प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- ज़्यादा देर नहीं हुई

शुभा के घर बहुत रौनक लगी थी। पूरा घर लाइट और फूलों से सजा हुआ था। होता भी क्यों ना, कल शुभा की शादी जो थी। उसके पापा विजय कुमार की गिनती शहर के रईसों में होती थी। उन्होंने बहुत मेहनत से अपना एक मुकाम बनाया था।
बड़े से हॉल मे शुभा, फूलों वाली चेयर पर बैठी मेंहदी लगवा रही थी। पीले लहगे में बहुत सुंदर लग रही थी शुभा। हॉल में नाच-गाने का प्रोग्राम जारी था। हर तरफ़ खुशी का माहौल था। शुभा किसी गहरी सोच मे डूबी हुई प्रतीत हो रही थी।


शुभा ने आवाज़ देकर अपनी बड़ी बहन विभा को बुलाया। विभा, शुभा से आठ साल बड़ी थी, दोनों बहनों में बहुत दोस्ती थी। दोनों एक-दूसरे से हर बात शेयर करती थीं।
"क्या हुआ.... ?" विभा ने पास आकर पूछा।
"दीदी! मैं बहुत थक गयी हूँ। कुछ देर आराम करना चाहती हूँ। आप! प्लीज़ मुझे रूम में ले चलो।"
"अच्छा चल रूम में, मैं तुझे अभी नींबू-पानी बना के देती हूँ, मुझे तेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही।" विभा ने उसके पीले पड़ते चेहरे को गौर से देखकर कहा।
"सब ठीक है दीदी!" शुभा ने नज़रें चुराते हुए कहा।


रूम में आकर विभा ने शुभा से पूछा- "चल बता अब! बात क्या है।"
"कोई बात नहीं है दीदी।" शुभा ने एक गहरी साँस ली।
"तूने अभी से पराया कर दिया मुझे! अपने मन की बात भी नहीं बता रही। शादी के बाद तू भूल ही जायेगी कि तेरी कोई बहन भी है।" विभा ने शुभा को छेड़ा।
अचानक विभा के गले लग के शुभा रोने लगी। "दीदी! प्लीज़ मैं शादी नहीं करना चाहती। प्लीज़ पापा को मना कर दो, वो मेरी शादी ना करे प्लीज़ दीदी.....!"
"क्या हुआ शुभा? क्या तुझे समर पसंद नही है।" विभा ने प्यार से उसके सर को सहलाते हुए पूछा।
"ऐसी बात नहीं है दीदी! समर जी मुझे बहुत पसंद हैं पर मैं अभी शादी नहीं करना चाहती।"
"तो फिर बता ना बात क्या है? तू शादी क्यों नहीं करना चाहती? देख तू मुझे बतायेगी नहीं तो मैं पापा को कैसे समझा पाऊंगी?"
"दीदी! प्लीज़ आप बुरा मत मानना, लेकिन मैं आपके जैसी लाइफ नहीं जी सकती। शादी कर के अपने सपनों को नहीं मार सकती। आप भले ही कुछ नहीं कहती हो, पर क्या मुझे दिखाई नहीं देता कि आप अंदर से कितनी दुखी हो! जो जीजा जी आप पर अत्याचार करते हैं, आप सबसे छुपा भी लो पर क्या मुझसे छुपा पाओगी? मैं आपकी आँखें देखकर बता सकती हूँ कि आप खुश हो या उदास हो। इस बार तो जीजा जी ने हद ही कर दी, आपको घर से निकाल दिया है ये बात मैं जान गयी हूँ।"


"ये कैसी बाते कर रही है तू! सभी पुरुष एक जैसे नहीं होते......।" ये कहते हुए विभा का गला भर आया।
"मैं नही जानती दीदी कि सभी पुरुष एक जैसे होते है या नहीं, ना ही जानना चाहती हूँ, बचपन से लेकर आज तक मैंने जितने पुरुषों को देखा है, ऐसे ही देखा है। होंगे वो कोई और पुरुष जो स्त्री का सम्मान करते हों और उन्हें आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हों, मेरी नज़र मे ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो स्त्रियों का सम्मान करता हो। अब पापा को ही देख लो, समाज मे उनकी कितनी इज़्ज़त है, सभी उन्हें बहुत आदर भी देते हैं। सबके लिये पापा के दिल में प्यार और इज़्ज़त है, बस घर आते ही वो पूरी तरह से बदल जाते हैं। इतने कठोर हो जाते हैं कि उनके सामने जाते हुए भी डर लगता है। मम्मी इतने सालों से कोशिश कर रही थी उन्हे इंसान बनाने की लेकिन पापा नहीं बदले। अब तो मम्मी ने भी हार मान ली है। पापा से कुछ कहना ही छोड़ दिया है। हमेशा उदास रहती है। आप बताओ ना दीदी! जीजू हो या चाचू, या ताया जी, पापा जी, कोई भी अपनी वाईफ की इज़्ज़त करते हैं या स्त्रियों की इज़्ज़त करते हैं।"


