प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर

किसका दोष!
(अनूदित बांग्ला कहानी, मूल लेखक: सुकुमार राय)


एक महाजन और एक व्यापारी था। दोनों में बड़ी दोस्ती थी। एक दिन महाजन ने मोहरों से भरी एक थैली लेकर अपने दोस्त से कहा, ‘‘मैं कुछ दिनों के लिए अपने ससुराल जा रहा हूँ, मेरे कुछ रुपए तुम्हारे पास रख सकते हो?"
व्यापारी बोला, "क्यों नहीं रख सकते? लेकिन मैं किसी और के रुपए अपने हाथों में लेना पसंद नहीं करता। तुम तो मेरे दोस्त हो, तुमसे क्या कहूँ, मेरे उस संदूक को खोलकर तुम स्वयं उसमें अपने रुपए रख दो- मैं उन रुपयों को हाथ भी नहीं लगाउंगा। तब महाजन मोहरों की वह थैली अपने व्यापारी दोस्त की संदूक में रखकर इत्मिनान से घर चला गया।


उस तरफ दोस्त के चले जाने के साथ ही व्यापारी का मन कैसा चंचल हो उठा। उसका मन बार-बार उन मोहरों की ओर चला जाता और वह सोचता कि पता नहीं दोस्त ने उनमें कितने रुपए रखे होंगे। एक बार खोलकर देखने में भला क्या दोष है? ऐसा सोचते हुए वह संदूक खोलकर थैली में देखने लगा- ढेर सारी चमकती हुई मोहरें! इतनी सारी मोहरें देखकर व्यापारी को बड़ा लोभ हुआ। उसने तुरंत मोहरें उठा लीं और उसके बदले में कुछ पैसे भरकर थैली का मुँह बंद कर दिया।

दस दिन बाद जब उसका दोस्त वापस आया, तब व्यापारी बड़ी खुशी से उससे बतियाने लगा लेकिन उसका मन बार-बार कहने लगा कि उसने गलत काम किया है। "दोस्त ने मुझ पर भरोसा कर वे रुपए रखे थे और मैंने उन्हें हटाकर उचित नहीं किया' इधर-उधर की बातों के बाद महाजन बोला कि अब रुपए लेकर मैं जाना चाहूंगा, वे रुपए कहाँ हैं? व्यापारी ने कहा, "हाँ दोस्त, तुम वे ले जाओ। तुमने जहाँ रखे थे, वहीं मिलेंगे- मैंने थैली को नहीं हटाया।" महाजन ने संदूक खोलकर अपनी थैली निकाल ली। लेकिन ये क्या अनहोनी है? थैली में इतनी मोहरें थीं, सब कहाँ गईं? यहाँ तो केवल पैसे ही हैं! महाजन सिर पर हाथ रखकर वहीं बैठ गया।

व्यापारी बोला, "ये क्या मित्र! तुम नीचे क्यों बैठ गए?" मित्र बोला, "भाई, सर्वनाश हो गया! मेरी इस थैली में कितनी मोहरें रखी थीं, अब देख रहा हूँ कि एक भी मोहर नहीं है, केवल कुछ पैसे पड़े हैं।" व्यापारी बोला, "ऐसा कभी होता है भला? मोहरें कभी पैसे में बदल जाती हैं?" वह चेहरे पर ऐसे भाव लाने लगा जैसे उसे इस बात पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, बिल्कुल आश्चर्यचकित हो गया है। पर उसके दोस्त ने देख लिया था कि उसके चेहरे का रंग बिल्कुल उड़ चुका है। उसे सारी बात समझ में आ गई- फिर भी उसने किसी तरह की नाराज़गी नहीं दिखाई बल्कि हँसकर बोला, "मैं तो जानता था कि वे मोहरें ही हैं, पर अब मुझे लग रहा है कि मुझे कोई ग़लतफहमी हो गई होगी। जाने दो, जो गया सो गया। यह सोचने से क्या फायदा।" ऐसा कहते हुए वह व्यापारी को अलविदा कहते हुए पैसों की थैली लेकर घर लौट आया। व्यापारी मन ही मन निश्चिंत हुआ।

