प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- बारिश वाला पास्ता

शिप्रा जल्दी-जल्दी दफ्तर से बाहर निकली।
"उफ्फ! ये मुम्बई की बारिश।" बड़बड़ाते हुए हुए उसने स्कूटी स्टार्ट की।
सिंगल मदर शिप्रा रोज़ 7 बजे तक घर पहुँच जाती थी। जब बेटी स्माइली 5 साल की थी तभी पति से तलाक हो गया था। आज बेटी 11 साल की है। स्कूल से 3 बजे आती है। मेड खाना खिलाकर उसे ट्यूशन भेज देती है। उसके बाद डांस क्लास जाती है। ट्यूशन व डांस क्लास साथ वाली बिल्डिंग में ही है तो शिप्रा लौटते हुए स्माइली को वहाँ से पिक कर लेती है। मेड तो स्माइली को ट्यूशन पर भेज घर चली जाती है।


बारिश ने सड़कें जाम कर रखीं थीं। शिप्रा भी स्कूटी लेकर जाम में फंसी थी।
"कहीं से थोड़ी जगह मिले तो निकलूं!" इसी उधेड़बुन में समय निकल रहा था। शिप्रा ने समय देखा 6 बज चुके थे।
"क्या करूँ, अभी एक घण्टे में स्माइली की डांस क्लास खत्म हो जाएगी। मैं तब तक पहुँच नहीं पाऊंगी!" इसी टेंशन के मारे शिप्रा ने जाम से निकलने की कोशिश की।
"अरे मैडम, कहाँ स्कूटी घुसा रही हैं? जगह है क्या?" आगे की गाड़ी वाले ने आँखें तरेरते हुए कहा।
शिप्रा ने ज़रा-सी जगह से स्कूटी निकालने की कोशिश की तो आगे खड़ी गाड़ी से रगड़ खाते हुए स्कूटी ओर ज़्यादा फँस गयी।


"डांस टीचर को फोन करती हूँ। कुछ देर स्माइली को अपने पास रोक ले।"
यह सोचकर शिप्रा ने फोन निकालने के लिए बैग खोला।
"पाखी, सुनो बारिश के कारण जाम में फंसी हूँ। थोड़ी देर हो जाएगी। स्माइली को कुछ देर अपने पास रोक लेना प्लीज़। इट्स अ रिक्वेस्ट।" शिप्रा ने डांस टीचर को फोन किया।
"शिप्रा, आज तो डांस क्लास हुई ही नहीं। बारिश के कारण कैंसिल कर दी। मैंने तुम्हारी मेड को मैसेज दे दिया था। शायद ट्यूशन भी कैंसिल हो गयी। मेड बता रही थी। स्माइली घर पर ही है। मेड उसे खाना खिलाकर चली गयी।" डांस टीचर के जवाब से शिप्रा की टेंशन ओर बढ़ गयी।
"ओह! ठीक है। मैं जल्दी पहुँचने की कोशिश करती हूँ।"


जाम में रेंगते रेंगते शिप्रा की स्कूटी बढ़ रही थी। कई ख़याल उसके मन-मस्तिष्क को झिंझोड़ रहे थे।
"ज़माना कितना ख़राब है! बेटी अकेली है। कोई घर में घुस गया तो? अपने फ्लोर पर एक फ्लैट तो खाली है। एक और फ्लैट वाले विदेश में हैं। बिल्डिंग के वॉचमैन को फोन करूँ?"
शिप्रा ने वॉचमैन को फोन लगाया फिर काट दिया। मन ने आवाज़ दी- "नहीं नहीं, उसका क्या भरोसा! है तो भला पर कब नीयत बदल जाये! अकेली बच्ची के साथ कुछ कर दिया तो….?"
शिप्रा इन्हीं चिंताओं में घिरी स्कूटी धीरे-धीरे आगे बढ़ा रही थी। सारे रिश्तेदार भी मुंबई से बाहर रहते थे। यहाँ वो ओर उसकी बेटी अकेले थे। क्राइम पेट्रोल, सावधान इंडिया के सारे बच्चों के साथ क्राइम वाले एपिसोड शिप्रा की आंखों के आगे घूमने लगे।
उसने बेटी को फोन करना चाहा। अचानक स्कूटी को धक्का लगा। फोन सड़क पर भरे पानी के अंदर! शिप्रा के आँसू छलक उठे।
"अब क्या करूँ! बेटी को भूख लगी होगी। फ्रिज में फल भी नहीं पड़े। क्या खायेगी?"
नास्तिक शिप्रा ने सारे देवी-देवताओं की मनौतियाँ मना डालीं।


