प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- रोबोट

बड़े ट्रंक का सामान निकालते हुए शिखा ने बड़े ममत्व से अपने पुत्र राहुल के छुटपन के वस्त्र और खिलौनों को छुआ। छोटे-छोटे झबले, स्वेटर, झुनझुने न जाने कितनी ही चीज़ें उसने बड़े यत्न से अब तक सम्हालकर रखी थीं।

अरे रोबोट! वह चिहुँक उठी। जब दो वर्ष का था बेटा, तो अमेरिका से आये बड़े भैया ने उसे ये लाकर दिया था। कई तरह के करतब दिखाता रोबोट पाकर राहुल तो निहाल हो उठा। उसमें प्राण बसने लगे थे उसके। पर शरारत का ये आलम कि कोई खिलौना बचने ही न देता था। ऐसे में इतना महँगा रोबोट बर्बाद होने देने का मन नहीं हुआ शिखा का। रोबोट से खेलते समय वह बहुत सख्त हो उठती बेटे के साथ। आसानी से राहुल को देती ही नहीं। लाख लानत-मलामत करने पर ही कुछ समय को वह खिलौना मिल पाता। फिर उसकी पहुँच से दूर रखने को न जाने क्या-क्या जुगत लगानी पड़ती उसे।

शिखा के यत्नों का ही परिणाम था कि वह अब तक सही सलामत था। राहुल तो उसे भूल भी चुका था। फिर अब तो बड़ा भी हो गया था, पूरे बारह वर्ष का। अपनी वस्तुओं को माँ के मन मुताबिक सम्हालकर भी रखने लगा था।
"अब राहुल समझदार हो गया है, आज मै उसे ये दे दूँगी। बहुत खुश हो जाएगा, उसका अब तक का सबसे प्रिय खिलौना।" बड़बड़ाते हुए उसकी आँखें ख़ुशी से चमक रही थीं।
तभी राहुल ने कक्ष में प्रवेश किया।


"देख बेटा, मेरे पास क्या है?" उसने राज़दाराना अंदाज में कहा।
"क्या माँ?"
"ये रोबोट, अब तुम इसे अपने पास ही रख सकते हो। अब तो मेरा बेटा बहुत समझदार हो गया है।"
"अब इसका क्या करूँगा माँ?" क्षण मात्र को पीड़ा के भाव उभरे, फिर कोई तवज्जो न देते हुए सख्त लहजे में बोला, "मैं कोई लिटिल बेबी थोड़े ही हूँ जो रोबोट से खेलूँगा।"



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लघुकथा- गुमनाम होता बचपन

आज उसकी खुशियों का ठिकाना न था। उसके उपन्यास को सरकार का प्रतिष्ठित पुरस्कार, प्रमाण पत्र, नकद राशि और दुशाला प्राप्त हुआ था। पत्रकारों के कैमरे की चमचमाती रोशनी, लोगों की ऑटोग्राफ की माँग, सबकी निगाहों की केंद्र बिंदु बनी वह खुशी से झूम उठी। आज उसके कदम ज़मीन पर नहीं थे। बचपन का स्वप्न साकार हुआ था। जबसे होश सम्हाला था, यही स्वप्न देखा था कि बड़ी होकर उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध होगी। उसका मन फूल-सा खिल उठा। गर्व की भाव-भंगिमा से उसने उपस्थित दर्शकों को देखा।

कितनी मेहनत की थी उसने इस उपन्यास के चक्कर में। दुनिया को भूलकर उसमें खुद को झोंक दिया था। रॉयल्टी, प्रसिद्धि, सम्मान अब ये सब उसकी मुट्ठी में थे। दुनिया में आये हो तो अपनी एक जगह बनाओ। ये साबित करो कि ईश्वर ने तुम्हें किसी विशेष उद्देश्य से भेजा है। अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित करो। यह उसका दृष्टिकोण था।

घर लौटते हुए उसने अपने नन्हे बेटे के लिये चॉकलेट और हेलीकॉप्टर, बेटी के लिये बार्बी डॉल और उसका महल ले लिया। खुशी के इस अवसर पर बच्चों की खुशी का उसने विशेष ख़याल रखा था। कबसे उसने बच्चों को जी भरकर लाड़ भी नहीं किया था। आज उन्हें बहुत प्यार करेगी।
घर पहुंची तो देखा पाँच वर्षीय बेटा बड़ी बहन की गोद में सो रहा था। उसकी आँखों में सूखे अश्रु चिन्ह, तप्त शरीर, तोड़े-मरोड़े गए खिलौने, अधूरा होम वर्क, डायरी में टीचर की शिकायत। उसका कलेजा कांप उठा।

उफ्फ...ये क्या कर बैठी मैं? अपनी महत्वाकांक्षा में अपने बच्चों के बचपन को ही गुमनामी के अंधेरों में धकेल दिया!!


- ज्योत्स्ना 'कपिल'
 
रचनाकार परिचय
ज्योत्स्ना 'कपिल'

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कथा-कुसुम (4)