प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़ास-मुलाक़ात

इक्कीसवीं सदी की कविता है हाइकु- कमलेश भट्ट कमल


आदरणीय कमलेश भट्ट कमल जी से मेरी पहचान हाइकु के प्रति मेरी जिज्ञासा के कारण हुई। दो बार भेंट होने से मेरे कई सवाल हल हुए। वाणिज्य-कर कार्यालय (वाराणसी) में ज़ोनल एडीश्नल कमिश्नर पद के कारण व्यस्तम जीवनचर्या संग साहित्य सृजन के ज़रिए बेहद प्रभावित करता व्यक्तित्व है कमलेश भट्ट कमल जी का। अन्य जिज्ञासुओं के सन्तुष्टि के लिए उनसे हुई बात-चीत को यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ।
- विभा रानी श्रीवास्तव

 




विभा रानी श्रीवास्तव- जिज्ञासा हो आयी कि पहले आपका पारिवारिक माहौल जाना जाए। आप पर कैसे और किसका प्रभाव सबसे ज़्यादा है?
कमलेश भट्ट कमल- मैं ठेठ गाँव में पैदा हुआ और इन्टर की पढ़ाई तक वहीं पला-बढ़ा। ग्रामीण जीवन के तमाम अभाव, मुश्किलें, चिन्ताएँ और चुनौतियाँ मेरे भी हिस्से में आईं। पिताजी की छोटी-सी नौकरी और कुछेक बीघे की छोटी-सी काश्त में 18 लोगों का पेट पालना बहुत मुश्किल था। इनसे संघर्ष करते हुए माँ ने भी हर संभव सुख-सुविधा का ध्यान रखा, लेकिन इस सबसे धैर्यपूर्वक संघर्ष करने और आगे बढ़ते रहने की ताकत भी मिली।
नौकरी मिलने के ठीक एक माह पूर्व कुसुम का पत्नी के रूप में प्रवेश जीवन की सबसे अमूल्य घटना थी। धीरे-धीरे वे माँ, बाप, भाई, बहन की भी भूमिका निभाने लगीं। आज मैं जो भी जैसा भी हूँ, उसमें उनका बहुत अहम योगदान है। मेरे साहित्यकार को आगे बढ़ाने और सतत लिखते रहने की उनकी चिन्ताओं ने इस ओर से मुझे बेपरवाह नहीं होने दिया। परिवार की पिछली ज्ञात पीढ़ियों में साहित्य से जुड़ने वाला मैं पहला व्यक्ति ही नहीं, परिवार से पहला पोस्ट ग्रेजुएट होने और पहला राजपत्रित अधिकारी होने का गौरव भी मुझे ही मिला।


विभा रानी श्रीवास्तव- आपके आरंभिक साहित्यिक जीवन के बारे में हम जानना चाहेंगे। शुरुआत वहीं से करने का सादर अनुरोध है।
कमलेश भट्ट कमल- 1975 से 1979 के दौरान लखनऊ विश्व विद्यालय में पढ़ाई के दौरान साहित्य से जुड़ाव के बाद गीतों और कहानियों से लेखन की शुरुआत हुई। तब अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, श्रीलाल शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, ठाकुर प्रसाद सिंह , शिवमंगल सिंह सुमन, कैफ़ी आज़मी, शिवानी को देखा-सुना। कहानीकारों में प्रेमचन्द को ख़ूब पढ़ा। शुरुआती कहानियां 'स्वतन्त्र भारत' अख़बार में छपीं। कविताएँ लघु-पत्रिकाओं में छपती रहीं। बाद के वर्षों में साहित्य को समझने की प्रक्रिया में तमाम साहित्यकारों से साक्षात्कार लेने का सिलसिला शुरू हुआ। फ़िराक गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा और उपेन्द्रनाथ अश्क के साक्षात्कार लिए। वर्ष 1985 में हाइकु के बहाने प्रो.सत्यभूषण वर्मा से जुड़ना क्या हुआ, साहित्य की दिशा ही बदल गयी। आगे चलकर ग़ज़लों के बारे में थोड़ी समझ आई तो ग़ज़लें लिखने लगा। बीच-बीच में कहानियाँ, समीक्षा, लेख तथा बाल साहित्य भी लिखता रहा।
01 अप्रैल को जो लोगों को मूर्ख बनाने का दिन माना जाता है, वर्ष 1980 में मैंने पहली सरकारी नौकरी ज्वाइन कर ली थी। लेकिन लेखन भी जारी रहा। थोड़ा-थोड़ा लिखते-लिखते भी अब तक 17 किताबें प्रकाशित हो गई हैं।


