प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लेख

हाइकु: संक्षिप्त संस्मरणों व स्वानुभूतिक वातायनों से
- जितेन्द्र उपाध्याय



हाइकु क्या है और इसका इतिहास भूगोल क्या है? यह अनेकानेक विद्वानों द्वारा सर्वविदित किया जा चुका है , उस विस्तार में नही जाकर इस पर लिखा जाना जरुरी प्रतीत होता है कि " कैसे लिखा जाए कि लिखा हुआ हाइकु हो जाये " ! विधा वही उत्तम होती है जिसका कोई अकादमिक या साहित्यिक मूल्य होता है और जो परम्परा से चली आ रही है , इस दृष्टिकोण से विचार करें तो आज विश्वविद्यालयों में हाइकु विधा पर शोधकार्य तक हो रहा है ! वर्तमान में हाइकु काव्य की वैश्विक विधा बन चुका है ! किन्तु अवधेय तथ्य यह है कि विभिन्न भाषाओं का व्याकरण-अर्थान्वयन का तरीका किंचित भिन्न होता है , अतएव एक भाषा में हाइकु के लिए जो तरीका अपनाया गया है उसे दूसरी भाषा में शायद उतनी सहजता से नही अपनाया जा सके , लेकिन 5-7-5 का नियम सभी भाषाओं के हाइकु के लिए अपरिहार्य है , ध्यान यह देना है कि 5-7-5 अपनी भाषा मे किस रीति से अधिक उपयुक्त है "यथा"- 12+5 या 5+12 की अंग्रेजी भाषा में प्रयुक्त होने वाली रीति हिंदी हाइकु में अधिक नही सुहाती है , हिन्दी हाइकु के वर्ण्य-विषयों को देखते हुए हिंदी भाषा के हाइकु में 5-7-5 अक्षरों की परस्पर पूर्णतया स्वतन्त्र पँक्तियाँ ही सर्वथा उपयुक्त है !

हाइकु ने मात्सुओ बाँशो (1644) के हाथों संवरकर सत्रहवीं शताब्दी के फलक पर शाही परवाज भरते हुए तत्कालीन साहित्यकारों को खूब आकर्षित किया , और हाइकु को भारत लाने का श्रेय कविवर रवींद्रनाथ टैगोर को जाता है , उनकी लायी हुई यह विधा भारत में अपने सौ वर्ष पूर्ण कर चुकी है , जिसके उपलक्ष्य में भारत के हिन्दी हाइकुकारों को एकजुट करते हुऐ उनका साझा संकलन प्रकाशित करने का प्रयास आदरणीया विभा श्रीवास्तव जी के अथक प्रयासों से " शत हाइकुकार " के रुप मे सफल सिद्ध हुआ !

किन्तु मैं हाइकु को जापान से आयातित नही बल्कि विशुद्ध भारतीय विधा की घर वापसी मानता हूँ कि यह विधा भी बौद्ध पंथ के साथ जापान पहुँची और गुरुदेव टैगोर के द्बारा घर वापस लायी गयी ! मेरी इस मान्यता को आधार बनाकर आदरणीया विभा श्रीवास्तव जी ने बहुत परिश्रम और खोजबीन करके शत हाइकुकर प्रकाशित करने से पूर्व ही कई प्रमाण जुटाये और जिनका जिक्र भी उन्होनें उक्त प्रकाशन के प्रारंभिक पृष्ठों पर किया है , मुझे भी वैदिक छन्दो में कई प्रमाण मिलें कि वस्तुतः यह हाइकु की घरवापसी ही है !


प्रारम्भ में हाइकु दार्शनिक गूढ़ता व प्रकृति के उपादानों तक ही सीमित रहें , किन्तु धीरे-धीरे इसमे वह सब कुछ आ रहा है जो कि लिखा या कहा जा सकता है , और उचित भी यही है ! कहा तो यहाँ तक भी जाता है कि हीरोशिमा-नागासाकी की आणविक त्रासदी के बाद त्रासदी से प्रभावित जापानी स्त्रियों ने अपनी विवशताओं के चलते पेट-पालने निमित्त पुरुषों को रिझाने के लिए काव्य का सहारा लिया और उसकी विधा के रुप मे हाइकु का चयन किया " यथा "- मुगलकालीन मुजरा जैसे ! अब हाइकुओं में सामान्य जीवन व देश-काल-निरन्तर बदलते समाज की झलकियाँ भी तेजी से आ रही है "यथा"- एक आम भारतीय स्त्री के सम्पूर्ण जीवन-कथावृत्त को दर्शाता निम्नलिखित हाइकु -;

तिनके चुन
नीड़ नेह का बुन
चिड़ियाँ फुर्र !


अथवा भयावह सामाजिक समस्या को इंगित करता निम्नलिखित हाइकु :-

रोयें है भेज
संस्कारों की विदाई
दैत्य दहेज !