"ऐसी बात नही है शुभा! ये समाज ही पुरुष प्रधान समाज है। हम कर भी क्या सकते हैं? तेरे शादी ना करने से क्या समाज बदल जायेगा? कभी ना कभी तुझे शादी तो करनी ही होगी ना! कब तक अकेली रहेगी? जब हम कुछ कर ही नहीं सकते तो फ़िर क्या फायदा ऐसी बातें करने का! जो जैसा है, वैसे ही रहने दो। हो सकता है कि आगे चल के सब अच्छा हो जाये....।" ऐसा कह कर विभा ने एक गहरी साँस ली।
"नही दीदी! माफ करना पर आप ग़लत बोल रही हो। अगर हम कोशिश करें तो ही सब ठीक हो सकता है। अपने आप कुछ नहीं होगा। आप ही बताओ, आपने अगर अच्छी पढ़ाई की होती या कोई जॉब कर रही होती या फिर पापा आपको सपोर्ट कर रहे होते तो भी क्या जीजा जी आपको इतना परेशान करते? जीजा जी को ये बात अच्छी तरह से पता है कि वो कुछ भी कर ले आपके साथ, न आप विरोध करोगी और न ही कोई और आपके लिये उनका विरोध करेगा। पापा से तो कोई उम्मीद भी नहीं है। जब वो खुद ऐसा करते है तो किसी और को ऐसा करने से कैसे रोक सकते हैं? जानती हो दीदी! किसी भी इंसान को अगर दूसरे इंसान पर शासन करने का अधिकार मिल जाये तो वो ऐसा ही करेगा, जैसे जीजा जी करते हैं आपके साथ। चलो मैं आपकी बात मान भी लूँ कि वो पुरुष होने की वजह से ऐसा करते हैं तो आपकी सासू माँ, वो फ़िर क्यों ग़लत करती हैं आपके साथ! वो एक स्त्री है ना फिर भी ऐसा करती हैं। मैं जानती हूँ दीदी की शादी के बाद मेरा भी वही हाल होने वाला है, जो आपका है। समर जी चाहे जितने भी अच्छे क्यों न हों, उन्हें भी तो अधिकार मिल जायेगा शासन करने का। मैं भी आपके जैसे विरोध नहीं कर पाऊंगी। चुपचाप सब कुछ सहन करना पड़ेगा। मैं ऐसी लाइफ नहीं जी सकती दीदी! प्लीज़ मैं मर जाऊँगी। जब तक पुरुषों को ये एहसास नहीं होगा कि स्त्री भी एक इंसान है तब तक ग़लत होता ही रहेगा और ऐसा एहसास दिलाने के लिये स्त्रियों को सशक्त और मजबूत होना होगा लेकिन इसके लिये माँ-बाप को जागरूक होना बहुत ज़रूरी है। आखिर हम स्त्रियाँ चाहती क्या हैं! सिर्फ यही ना कि हमें भी इंसान समझा जाये, हमारी इज़्ज़त की जाये। पापा ने भी हमने दसवीं तक पढ़ा के अपने कर्तव्यों की इति श्री कर ली। अब बस शादी करवा देंगे और गँगा नहा लेंगे। शादी के बाद बेटी जी रही है या मर रही है खुश है या नहीं, ये सब जानने की न उनको ज़रूरत है और न ही उनके पास टाईम है। ऐसा ही करना था तो उन्होंने हमें जन्म ही क्यों दिया।" शुभा के रोने मे तेजी आ गयी थी। विभा ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा और बोली- "देख शुभा! मैं ये तो नहीं जानती कि राहुल कभी सुधरेगा या नही, लेकिन इतना ज़रूर जानती हूँ कि मैं मेरे बच्चों का भविष्य कभी खराब नही होने दूँगी। 'आदित्य' को मै 'स्त्रियों' कि इज्ज़त करना सिखाउंगी और 'आन्या ' को पढ़ा-लिखा कर सेल्फ़ डिपेंड बनाऊंगी, ताकि उसे हमारी जैसी लाइफ ना जीनी पड़े। ऐसा मैं अकेले नहीं कर सकती। अब मैं अपने लिये नहीं, अपने बच्चों के लिये जी रही हूँ। देख! समर एक अच्छा इंसान है अगर तू उसे समझाने कि कोशिश करेगी तो वो ज़रूर समझेगा, हो सकता है वो तेरे सपने पूरे करने मे भी तेरी मदद करे ।"
"पर दीदी .......।"
"रात बहुत हो गयी है ,अब तू सो जा। कल बहुत काम है। इस बारे में फिर कभी बात करेंगे......।"   विभा शुभा की बात काटते हुए बोली और कमरे से बाहर निकल गयी। परदे कि ओट मे खड़े 'विजय कुमार ' को भी विभा ने नहीं देखा और आगे बढ़ गयी।
अपने कमरे मे जाते हुए विजय कुमार के पाँव लड़खड़ा रहे थे। किसी काम से वो शुभा के कमरे की तरफ़ निकले थे। दोनों बहनों की बातें उनके कानों में पड़ी, तो वो वहीं खड़े होकर पूरी बात सुनने लगे।