दो महीने बाद एक दिन अचानक महाजन अपने दोस्त के घर आकर बोला, "दोस्त आज मेरे घर में पीठे (एक प्रकार की मिठाई) बन रही हैं। शाम को तुम्हारे बेटे को मेरे यहाँ भेज देना। शाम के वक्त व्यापारी अपने बेटे को महाजन के घर पर छोड़ आया और जाते वक्त वह बोला, "शाम ढलते समय मैं उसे लेने आउंगा।" महाजन ने लड़के के कपड़े बदल दिए और उसे कहीं छुपा दिया। उसने एक बंदर को उस लड़के के कपड़े पहनाकर अपने घर में बैठा रखा।
संध्या समय ज्यों ही व्यापारी महाजन के घर आया तो दोस्त को देखते ही महाजन ने मुँह लटकाकर कहा, "भाई, बड़ी मुसीबत में फँस गया हूँ। तुम जब अपने बेटे को यहाँ छोड़ गए थे तब तो वह बड़ा ही प्यारा-सा, गोल-मटोल-सा बच्चा था, पर अब देख रहा हूँ कि कैसा तो हो गया है, बिल्कुल बंदर की तरह दीख रहा है। इसका क्या किया जाए, मित्र।" यह देखकर व्यापारी पत्थर की तरह स्थिर हो गया। वह बोला, "क्या पागल की तरह बक रहे हो? मनुष्य कभी बंदर हो सकता है?" महाजन ने बड़ी शांतिपूर्वक कहा, "क्या पता भाई! आजकल पता नहीं कैसे भूतहा कारनामे हो रहे हैं, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा। अरे देखो ना, उस दिन मेरे सोने की मोहरें अपने आप ही तांबे के पैसे बन गए। बड़ी अजीब बात है!"


तब व्यापारी महाजन पर नाराज़ होते हुए गाँव के प्रधान के पास शिकायत करने के लिए दौड़ा। प्रधान के हुक्म पर चार सिपाही महाजन को पकड़कर उनके सामने ले आए। प्रधान बोले, "तुमने इनके बेटे का क्या किया?" सुनकर अपनी दोनों आंखों को गोल घुमाते हुए महाजन ने बड़े भोलेपन से कहा, "मैंने? मैं तो बड़ा सीधा-सादा आदमी हूँ, मैं क्या इतनी बातें समझ सकता हूँ? हुजूर, मैंने उसके घर पर मोहरें रखीं थीं, दस ही दिनों में सब पैसे बन गईं। इधर उसका बेटा मेरे घर आते ही बिल्कुल बदल गया, एक लंबी पूंछ वाला हट्टा-कट्टा बंदर बन गया। ये क्या हो रहा है, मुझे तो ये सब भूत-प्रेत  के कारनामे लग रहे हैं।" इतना कहते हुए वह प्रधान को प्रणाम करने लगा।

गाँव के प्रधान बुद्धिमान थे, असली बात समझने में उन्हें देर न लगी। वे बोले, "ठीक है, तुम दोनों घर जाओ। मैं फकीर बुलाकर झाड़-फूंक करवाकर भूत उतारने की व्यवस्था करता हूँ। तुम अपने पैसों की थैली अपने दोस्त को दे दो, और तुम अपने बंदर बेटे को उसे लौटा दो। अगर कल सुबह तक सब ठीक न हो जाए तो समझ लेना कि इसमें तुम दोनों में से किसी की शैतानी है। सावधान! ऐसा होने पर तुम्हारे पैसे भी नहीं मिलेंगे और मोहरें भी नहीं मिलेंगी। और तुम्हारा बेटा तो मरेगा ही, मैं उसके माता-पिता, चाचा-ताऊ सबको मार डालूंगा।"

व्यापारी पैसों की थैली अपने साथ लेकर सोचते-सोचते घर की तरफ बढ़ने लगा। महाजन बंदर को लेकर हंसते-हंसते घर की तरफ लौटा। सुबह होते ही व्यापारी महाजन की थैली में सारी मोहरें भरकर उसके घर की तरफ लपका। मित्र से मिलते ही उसने उत्साहपूर्वक कहा, "दोस्त देखो, बड़ी अजीब बात है। तुम्हारे सारे पैसे फिर से मोहरें बन गए।" महाजन ने कहा, "अच्छा, ऐसी बात है? सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ, इधर मेरे घर में वह बंदर भी तुम्हारे बेटे में बदल गया।"

फिर मोहरों की थैली लेकर व्यापारी के बेटे को लौटाते हुए महाजन बोला, "सून तू एक चोर है, आगे से कभी तूने मुझे दोस्त कहकर पुकारा तो मैं मार-मारकर तेरा मुँह तोड़ दूँगा।"

(सुकुमार राय बांग्ला के सुप्रसिद्ध शिशु साहित्यकार हैं। वे आॅस्कर पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध बांग्ला फिल्मकार सत्यजीत राय के पिता हैं।)


- डाॅ. रेशमी पांडा मुखर्जी
 
रचनाकार परिचय
डाॅ. रेशमी पांडा मुखर्जी

पत्रिका में आपका योगदान . . .
भाषांतर (1)