विभा रानी श्रीवास्तव- वर्तमान सन्दर्भों में हाइकु कविता को किस प्रकार परिभाषित करना उचित होगा?
कमलेश भट्ट कमल- विभा जी, हाइकु कविता तो वही है 5-7-5 के वर्णक्रम वाली 17-अक्षरीय विधा। लेकिन जैसे-जैसे आदमी की व्यस्तता बढ़ती जा रही है, हाइकु कविता की प्रासंगिकता भी बढ़ती जा रही है। क्योंकि बहुत सीमित समय में साहित्य-रस का भरपूर आनंद देने में सक्षम है यह विधा। हाँ, हाइकु जिस शब्द-साधना की अपेक्षा करता है, यदि उसके बिना ही सृजन का प्रयास होगा तो हाइकु के नाम पर खुरदुरी और अनगढ़ रचनाएँ ही सामने आ पाएँगी।
विधा कोई भी हो, उसमें रचनाकार का समय तो बोलना ही चाहिए। बोलना ही नहीं चाहिए, उस समय के साथ संघर्ष कर रहे मनुष्य की आवाज़ भी बनना चाहिए साहित्य को और उसके साथ खड़ा भी होना चाहिए।


विभा रानी श्रीवास्तव- कथ्य की दृष्टि से मूल जापानी हाइकु और हिन्दी हाइकु में क्या अन्तर है?
कमलेश भट्ट कमल- देखिए हमने जापान से हाइकु का केवल शिल्प भर लिया है। मतलब यह कि भारतीय भाषाओं के हाइकु का कथ्य वही है, जो उन भाषाओं की अन्य कविताओं का है। बेशक जापानी हाइकुओं में ऋतुबोधक शब्दों की एक सीमा तक अनिवार्यता भी रही है और ऐसे हाइकु प्रकृति को केन्द्र में रखकर रचे जाते रहे हैं। वहाँ हास्य-व्यंग्य, अलंकारों, दर्शन आदि का प्रतिषेध-सा रहा है, लेकिन हिन्दी हाइकु ने ये सभी बन्धन तोड़ दिए हैं।
वहाँ प्रकृति भी है तो मनुष्य भी है। अलंकार भी है तो गीतात्मकता भी है। जीवन के खुरदुरे यथार्थ हैं तो आध्यात्मिक चेतना और दर्शन भी है। जापानी में हास्य-व्यंग्य और हल्की-फुल्की अभिव्यक्तियों के सेनर्यू नामक विधा है, लेकिन अपने यहाँ यह भेद भी नहीं है।


विभा रानी श्रीवास्तव- वर्तमान में हाइकु लिखने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है, किंतु गुणवत्ता में भी कमी आई है। इस बारे में आपकी क्या राय है?
कमलेश भट्ट कमल- यह बात हमेशा नई विधाओं के सन्दर्भ में  सही होती है, क्योंकि विधा के नएपन के आकर्षण में तमाम लोग खिंचे चले आते हैं और जब ऐसी विधा विदेशी हो तो आकर्षण थोड़ा और बढ़ ही जाता है। लेकिन इस भीड़ में साधक रचनाकार तो थोड़े ही रहते हैं बाकी तो इतिहास का हिस्सा बनने की आपा-धापी में व्यस्त रहते हैं।
बाशो ने ऐसे ही थोड़े कह दिया था कि जिसने तीन से पाँच हाइकु लिख लिए वह हाइकु कवि है और जिसने पाँच से दस हाइकु लिख लिए वह महान कवि है। संख्या की दृष्टि से अधिक हाइकु लिख लेने का तनिक भी महत्व तब तक नहीं हैं, जब तक कि उनमें एक पूर्ण और महत्वपूर्ण कविता का समावेश न हो। हाइकु इतने संक्षिप्त कलेवर की विधा है कि यदि उसकी तीन पंक्तियों से कोई बड़ा भाव या अर्थ अभिव्यंजित नहीं होगा तो वह व्यर्थ चला जाएगा। जो लोग ज़्यादा लिख लेने की जल्दबाजी और आपाधापी में हैं, वे कभी एक समर्थ हाइकुकार बन भी पाएँगे- इसमें हमेशा सन्देह बना ही रहेगा।


