प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

अपनों को अपना बोला करते हो
अच्छे हो जो ऐसा सोचा करते हो

रोज़ मुखौटे बदला करती है दुनिया
तुम ही बस इक चेहरा रक्खा करते हो

सच कहना और सुनना फ़र्ज़ तुम्हारा है
अच्छे हो इंसान जो ऐसा  करते हो

कमवज़नी बातें करते हैं बड़बोले
भारी हो तुम लब कम खोला करते हो

तुमको अपनी कीमत का एहसास नहीं
ख़ुद को हरदम कमतर आँका करते हो


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ग़ज़ल-

कुछ अलग कहने की चाहत में ये क्या करते हैं वो
तेज़ आँधी को हवा अक्सर कहा करते हैं वो

दर्द सहने में तो उनका कोई भी सानी नहीं
देखने में हाँ, मगर नाज़ुक लगा करते हैं वो

मेरी जानिब जब भी उठती है कभी उनकी नज़र
ऐसा लगता है कोई जादू किया करते हैं वो

मुफ़लिसों के फ़न की कोई क़द्र करता ही नहीं
हाथ में लेकर हुनर क्या-क्या फिरा करते हैं वो

अपने एहसासात बे-आवाज़ रखने के लिए
डायरी चुपचाप रातों को लिखा करते हैं वो


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ग़ज़ल-

एक इक क़तरा जोड़ कर रक्खा
खून सारा निचोड़ कर रक्खा

रंग तो और भी थे जीवन में
क्यों उदासी को ओढ़ कर रक्खा

क्योंकि आईना सच बता देगा
इसलिए उसको तोड़ कर रक्खा

जो भी लम्हे तुम्हारे साथ कटे
मैंने उन सबको जोड़ कर रक्खा

वो वरक जिसमें तेरा नाम आया
मैंने उन सब को मोड़ कर रक्खा

ख़ुद पे जब भी किया यकीं मैंने
रुख़ हवाओं का मोड़ कर रक्खा


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ग़ज़ल-

उसको मेरा मलाल है अब भी
चलिए कुछ तो ख़याल है अब भी

रोज़ यादों की तह बनाता है
उसका जीना मुहाल है अब भी

तुमने उत्तर बदल दिए हर बार
मेरा वो ही सवाल है अब भी

जिसने दुश्मन समझ लिया है हमें
उससे मिलना विसाल है अब भी

दफ़न होकर भी साँस बाकी है
कोई रिश्ता बहाल है अब भी


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ग़ज़ल-

उनके वादे उनको याद कराये जायें
उनके ख़त अब उनसे ही पढ़वाये जायें

वक़्त की आँधी चाहे कितनी तेज़ चले
ज़िद है अपनी उसका साथ निभाये जायें

जिन हाथों में खुदगर्ज़ी की चाबी है
उन हाथों से ताले क्यों खुलवाये जायें

जिसमें एहसासात की गहरी रंगत हो
उन रंगों से घर-आँगन रंगवाये जायें

कालीनों पे चलने के आदी हैं जो
वो भी इक दिन काँटो पर चलवाये जायें


- सोनरूपा विशाल
 
रचनाकार परिचय
सोनरूपा विशाल

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ग़ज़ल-गाँव (1)