प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

देशावर

लघुकथा- बाल मन

सुपर हीरोज़, बोइन्ग, रोड रेन्ज़र जैसे कई वीडियो देखते-देखते वो जैसे काल्पनिक दुनिया में खो जाता है। ये सोचकर रेशु ने अपने चार वर्षीय बेटे रॉकी को कृष्णा दिखाने का निर्णय लिया।
उसने यू-ट्यूब पर कृष्णा का वीडियो चलाया। कृष्णा का मिट्टी खाकर अपनी माँ को ब्रह्माण्ड दिखाने का सीन चल रहा था।
"मम्मा देखो कृष्णा ने कुछ डर्टी-डर्टी खाया अभी।"
"हाँ बेटा, उसने मिट्टी खायी थी।"
"मम्मा, अब उसे डॉक्टर के पास ले जायेंगे क्या? मैं अपनी सुपर एम्बुलेंस निकालता हूँ।"
"नहीं, देखो क्या होता है।"
"ओह! इसकी मम्मा को तो इसके माउथ मे सबकुछ दिख गया। घर, पानी, रोड्स, पेड़, पहाड़, स्काई..सब कुछ..!!"
रेशु डूब गयी थी वीडियो में। उसकी तन्द्रा टूटी जब रॉकी चिल्लाया, "मम्मा देखो, मेरे माउथ में आपको सब दिखा?"

गमले से बहुत सारी मिट्टी मुँह मे भरे हुए रॉकी को देखकर रेशू के चेहरे पर अब बनावटी गुस्सा था।



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लघुकथा- विनर

"मैं सोऊंगा यहाँ।"
"नहीं, मैं। तुम जाओ उस बेड पर।"
"ये मेरी जगह है, आप जाओ।"
"तुम तो रोज़ सोते ही हो यहाँ, आज मेरा टर्न।"
"नो…..।"
इतना कहते ही, उस छोटे-से बच्चे ने अपने हाथ-पैरों की पूरी ताकत से पापा को बिस्तर से गिरा दिया।
विजयी मुस्कान लिये आँखें बन्द करके मम्मा से चिपक कर सो गया।

सोने से पहले होने वाली इस रोज़ की जंग में हमेशा की तरह आज भी बेटा ही विनर हो गया।


- ऊषा भदौरिया
 
रचनाकार परिचय
ऊषा भदौरिया

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