प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जयतु संस्कृतम्
गीतम्
 
कथन्नु विस्मराम्यहं तदीयरागयाचनम्
 
मयि प्रिये! तवाधिकार एव वर्त्तते भृशं,
उदीर्य सर्वमीप्सितं त्वया तदा प्रसाधितम्। 
सखेSधुनाSत्र धिक्करोषि नोचितं त्वया कृतं,
स्मरामि चेत्तयभोदितं प्रकम्पते हृदन्तरम्।।1
 
वियोगभीतया चिराय वाष्पसिक्तनेत्रया, 
सखे! निपत्य मे गले मदेकसक्तयाSनया।
प्रयाहि नैव मामुपेक्ष्य मामुपेहि सादरं, 
स्मरामि चेन्निवेदितं प्रकम्पतेSत्र मानसम्।।2
 
मनोज्ञबाहुदण्डयोर्निधाय मां  निजां प्रियां, 
परिष्वजस्व वक्षसा करोमि नैव लज्जताम्।
न दुर्लभीकुरुष्व मेSनुरागसदृशं धनं, 
त्वया विना निराश्रया क्व यामि किं कारोम्यहम्?।।3
 
कारोम्यशेषजीवनं त्वया सहैव यापनं, 
जिजीविषा न वर्त्तते त्वया विनाSत्र साम्प्रतम्।
समाजतो बिभेमि नैव मे भजस्व यौवनं,
उदीरितं तया तदा स्मराम्यहञ्च साम्प्रतम्।।4
 
सखे! सुखीकुरुष्व मां प्रपूर्य मे मनोरथं, 
न्वखंडितं भजस्व मेSर्पितं नवीनयौवनम्। 
तदुक्तिरद्य कर्णयोर्विभाति गुंजतीव माम्, 
कथन्नु विस्मराम्यहं तदीयरागयाचनम्।।5

- युवराज भट्टराई
 
रचनाकार परिचय
युवराज भट्टराई

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जयतु संस्कृतम् (1)