प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

मंटो कहाँ है?

 

मैं बदहवास-सा मंटो की कब्र पर पहुँचता हूँ और चीख पड़ता हूँ, "मंटोS मंटोS मंटोSSSSS"
कब्र काँपती है। कौन कमबख़्त हमारी नींद मे खलल डाल रहा है!
"मैं हूँ.....तुम्हारा प्रशंसक।"
मंटो मुझे नीचे से ऊपर तक देखता है, अपने गोल फ्रेम के मोटे चश्मे से, "तुम मेरे प्रशंसक...हो ही नहीं सकता।"
"क्यों?"
"मेरे प्रशंसक तवायफें थीं, तांगे वाले थे। तुम्हारे जैसे तोंदियल  खाए-अघाए लोग नहीं। खैर क्यों आए हो?" खिन्नता उसके चेहरे पर झलक उठी।
"देश जल रहा है। हर तरफ दंगा-फसाद हो रहे हैं। बलात्कारों का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। साम्प्रदायिकता की आग फैलती जा रही है।"
"तो मैं क्या करूँ?"
"तुम कुछ लिखते क्यों नहीं?"
"किसके लिए?"
"देश के लिए?"
"कौनसा देश?"
"हिंदुस्तान"


"हिंदुस्तान के लिए लिखूं! वही हिंदुस्तान, जहाँ मेरे मालिक को 24 घंटे का अल्टीमेटम मिला था कि या तो सारे मुसलमान वर्करों को निकाल बाहर कीजिए या फिर बुरे अंजाम को तैयार रहिए। वही न!" नीम-सी कड़वाहट मंटो के लफ्जों में उतर आयी।
"फिर पाकिस्तान के लिए लिखिए। वो भी सुलग रहा है।"
"तुम भी किसकी बात करते हो! मेरे ऊपर दो-दो बार मुकदमा चलाया। मुझे दाने-दाने का मोहताज़ कर दिया। उसके लिए लिखूं!"
"फिर वतन के लिए लिखो।"
"कौनसा वतन! टोबाटेक सिंह को जानते हो, नहीं न! मैं हूँ टोबाटेक सिंह, जिसकी लाश सरहद पर पड़ी आज भी पूछ रही है, मेरा वतन कौनसा है? तू बता न मेरा वतन कौनसा है?" मंटो की ज़ुबान लड़खड़ा रही थी।


"मुझे कुछ नहीं पता बस तुम्हें लिखना होगा।" मैं ज़िद करने लगता हूँ।
"किसलिए लिखूं? एक बार फिर अदालत के चक्कर काटने के लिए! आखिर क्या मिला मुझे? कभी चैन से जी न सका, अब मरने के बाद भी चैन नहीं लेने देते! अब दुबारा पागलखाने नहीं जाना मुझे। अपने बच्चे की लाश दफन कर दी। उसके लिए कुछ न कर सका। आखिर क्या मिला मुझे?"
"देखो मंटो, तुम इमोशनल हो रहे हो। मैं तुम्हारे लिए बढ़िया ब्रांडेड शराब लाया हूँ। मुझे पता है ये तुम्हारी कमजोरी है। तुम न नहीं करोगे। इससे गला तर करो और कलम उठा लो।"


"मैंने अंतिम बार इतनी उम्दा शराब पी है कि अब पीने की ख्वाहिश न रही।"
"कब?"
"उस तांगे वाले को जानते हो, जिसने मेरी मौत की खबर सुनकर तांगा शराब खाने पर रोक कर कहा था, अब तांगा इससे आगे न जाएगा, आज हमारा लेखक मर गया, उसके शोक में मैं सिर्फ पीना चाहता हूँ। उस दिन उसने छककर पी थी। मैं उसी दिन से तृप्त हूँ। तुम्हारी इस शराब पर थूकता हूँ मैं और हाँ अब मुझे सोना है, दुबारा मत आना इधर। मैं मंटो नहीं, सआदत हसन हूँ। पल-पल मरता हुआ सआदत हसन। सुना तुमने!


"तब मंटो कहाँ है?"
"खोजो जाकर किसी लाइब्रेरी में दफ्न होगा।"
उफ़्फ़! इतनी दूर आकर भी कोई फायदा नहीं। मुझे खीझ-सी हुई। शराब की बोतल मैं कब्र पर दे मारता हूँ। ओह माइ गॉड! मेरी आँखे हैरत से फटी रह गयीं। ये खून कहाँ से आ गया। हर तरफ खून ही खून! मैं बदहवासी में वहाँ से भाग खड़ा होता हूँ। कोई है जो लगातार मेरा पीछा कर रहा है।


- नज़्म सुभाष
 
रचनाकार परिचय
नज़्म सुभाष

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कथा-कुसुम (1)