प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

मानवता की हृदय-विदारक चीख: एक थका हुआ सच
- मंजू महिमा


 


 

 

सुविख्यात शायरा, सशक्त लेखिका और सटीक अनुवादिका देवी नागरानी जी द्वारा हिन्दी में अनुदित तथा सिंध-लेखिका अतिया दाऊद द्वारा सिन्धी में रचित ‘एक थका हुआ सच’ काव्य संग्रह पढ़ने का अवसर मुझे देवी जी के अनुग्रह से प्राप्त हुआ. पढ़कर मैं अपने प्रतिभावों को रोक नहीं पाई और चाह रही हूँ कि इन्हें मैं सुधि पाठकों से साझा करूँ.

‘एक थका हुआ सच’ अतिया दाउद द्वारा रूह की कलम से छनकर खून की स्याही से लिखा हुआ एक कड़वा सच है, जो नश्तर की तरह हर औरत की रूह को चीरता हुआ लहुलुहान कर देता है. यह एक ऐसा सच है जिसे हर औरत अपने सिले होंठों से सीने में दफ़न किए हुए है...डरती है कि कहीं ये भूत की तरह सामने आकर उसके तथाकथित गृहस्थी के ‘महल’ को ढहा न दे, जिसकी नींव में उसकी ख्वाहिशों की ईंटें दबी है. अतिया दाउद के इस साहसिक कदम को सलाम है.

 

मुझे याद आ रही है, सुप्रसिद्ध उपन्यास लेखिका नासिरा शर्मा जी से करीब 35 वर्षों पहले की एक मुलाक़ात, जिसमें मैंने उन्हें अपनी लिखी नारी-विमर्श की कुछ कविताएँ सुनाई थी. उसमें एक थी-

भारतीय औरत बनाम पेंग्विन

‘बर्फ़ीले अहसासों की धरती पर भी..

भारतीय औरत एक पेंग्विन सी,

अपने को ढाल लेती है,

और उड़ना भूलकर

चलना  सीख लेती है.

उस समय नासिरा जी को यह पंक्तियाँ बहुत सटीक लगीं और पसंद आईं, पर उन्होंने मुझे भारतीय शब्द निकालने की सलाह दी और बताया कि केवल भारत में ही नहीं सभी देशों में औरत को इन्हीं  हालातों से समझौता करना होता है..एशिया में ही नहीं पश्चिम में भी औरतों की स्थति दयनीय ही है, भले ही उनके क्षेत्र अलग क्यों न हों.’ नासिरा जी ने भी मुस्लिम और सिंध प्रदेश की महिलाओं के साथ हो रहे शोषण को अपने उपन्यासों में बखूबी उकेरा है. इसी श्रृंखला में सिन्ध की लेखिका अतिया दाऊद का यह ‘एक थका हुआ सच’ काव्य-संग्रह अपना स्थान बना रहा है.

 

 

’एक थका हुआ सच’ नाम बड़ा ही सार्थक लगता है क्योंकि सदियों से ही यह सच्चाई, ज्यों की त्यों चल रही है, इसमें कहीं कोई बदलाव नहीं है, इसीलिए यह सच जैसे अब थकने लगा है, मर्दों की फ़ितरत बदलने में ऐसा लगता है, लाख कोशिशों के बावजूद अभी और समय लगेगा, मैंने करीब 30 वर्ष पूर्व लिखा था--

‘जड़ें तराश तराश कर

बोनसाई तो अब बनाए जाने लगे हैं,

औरत तो सदियों पहले ही

बोनसाई बना दी गई थी,

जो अपने गृहस्थी के गमलें में

उग तो सकती थी,

पर ऊँची उठ नहीं सकती थी..’ (मंजु महिमा)

–और आज इसी बोनसाई को अतिया दाउद जी ‘एक थका हुआ सच’ के रूप में हमारी आँखे खोलते हुए ले आईं हैं.