यद्यपि हाइकु परिवार में इसके कई अन्य बन्धु-सखा "यथा"- चौका, सेदोका ,तांका आदि आदि है , किन्तु हाइकु सर्वोत्तम है ,जो सम्मान व लोकप्रियता हाइकु को प्राप्त हुई ,उसने हाइकु को केंद्र में लाकर सबको हाशिये पर कर दिया !!

"विराटतम की सूक्ष्म या सूक्ष्मतम की विराट अभिव्यक्ति", चाहे जो कह लें , दोनों ही दृष्टियों पर हाइकु विधा सटीक बैठती है! किसी प्रतीति की विशिष्ट अनुभूति का उसके विषय की सम्पूर्ण समग्रता में संदेशपरक सामान्यीकरण होना ही हाइकु है , इसे संक्षेप में इस प्रकार कहूँगा कि " सत्रह अक्षर है-और पूरी सृष्टि है ", अर्थात " न्यूनतम का अधिकतम सदुपयोग ", इसको उदाहरण के जरिये ऐसे समझा जा सकता है कि - मानो कोई माइक्रोचिप या सिमकार्ड है जिसकी भण्डारण क्षमता आपके अपने बोध व संज्ञान पर निर्भर है , या कोई छोटा सा जादुई लिफाफा -जिसकी क्षमता तो अकूत है किंतु आप उसमे कितनी सामग्री भर सकते है ? किलो भर या कुंटल भर , यह पूर्णतया आप पर ही निर्भर है अर्थात लिफाफें में तो सम्पूर्ण ब्रह्मांड समा सकता है ,किन्तु लिफाफा भरने के लिए आपके पास कितना माल है !

यदि आपने भी अपनी अभिव्यक्तियों के लिये हाइकु विधा का चयन किया है तो सर्वप्रथम मेरी बधाई स्वीकार करें , तदैव यह ध्यान रखें कि हाइकु सपाट वर्णन-मात्र दृश्य चित्रण-सामान्य प्रतिज्ञप्ति-प्रवचन नही होता है , विषय अवश्य ही बाह्य घटनाओं-वातावरण से प्रतिक्रिया-प्रत्यक्षीकरण द्वारा निर्मित होता है किंतु आंतरिक बोध क्षमता आपकी अपनी है-प्रतीतियां आपकी अपनी है , साथ ही छन्द के आधारभूत नियमों का भी ध्यान रखना चाहिये क्योंकि आखिर हाइकु भी अन्ततोगत्वा एक प्रकार का छन्द ही है ,प्रवाह की तारतम्यता हेतु तुक अनिवार्य नही किन्तु यदि सहजता से आ जाये तो उत्तम बात ! कई भाषाओं की खिचड़ी मत पकायें, यथासम्भव एक ही भाषा के शब्दों से हाइकु पूर्ण करें , अनावश्यक संयोजको-प्रश्नवाची शब्दों और शब्द के दोहराव से बचें ! उपलब्ध फलक पर फिजूल की अतिरिक्त सामग्री परोसकर स्थान बर्बाद कर सम्भावनाओं को बांझ होने से बचाये "यथा" - 'फूल की खुश्बू ' कहने के लिए केवल 'फूल ' कह देना पर्याप्त है , किन्तु बात यहीं समाप्त नही होती क्योंकि यदि कुछ विशेष दिखाना है तो उसे फूल में जोड़ना पड़ेगा "जैसे -गन्धहीन फूल " ! अंतत: यह कि प्रकृति के लिए नकारात्मक प्रवृत्तियों का उपयोग कदापि न करें ,, 5-7-5 में परस्पर पूर्णतया स्वत्रन्त्र पँक्तियाँ ही सबसे उत्तम् तरीका हिंदी हाइकु के लिए अर्थात पहलीं पंक्ति पांच अक्षर -दूसरी पंक्ति सात अक्षर-तीसरी पंक्ति पुनः पांच अक्षर , हो गया आपका हाइकु तो शुरु हो जाइये झटपट , अर्रे एक ही पंक्ति को तोड़कर तीन तो बनाइये नही ! और हाँ , प्रचलित शब्दों को ही उपयोग में लायेअधिकांशतया जब तक कि विशिष्ट शब्द की विशेष जरूरत न हो-किन्तु इसका यह मतलब कि नही कि आप चालू भाषा मे चालू हो जायें ,गोया आप छन्द लिख रहें-न कि मोहल्लें की हाल-रिपोर्टिंग कर रहें ,, रुकिए -रुकिए , पहले फिरंगन चाची वाले तरीके को अलविदा तो बोल दीजिये ,,,,,


देव या हाथी
टटोलें सुंन्ड पुच्छ
हाइकु साथी !


अभी इतना ही-शेष फिर कभी-शुभकामनाओं सहित सादर


- जितेन्द्र उपाध्याय
 
रचनाकार परिचय
जितेन्द्र उपाध्याय

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