प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- आकांक्षा

"नन्हीं रूचिका का अभिनय बहुत दमदार रहा। फिल्म में बड़े-बड़े कलाकारों के रहते भी उसने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। दर्शकों का मन मोह लिया। उसके नाम की बड़ी चर्चा है। आपको कैसा लग रहा है?" एक टी.वी. चैनल का संवाददाता रूचिका की माँ से पूछ रहा था।
"बेटी की कामयाबी से जो ख़ुशी मिली, उसे बयान करना कठिन है। माता-पिता जब बेटा-बेटी के नाम से पहचाने जाते हैं तो उन्हें बहुत गर्व होता है।" शैली ने ख़ुश होते हुए जबाब दिया।
"अभी रूचिका बहुत छोटी है। वह अपना ध्यान पढ़ाई में लगायेगी या फिर अभिनय जारी रखेगी?"
"पढ़ाई भी करेगी, लेकिन अगर कहीं अच्छी फिल्म में रोल मिला तो ज़रूर करेगी।"
"शैली जी, क्या मैं रूचिका से बात कर सकता हूँ?"
"हाँ, क्यों नहीं। रूचिका बेटे, ज़रा इधर आना।"


दूसरे कमरे से रूचिका आई तो संवाददाता बोला, "रूचिका बेटे, कैसी हो?"
"ठीक हूँ अंकल।"
"अच्छा ये बताओ, आपको क्या-क्या अच्छा लगता है?"
"मुझे.....रिया, दिया के साथ खेलना। पार्क में जाना और साइकिल चलाना।....और खूब सारा पिज्जा खाना बहुत अच्छा लगता है।"
"और आप बड़ी होकर क्या बनना चाहती हो?" संवाददाता ने मुस्कुराते हुए पूछा।
"मैं तो टीचर बनूंगी। टीचर ना सबको डाँट सकती है....।" बोलते हुए उसकी नज़र उसकी माँ पर गई तो वह सकपका गई।
"नहीं अंकल...मैं तो न... बड़ी कलाकार बनूंगी, दीपिका जैसी।" घबराते हुए रूचिका अटक-अटक कर बोली।


- डॉ. उपमा शर्मा
 
रचनाकार परिचय
डॉ. उपमा शर्मा

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कथा-कुसुम (1)