अंतर यह होता है कि इतिहास घटनाओं को दर्ज करता है, तथ्यों को दर्ज करता है, लेकिन एक खाली जगह छोड़ देता है। वो मनःस्थिति को दर्ज नही करता है। उस युग का इंसान क्या सोच रहा था, उसके ख्यालों की क्या हरकत थी, हालात का उसके खयालात पर क्या असर पड़ा और खयालात का हालात पर क्या असर पड़ा, इस तरफ इतिहासकार ध्यान नही देते। या फिर उनकी मजबूरी है कि जो तथ्यात्मक नही है उस पर ध्यान नही देंगे। लेकिन मेरा मानना है कि तथ्यों के आधार पर भी खयालात तक पहुंचा जा सकता है। हम ऐतिहासिक तथ्यों या घटनाओं से छेड़छाड़ नही कर सकते। हमें उस मर्यादा का पालन करना पड़ेगा।
 
इतिहास अपने अतीत के यथार्थ को जानने का एक मात्र वस्तुनिष्ठ माध्यम है। ऐसे में इतिहास सही हो यह आवश्यक होता है। क्योंकि वह हमारे भविष्य की निर्मिति में भी एक बड़ी भूमिका निभाता है। इस क्रम में इतिहासकार को निर्मम होना पड़ता है। इतिहास, अपनी मान्य रूढ़ियों की सीमा के चलते निर्मम होता है। घटनाएं, उनका प्रलेखन, उनकी खोज, शोध और व्याख्‍या के पश्चात्‌ खंडन-मंडन का अनवरत सिलसिला। इस कसौटी पर जो खरा उतरता है, वही इतिहास-स्वीकृत होता है, वरना खारिज।
 
इतिहास घटित होता है, निर्देशित नहीं। विडम्बना यह है कि भारत का वर्तमान उपलब्ध इतिहास भारत की पराधीनता के काल में अंग्रेजों के निर्देशों के आधार पर लिखा गया था।
इतिहास अतीत का अध्ययन है। परन्तु अतीत का अध्ययन हो कैसे? क्योंकि अतीत तो व्यतीत हो चुका है। गौर करें तो अतीत व्यतीत होता ही नहीं, क्योंकि उसकी स्मृतियां और अवशेष तो बचे ही रह जाते हैं और काल (Time) तो अविभाज्य हैं। इसलिए अतीत, वर्तमान और भविष्य अविभाज्य रूप से एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। हर पल भविष्य वर्तमान और वर्तमान अतीत में रूपांतरित होता रहता है। इसलिए वर्तमान को समझने के लिए हमें अतीत में जाना पड़ता है और वर्तमान को समझ कर ही भविष्य को संवारा जा सकता है।
 
इसलिए प्राचीन काल में ही दुनिया में हिस्तोरिका (Historica) या ‘इतिहास’ जैसे शब्दों की रचना की गई थी। इतिहास की अवधारणा में ही शामिल था कि अतीत को वैसा ही देखा जाए जैसा वह था ताकि उससे सबक लिया जा सके। इसीलिए प्राचीन काल में ही भारत के शासक के शिक्षण-प्रशिक्षण का इतिहास को अंग बनाया गया था। आधुनिक काल में, विशेष कर 19वीं शताब्दी से इतिहास के मूलभूत प्रश्नों-‘क्या, क्यों, कैसे’ पर बहुविद्या विचार किया जाता रहा है और तरह-तरह के विचारों और विचारकों का प्रादुर्भाव होता रहा है।
 
कोई भी विषय क्यों अस्तित्व में आया यह जानना जरूरी होता है। तभी उस विषय की प्रकृति समझ में आती है। इतिहास का सबसे बड़ा उद्देश्य यही है कि हम अतीत से वर्तमान के लिए सबक लें। इतिहास के आइने में ही हमारी पहचान दिखती है। मनुष्य अपनी अस्मिता को ऐतिहासिक परिप्रक्ष्य में ही देख-समझ पाता है। मानव स्वभाव है कि वह किसी चीज को किसी परिप्रेक्ष्य में रख कर ही पहचान सकता है, उसे पूरी तरह समझ सकता है। इतिहास संकीर्णता का शत्रु है। इतिहास का ‘सही’ (वैज्ञानिक) अध्ययन करते ही देश-काल की विशिष्टता तो रेखांकित होती है पर मानव-समाज की एकता उससे भी अधिक उजागर होती है।
 