 

इनका एक-एक शब्द कांच की किरच जैसा लगता है, जैसे टूटे हुए शीशे पर पैर रख दिया हो, जब हम पढ़ते हैं-

‘मैंने किसी के साथ जंग का ऐलान तो नहीं किया था

फिर क्यों करबला का किस्सा दोहराया गया है?

अदालत की कुर्सी पर जज सबके बयान सुन रहा है

अपराधियों के कटघरे में खड़े हैवान के आगे

मैंने अपनी छातियाँ काट कर फेंकी हैं

मुझसे हमदर्दी करने वाले दर्दमंद इन्सानों

मुझे फक़त लफ़्जों की एक ऐसी मुट्ठी दो

कि मेरे होंठ वह बोली बोल पाएँ

जो हवस के तीरों से घायल

मेरी दूध पीती बच्ची,

ख्वाब में मुस्करा सके’

सिले हुए होंठ जब बोलने को विवश हो उठते हैं, तो टांकों में ऐसा ही रिसाव लाज़मी हो जाता है. कतरा-कतरा खून का टपक रहा हो जैसे टप..टप..!

 

एक भोगा हुआ सच इस बेबाकी से बयां करना एक औरत के लिए इतना आसान नहीं होता, इसके लिए एक तपिश, हौंसला और रूहानी ताकत चाहिए जो मैं अमृता प्रीतम के बाद अतिया जी में देख रही हूँ. बचपन से ही एक बंधुआ मज़दूर की तरह लड़की को पुरुष का सम्मान करना, उसे अपना मालिक समझना, उसके रहमोकरम पर जीना, उसके प्रति वफ़ादार रहना, उसे खुदा का दर्ज़ा देना (चाहे वह पिता हो, पति हो, भाई हो या बेटा हो...) जन्मघुट्टी की तरह पिला दिया जाता है और औरत बनने के बाद भी वक्त-ब-वक्त उसे ठोक-ठोक कर याद दिला दिया जाता है कि उसका वज़ूद जो भी है, आदमी की ही इनायत है, जिसके लिए अतिया जी ने बड़ी ही संजीदगी से बयां किया है-

‘मैं फरमाबरदारी की टेस्ट-ट्यूब में पड़ी

‘पारे’ की तरह मौसमों की मोहताज हूँ

जन्म से माँ वफ़ा की घुट्टी पिलाती आई है

जो ख़ामोश लिबास की तरह वजूद से चिपटी है

दुखों का तापमान बढ़ने पर भी

टेस्ट-ट्यूब तोड़कर बाहर न निकल पाई हूँ ’

 

अतिया जी का अंदाज़े बयां और लफ़्ज़ों का इस्तेमाल सच ही काबिले तारीफ़ है. एक एक लफ्ज़ तीर की तरह निशाने पर लगता है और पढ़ने वाले के दिल में कसमसाहट पैदा करता है. मैं यह निश्चित रूप से कह सकती हूँ कि यदि अतिया जी की कविताओं को कोई मर्द पढ़े तो वह भी इनके लफ़्ज़ों की तल्खी/तल्खियत से पानी-पानी हो जाएगा, उसे शर्मिंदगी महसूस ज़रूर होगी...

‘मैं तिनके की सूरत में रेत की बवंडर में फेंकी गई हूँ

और वक़्त के कदमों में लोटती हूँ!

दुनिया में आँख खोली तो मुझे बताया गया

समाज जंगल है

घर इक पनाहगाह

मर्द उसका मालिक और औरत किरायेदार!

किराया वह वफ़ादारी की सूरत में अदा करती है’

 

‘विश्वासघात’ रचना में आदमी द्वारा सौत ले आने का दर्द भरपूर उभर कर आया है..मिले-जुले अहसासों को अतिया जी ने बखूबी बयां किया है..जिनमें मोहब्बत, फ़र्ज़ और गुस्सा सभी एक साथ उकेरे गए हैं-

क्या है? जहन्नुम क्या है?