बचपन से लेकर आज तक उन्होंने पुरुषों को शासन करते ही देखा था शायद इसलिये वो खुद भी ऐसे हो गये थे। बचपन में अपनी माँ को सब कुछ सहन करते हुए देखते थे, तो सोचते थे वे अपने पिता जैसे नहीं बनेंगे पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गयी, उनमें सारी आदतें अपने पिता जैसे आती गयी। लेकिन अब वो कुछ नहीं कर सकते थे। शादी भी नहीं रोक सकते थे। बहुत बदनामी हो जाती उनकी। सोचते-सोचते अचानक उनके होंटों पे मुस्कुराहट आ गयी। उन्होंने अपना मोबाइल उठाया और नम्बर डायल कर, किसी से बात करने लगे।
अगली सुबह विजय कुमार के लिये बहुत चमकदार थी। कब दिन से शाम हो गयी उन्हें पता भी नहीं चला।
"बारात आ गयी।" बाहर ढोल-नगाड़ों की आवाज़ सुनकर कोई बोला था। विजय कुमार तेजी से बाहर चले गये, बारात का स्वागत करने के लिये।
जल्दी -जल्दी रस्में पूरी करने के लिए समर को मंडप में लाया गया। आज समर बहुत सुंदर लग रहा था। विभा ने समर की नज़र उतारी।
"दुल्हन को बुलाईये।" पंडित जी ने कहा, विभा शुभा को लाने अंदर चली गयी। शुभा को लाकर समर के बगल में बिठा दिया गया।
शादी की रस्में शुरू हो चुकी थी। समर ,शुभा उठ कर फेरे लेने लगे। छठवें फेरे के बाद विजय कुमार ने कुछ सोचा और उठकर खड़े हो गये व बोले- "रुक जाइये पंडित जी! मुझे समधी जी से कुछ बात करनी है। उसके बाद ही आगे की शादी सम्पन्न होगी।"
सब लोगों में हलचल मच गयी कि आखिर कौनसी बात करना चाहते है विजय कुमार।
"देखिये समधी जी! ये मैने पेपर बनवाये हैं, इसको आप और समर साइन कर दीजिये। उसके बाद ही आगे की रस्में हो पाएंगी।"  विजय कुमार ने अपने हाथ मे लिया हुआ पेपर दिखाते हुए कहा।
"क्या लिखा है इन पेपरों मे?" विजय कुमार के समधी जितेंद्र जी ने पूछा।
"इनमें क्या लिखा है? ये बताने से पहले मैं अपनी पत्नी और बेटियों से माफी माँगना चाहता हूँ कि मैंने आप सबका सम्मान नही किया और ना ही आपके सपने पूरे करने में आपकी मदद की प्लीज़ आप सब मुझे माफ कर दो....।" ऐसा कह कर विजय कुमार ने अपनी पत्नी उमा देवी और विभा, शुभा के सामने हाथ जोड़ दिये।