प्राचीन काल में जब इतिहास-लेखन शुरू भी नहीं हुआ था, मनुष्य मिथक और गाथाओं के माध्यम से अपने अतीत की कथा-स्मृति को यथासंभव सुरक्षित रखता था। लेकिन उस समय यथार्थ और कल्पना इस तरह घुलमिल जाते थे कि एक-दूसरे को अलग कर पाना संभव नहीं था।
चौदहवीं शताब्दी में, अफ्रीका में, एक विलक्षण इतिहासकार पैदा हुए - इब्न खल्दून (1332-1406)। उन्होंने केवल इतिहास नहीं, इतिहास-लेखन की विधि और सामाजिक संस्थाओं का महत्व समझा। अपनी विख्यात ‘मुकद्दिमा’ की प्रस्तावना में वे लिखते हैं कि वह इतिहास इसलिए लिख रेह हैं, ताकि शासक जान सकें कि पहले क्या हुआ और बाद में क्या होगा। यह इतिहास को काल प्रवाह और विकास की दिशा के संदर्भ में समझने का प्रयास था और आज भी प्रासंगिक हैं।
 
इतिहास नियतिवाद पर भयानक प्रहार करता है। इतिहास में ही हमें पता लगता है कि इंसान की जीत हाथ पर हाथ धरने से नहीं, महापुरुषों के इंतजार से नहीं, स्वयं समवेत रूप में महाबली बनने से संभव हुई है। इतिहास व्यक्तियों के प्रयासों और उपलब्धियों को बताता ही है, इतिहास मनुष्य के भविष्य में ही नहीं उसकी शक्ति में भी विश्वास पैदा करता है।
इसी अर्थ में इतिहास प्रेरणास्रोत बनता है -अतीत नायकों के चरित्र और उपलब्धियों के माध्यम से आज को प्रेरणा देता है। यहाँ भी खतरा यही होता है कि अगर इतिहास की पुरावृत्ति वाली बात दिमाग में रही तो एक देश-काल में सफल नीति या व्यक्ति को अनुकरणीय मान लिया जा सकता है, जो घातक होगा।
 
इतिहास के माध्यम से किसी गरिमामय घटना, किसी महान व्यक्ति या किसी गौरवशाली काल को जीवन्त किया जाता है ताकि वर्तमान पीढ़ी को प्रेरणा मिल सके। वर्तमान के लिए अतीत से कोई सीख मिले, इसलिए भी इतिहास लिखा जाता है। इतिहास इसलिए भी लिखा जाता है कि मानव सभ्यता की विकास प्रक्रिया के पद्धति का पता चल जाय ताकि ऐसे समीकरण बन सकें जिनके माध्यम से मानव के इतिहास को उसकी नियति से जोड़ा जा सके, कुछ नियम, कानून बनाए जा सकें। 
‘समस्त इतिहास समकालीन होता है’ (क्रोचे), जिसने इतिहास लेखन को गहराई से प्रभावित किया है। इतिहास लेखन की यह एक विकट समस्या है कि समकालीन इतिहास, घटना के प्रभाव के प्रति तटस्थ नहीं हो पाता। हर पाठक इतिहास के अध्ययन में अपने मस्तिष्क का उपयोग करता है। वह स्वयं अपने और अपनी पीढ़ी के दृष्टिकोण से इतिहास को देखता है। इस तरह जाहिर है कि कोई काल या व्यक्ति किसी विशेष ऐतिहासिक घटना में वह देख लेता है जो दूसरा नहीं देख सकता। इस आत्मनिष्ठता को अगर नकारा जाए तो यह ईमानदार बात नहीं होगी। इसका मतलब तो यह होगा कि वस्तुनिष्ठता का दावा करने वाला अपना दृष्टिकोण तो बनाए रखना चाहता है पर दूसरों को अपना दृष्टिकोण त्याग देने के लिए कहता है। असलियत यह है कि ऐसा प्रयास सफल भी नहीं हो सकता। अगर सफल हो जाए तब तो इतिहास का अंत ही हो जाएगा।
 
निष्कर्ष यह कि हमारे व्यक्तित्व के ढांचे में, चेतना के स्तर पर समष्टि सूत्रों से हम सृष्टि में प्रकृति के सहोदर हैं, अतीत ही हमारा अग्रज है, वह ही हमें वर्तमान को जोड़ने का माध्यम हो सकता हैं, सूत्र बन सकता है। आज हम जहां हैं, वहां होने की तार्किकता, अपने अतीत से संबंध तलाश कर, उसमें छूटे स्थानों को पूरी आस्था सहित लोक और जन से पूरित कर, यानि चेतना के स्तर पर अपने इतिहास से अपने वर्तमान का सातत्य पाकर हम वास्तविक अर्थों में मनुज कहलाने के अधिकारी हो सकते हैं। यह विश्लेषण आश्रित शब्दगम्य इतिहास मात्र से संभव नहीं, इसके लिए वस्तुगम्य इतिहास की व्याख्‍या और बोधगम्य इतिहास सम्पदा को साहित्य का सम्मान देते हुए, तैयार किया गया इतिहास ही सार्थक होगा।

- नीरज कृष्ण