मैं नहीं जानती जन्नत, पर यक़ीन है कि जन्नत

विश्वास से बढ़कर नहीं है

और जहन्नुम सौत के कहकहों से भारी नहीं

लोगों की तन्ज़ और रहम भरी नज़रों से

संगीन कोई पुलस रात नहीं

कभी मुझे सौत का चेहरा

अपने जैसा नज़र आता है

बे-ऐतबारी की झुर्रियाँ

उसके माथे पर भी देखी हैं

मेरी तरफ देखते, उसके सीने में

खुशी, हाथों में पकड़े कबूतर की तरह छटपटा उठती है’

आख़िरकार सच्चाई से नकाब उठाते हुए वे कह ही उठती हैं--

‘दिल चाहता है कि ज़िन्दगी की किताब से

वे सब वर्क फाड़कर फेंक दूँ

जो अपने फ़ायदे की ख़ातिर

तुमने मेरे मुक़द्दर में लिखे हैं!’

पढ़कर अतिया जी की संवेदनशीलता की दाद दिए बिना नहीं रहा जा सकता. इतना ही नहीं, बहुत से प्रतीक और उपमाएं बहुत ही अनूठी और मौलिक हैं-जैसे- चीरे हुए मुर्गे की तरह तड़प, तंग दिली का क़िला, मसलिहत की छत, फरेब का फर्श, ख़्वाहिश के अंधे घोड़े, आँखों के बरसते बाण, बारिश में डरी हुई बिल्ली की मानिंद, बे-ऐतबारी की झुर्रियाँ आदि.

 

अतिया जी सिन्धी भाषा की बहुत ऊँची लेखिका हैं और जिस गहराई में जाकर उन्होंने अपने ज़ज्बातों और लफ़्ज़ों को तराशा है, वह काबिले तारीफ़ है. उनके  दिल में उतर जाने वाले अनुवाद को पढ़कर यह साफ़ लगता है कि उसी गहराई में अनुवादिका देवी नागरानी जी भी उतरी हैं.

अनुवाद का कार्य एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें अपने नहीं एक अजनबी के भावों की अभिव्यक्ति होती है और उसका सही सम्प्रेषण होना ही अनुवादक की सफलता की कसौटी है..और इसमें कहीं भी रत्तीभर संदेह नहीं कि देवी जी केवल सफल ही नहीं हुईं वरन सफलता की चरम सीमा पर पहुंची हैं. उन्होंने हिन्दी साहित्य को सिंधी साहित्य के नारी-विमर्श के अनूठे सच से रूबरू करवाया है. बुर्कों में घुटती आवाज़ को बुलंदी का एक नया फलक दिया है. इसके लिए देवी जी निसंदेह अभिनंदनीय हैं. आतिया जी की कलम को भी पाठक-वृन्द का सलाम है.

देवी जी द्वारा अनुदित इस पुस्तक का हिन्दी साहित्य में स्वागत करते हुए हमें असीम सकून मिल रहा है. इससे पूर्व देवी जी ने कुछ हिन्दी कवियों की रचनाओं को सिन्धी में अनुवाद कर उनकी भावनाओं को सिंध-प्रदेश में पहुंचाया है. उम्मीद है देवीजी भिन्न-भिन्न भाषाओं को अपनी मेघावी प्रतिभा और ऊर्जा से सेतु बनाकर जोड़ती रहेंगी और सिन्धी और हिन्दी भाषाओं के साहित्य को समृद्ध करती रहेंगी. आमीन ..

 

 

सिन्धी काव्य का हिन्दी अनुवाद--एक थका हुआ सच

 (प्रकाशन-2016)

मूल लेखिका:अतिया दाऊद

हिन्दी अनुवाद: देवी नागरानी

समीक्षिका: मंजु महिमा 

 

 

 


- मंजु महिमा
 
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