विभा रानी श्रीवास्तव- हिन्दी हाइकु और अन्य छन्दों के मेल से किये गये तमाम प्रयोग हाइकु के प्रसार में महत्वपूर्ण सिद्ध हुए हैं, इन्हें किस प्रकार से प्रोत्साहित किया जा सकता है?
कमलेश भट्ट कमल- हिन्दी छन्दों के मेल से यदि आपका आशय हाइकु मुक्तक, हाइकु गीत आदि से है तो मैं इसे उचित नहीं मानता। वस्तुतः हाइकु छन्द नहीं है कि उसका किसी अन्य छन्द के साथ फ़्यूजन कर दिया जाय। हाइकु अपने आप में एक पूर्ण कविता है। इसका सौन्दर्य 17 अक्षरों के कलेवर में ही सिमटकर उभरता है। इससे बाहर जाते ही यह सौन्दर्य क्षत-विक्षत होने लगता है। लेकिन हाँ, यदि वृहद छन्द परम्परा के बाद भी छन्द रूप में हाइकु को कोई स्वीकृति मिल रही है तो इससे भी 'हाइकु' नामक संज्ञा का प्रचार-प्रसार तो होगा ही, जिसका कुछ न कुछ लाभ हाइकु विधा को भी होगा।

विभा रानी श्रीवास्तव- सामाजिक और मानवीय परिप्रेक्ष्य में हाइकु कविता की उपादेयता कितनी है?
कमलेश भट्ट कमल- विभा जी, मैंने पहले ही निवेदन कर दिया है कि हाइकु एक कविता है- पूर्ण कविता। जो सामाजिक और मानवीय उपयोगिता अन्य कविताओं की है, वह हाइकु की भी है। इससे भी इतर इस कविता का एक सामाजिक आयाम यह है कि अन्य विधाओं की तुलना में यह विधा प्रकृति के कहीं अधिक निकट है। आज मनुष्य जिस तरह प्रकृति के साथ तनाव और टकराव तथा अन्ततः बिखराव की मुद्रा में है, उसमें हाइकु लोगों को प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनने की प्रेरणा देता है। हाइकु से जोड़कर तमाम लोगों को कवि बना डालने के जितने अवसर हाइकु विधा दे सकती है, वह अन्य विधाओं में दुर्लभ है। जिस समाज में जितने ज्यादा कवि होंगे, वह उतना ही मानवीय भी होगा।

विभा रानी श्रीवास्तव- हिंदी हाइकु की अवधारणा और शिल्प संबंधी मान्यताओं के संदर्भ में समीक्षकों और विद्वानों की अलग-अलग राय है, इसे कैसे एकमत किया जा सकता है?
कमलेश भट्ट कमल- हाइकु के शिल्प और उसकी अवधारणा के सम्बन्ध में तमाम भ्रांतियों का निवारण प्रो. सत्यभूषण वर्मा पहले ही कर चुके हैं। 5-7-5 के वर्णक्रम में 17 अक्षरों का शिल्प पूरी तरह स्थापित हो चुका है। यदि कोई इसमें नई परिकल्पना लेकर आगे आता है तो मैं इसे उसका अज्ञान ही कह सकता हूँ। हाइकु की अवधारणा के विषय में मैं ऊपर बात स्पष्ट कर चुका हूँ। हाइकु के इस कलेवर, जो इसका अनिवार्य अनुशासन भी है, उसके अन्दर रहते हुए कोई जितने भी प्रयोग कर सकता है, करे। इस कलेवर में समाहित कविता जितनी बड़ी और प्रभावपूर्ण तथा अर्थवान होती जाएगी, हाइकु उतना ही बड़ा होता जाएगा। जब लोग स्वयं ही हाइकु का इतिहास पुरुष कहलाए जाने के लिए बेताब हों तो वे एकमत क्यों होना चाहेंगे?