रात करीब दस बजे शिप्रा घर पहुँची। डोर बेल बजायी। स्माइली ने दरवाज़ा खोला। मम्मी का एप्रिन डाले स्माइली खड़ी थी। एप्रिन उसके पैरों से बाहर जा रहा था। शिप्रा ने तुरंत स्माइली को गोद में उठाकर बहुत प्यार किया।
"आज बहुत देर हो गयी।"
"मम्मी, मैं समझ गयी थी। बारिश के कारण आपको देर हो गयी। आपका फोन नहीं लग रहा था।"
"अच्छा मम्मी, जल्दी-जल्दी किचन में आओ। देखो, मैंने आपके लिए क्या बनाया है?"
स्माइली, शिप्रा को किचन में ले गयी। किचन में सारे बर्तन उलट-पुलट थे। ऐसा लग रहा था जैसे कोई तूफान आया हो।
"यहाँ बैठो।"
स्माइली ने शिप्रा को किचन में पड़ी चेयर पर बिठाया।
कैसरोल खोला- "मम्मी, ये खाओ, मैंने बनाया है।"
शिप्रा अवाक-सी देख रही थी। उसकी स्माइली कितनी सहज थी। उसने परिस्थिति को कितनी सहजता से लिया। कुछ बना भी लिया।
"क्या सोच रही हो! खाओ न।" स्माइली ने चम्मच भर कर मम्मी के मुँह में डाला। पास्ता कच्चा था।
"कैसा बना है? जैसा आप बनाते हो वैसा नहीं बना न?" स्माइली ने उत्सुकता से पूछा।
"ये दुनिया का सबसे टेस्टी पास्ता है। इसमें जो स्वाद है वो तो मैं भी कभी न ला पाती।" शिप्रा ने स्माइली को गले लगाकर कहा।



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लघुकथा- गीली मिट्टी

"मम्मी, अगर आपने मुझे चॉकलेट न दी तो मैं आपको गोली मार दूँगा।" आठ वर्षीय गोपू ने माँ पर टॉय गन तानते हुए कहा।
रूपा गोपू की इस हरकत पर अवाक रह गयी। ख़ुद पर नियंत्रण रखते हुए उसने गोपू को पास बुलाया।
"गोपू बेटा, ऐसा नहीं कहते। ये बुरी बात होती है।"
"कहते हैं! पापा ने जो गेम मुझे दिलाई है, उसमें हीरो को जब कोई चीज़ नहीं मिलती तो वह लड़कर सबको गोली मार देता है।" गोपू ने अपनी बात को तर्क देते हुए रखा।
रूपा, गोपू के इस व्यवहार से हैरान थी। इतना छोटा बच्चा और ऐसी हिंसात्मक सोच...!


प्रणव ने तभी कमरे में प्रवेश किया। गोपू दौड़ कर पापा से लिपट गया।
"पापा, आप आज मेरे लिए वो रोबोट वाला टॉय लाना।"
"रोबोट वाला टॉय बॉक्सिंग करके सबको खत्म कर देता है।"
" जरूर बेटा, आज ऑफिस से आते हुए लेकर आऊंगा।"
"गोपू, तुम बाहर जा कर खेलो। मुझे पापा से कुछ बात करनी है।" मम्मी के कहने पर गोपू कमरे से बाहर चला गया।
"प्रणव, ये सब ठीक नहीं है। गोपू को इस तरह की हिंसा सिखाने वाली गेम्स और खिलौने दिलाना सही नहीं है।" रूपा ने कुछ नाराज़गी वाले स्वर में प्रणव से कहा।
"अरे सब सही है। आजकल बच्चे इन्हीं सब से खेलते हैं। तुम क्या चाहती हो कि गोपू को पुराने ज़माने के गुड्डे -गुड़ियाँ लाकर दूँ!"
"हाऊ बैकवर्ड...!"
"प्रणव, इसमें बैकवर्ड की क्या बात है। गोपू हिंसा की ओर आकर्षित हो रहा है। खिलौनों का बच्चे के दिमाग पर सकारात्मक प्रभाव होना चाहिए।"
"लेकिन गोपू जिन खिलौनों से खेलता है, वे उसे नकारात्मक बना रहे हैं।"
"क्या तुम भी! इतने छोटे बच्चे में मनोविज्ञान ढूँढ रह हो।"
"प्रणव, बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं। माता-पिता की भूमिका कुम्हार की होती है। उन्हें बच्चे को भविष्य के लिए सही आकार देना होता है।"
"रूपा, छोड़ो अपनी दकियानूसी बातें।"


तभी ज़ोर से कुछ गिरने की आवाज़ आयी।
रूपा और प्रणव दौड़ कर बाहर गए। सामने उनकी सर्वेंट मिन्नी खड़ी थी। मिन्नी के सिर से खून बह रहा था। ज़मीन पर दूध बिखरा था और गिलास टूटा पड़ा था।
"मैडम, मैं गोपू को दूध दे रही थी। उसने गिलास तोड़ दिया। फ्लॉवर पॉट मेरी ओर फेंका। देखो कितना खून निकल रहा है।"
रूपा ने प्रणव की ओर देखा।
प्रणव को समझ आ रहा था कि एक पिता की भूमिका में वह गलती कर रहा है। उसे गीली मिट्टी से अपने बेटे को सही आकार देना है।
प्रणव ने गोपू की हिंसा सिखाने वाली सारी गेम्स व खिलौने बाहर फिंकवा दीं।


बच्चा खिलौने ढूंढेगा, मांगेगा भी। प्रणव जानता है कि यहाँ रूपा और उसे गोपू के साथ अधिक समय बिताना होगा।
अच्छी नैतिक शिक्षा व कहानियों, चित्रों वाली पुस्तकें, ज्ञानवर्धक ब्लॉक्स, अच्छे स्थानों पर भ्रमण, किसी कला की ओर गोपू को आकर्षित करना- ये कुछ उपाय हैं जिनसे गोपू को रचनात्मकता की ओर मोड़ा जा सकता है। यह निर्णय रूपा व प्रणव को सार्थक लग रहा था।


- डॉ. संगीता गांधी
 
रचनाकार परिचय
डॉ. संगीता गांधी

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कथा-कुसुम (2)