"आप ये कैसी बातें कर रहे हैं। हमें आपसे कोई शिकायत नहीं है। प्लीज़ आप हम लोगों से माफी मत मांगिये....।" उमा देवी, विजय कुमार का हाथ पकड़ के रोने लगी।
"नहीं उमा! प्लीज़ आज मुझे माफी माँग लेने दो, वरना मैं सारी ज़िन्दगी चैन से नहीं रह पाऊँगा।"
फिर विजय कुमार, जितेंद्र जी की ओर मुड़े और बोले- "आप पूछ रहे थे ना समधी जी की इन पेपरों में क्या लिखा है? इनमें लिखा है कि आप और समर मेरी बेटी शुभा का सम्मान करेंगे, उसके सपने पूरे करने मे उसकी मदद करेंगे और जब तक वो सेल्फ़ डिपेंड नहीं हो जाती, तब तक उस पर कोई 'माँ' बनने का दबाव नहीं डालेगा। बोलिये! मंजूर है मेरी शर्त, तो इन पेपरों पर साइन कर दीजिये.....।"  ये कहते हुए गला भर आया विजय कुमार का। शुभा आश्चर्य से अपने पापा को देख रही थी। उसे तो यकीन ही नही हो रहा था कि उसके पापा इतने बदल सकते हैं। उमा देवी की आँखों में खुशी के आँसू बहने लगे।


"हमें आपकी शर्त मंजूर है। मैंने और समर ने तो पहले ही सोच लिया था कि 'शुभा बिटिया' को आगे की पढ़ाई पूरी करवा कर बिजनेस ज्वाइन करा देंगे । हमारा फैमली बिजनेस समर और शुभा मिल कर सम्भाले, मेरी भी यही इच्छा है। लेकिन अगर वो कुछ और करना चाहती है तो वो भी कर सकती है। कोई दबाव नहीं डालेंगे हम उस पर.....।"   इतना सुनते ही विजय कुमार ने आगे बढ़ कर जितेंद्र जी को गले लगा लिया। ये देख सभी के चेहरों पे मुस्कुराहट आ गयी।
"मैं कुछ और भी कहना चाहता हूँ। मेरी आप सब पुरुषों से हाथ जोड़कर विनती है कि आप लोग स्त्रियों कि इज़्ज़त करें, उन्हें अपने सपने पूरे करने दें। जैसे आपका बेटा समाज में आपका नाम रौशन कर सकता है तो आपकी बेटी भी आपके नाम को ऊँचा कर सकती है। आप उसे अवसर तो दे के देखें......।" विजय कुमार की बात समाप्त होते ही सभी लोग खड़े होकर ताली बजाने लगे। आँखें नम थीं लेकिन होंटों पे मुस्कुराहट थी सबके। उमा देवी, विभा, शुभा इनकी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था।
"लाइये पेपर दीजिये! मैं साइन कर दूँ...।"  विजय कुमार के हाथ से पेपर लेते हुए जितेंद्र जी बोले। पेपर साइन होने के बाद दोनों समधी एक बार फिर गले लग गये।


"सुनिये दामाद जी!" विजय कुमार ने राहुल को अपने पास बुलाया, जो शुभा की शादी में सम्मिलित होने के लिये आया था।
"जी पिता जी...!"
"देखो बेटा, एक पेपर मैंने तुम्हारे लिये भी बनवाया है, जिसमें लिखा है कि मेरे ऑफिस को अब तुम सम्भालोगे और विभा को तंग नहीं करोगे। उसका सम्मान करोगे। बताओ तुम साइन करने के लिये तैयार हो पेपर....?"
"प्लीज़ पिता जी! मैं आपसे और विभा से माफी माँगता हूँ। मुझे माफ कर दीजिये और शर्मिन्दा मत कीजिये। मेरी आँखे अब खुल चुकी हैं। अब मैं और ज़्यादा दिन बच्चों और विभा से दूर नहीं रह सकता।" राहुल के चेहरे से साफ लग रहा था कि वह दिल से शर्मिन्दा है। फिर उसने भी पेपर साइन कर दिया।
"सॉरी विभा.....!"  राहुल ने कहा। विभा ने बिना कुछ बोले उसका हाथ पकड़ लिया। राहुल समझ गया की विभा उसको माफ कर चुकी है। वो आन्या के साथ खेलने लगा।

आज सभी बहुत खुश थे। विजय कुमार भगवान को धन्यवाद दे रहे थे।  शादी की रस्में सम्पन्न होने लगीं। शादी होने के बाद शुभा विजय कुमार के पास आ कर उनका आशीर्वाद लेते हुए बोली- "थेंक्स पापा ....!"
विजय कुमार उसे गले लगाते हुए बोले- "सॉरी बेटा! थोड़ी देर हो गयी समझ आते, पर भगवान का शुक्र है ज्यादा देर नहीं हुई......।


- शिल्पी कृष्णा
 
रचनाकार परिचय
शिल्पी कृष्णा

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कथा-कुसुम (1)