विभा रानी श्रीवास्तव- आप हिंदी हाइकु का भविष्य किस प्रकार से देखते हैं?
कमलेश भट्ट कमल- विभा जी, हाइकु कविता का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। लेकिन इसमें आप जैसे समर्पित रचनाकारों की कमी है, जो लोगों को न केवल सोशल मीडिया पर, बल्कि भौतिक रूप से संगठित और सक्रिय बना सकें। मैंने पहले कहा है कि आज की भागमभाग भरी ज़िन्दगी जीने वाले मनुष्य को साहित्य से जोड़ने और उसका आस्वाद देने वाली हाइकु जैसी कोई और विधा नहीं है। मैंने इसीलिए हाइकु को 21वीं सदी की कविता के रूप में भी रेखांकित किया है।
पत्र-पत्रिकाओं में अभी हाइकु को वैसा स्थान नहीं मिल पा रहा है, जैसा मिलना चाहिए। आलोचना के स्तर पर भी काम होना है। वर्ष 2017 भारत में हाइकु की प्रथम चर्चा का शताब्दी वर्ष है, लेकिन कदाचित हम लोग इस अवसर का लाभ लेने से चूक गए। हमारी कोशिश है कि हाइकु की सघन चर्चा को हम इस उपलक्ष्य में अगले वर्ष भी जारी रख पाएँ। ज़्यादातर लोग विधा के बजाय स्वयं को स्थापित करने की ही धुन में लगे हैं। यह एक अलग तरह की स्वार्थपरता है। जब तक विधा की पहचान और व्यापकता नहीं मज़बूत होगी, निजी रचनात्मकता हाशिए पर ही बनी रहेगी। वाराणसी में पिछले चार दिनों में ही मैंने दो महत्वपूर्ण मंचों से हाइकु की चर्चा की है- 16 नवंबर को आकाशवाणी वाराणसी में और 19 नवंबर को कोई 77 वर्ष पुरानी संस्था 'साहित्यिक संघ' के वार्षिकोत्सव में.जहाँ-जहाँ भी मुझे अवसर मिलता है, मैं हाइकु के एजेंडे को सामने रखने में ज़रा भी संकोच नहीं करता हूँ।


विभा रानी श्रीवास्तव- इस विधा में नये लिखने वालों को मुख्य रूप से किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
कमलेश भट्ट कमल- नये लिखने वालों को विधा के शिल्प को समझते हुए धैर्यपूर्वक हाइकु लेखन में स्वयं को प्रवृत्त करना चाहिए। संख्या की दृष्टि से तमाम अधकचरे हाइकु लिख डालने की हड़बड़ी से बचना चाहिए। दो-चार अच्छे हाइकु भी किसी को पहचान दिलाने में सक्षम हो सकते हैं। 17-अक्षरों का ढांचा अगर महत्त्वपूर्ण कविता नहीं बन पाया तो उसका लिखा जाना या न लिखा जाना दोनों बराबर है।
प्रो.सत्यभूषण वर्मा का यह कथन याद रखे जाने योग्य है कि हाइकु शब्दों की साधना है। जो यह साधना नहीं करेगा, वह एक सफल हाइकुकार भी नहीं बन पाएगा।


विभा रानी श्रीवास्तव- कमलेश जी, आपका बहुत बहुत धन्यवाद एक सार्थक चर्चा के लिए। 'हस्ताक्षर' परिवार आपके प्रति आभारी है।
कमलेश भट्ट कमल- धन्यवाद आपका भी विभा जी।


- कमलेश भट्ट कमल
 
रचनाकार परिचय
कमलेश भट्ट कमल

पत्रिका में आपका योगदान . . .
ख़ास-मुलाक़ात (1)