प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- अनन्त आकाश


मेरे देखते ही बना था ये घोंसला, मेरे आँगन में आम के पेड पर- चिड़िया कितनी खुश रहती थी और चिड़ा तो हर वक्त जैसे उस पर जां-निसार हुआ जाता था। कितना प्यार था दोनो मे! जब भी वो इकट्ठे बैठते, मैं उन को गौर से देखती और उनकी चीं-चीं से बात, उनके जज़्बात समझने की कोशिश करती।

"चीं-चीं-चीं---अजी सुनते हो? खुश हो क्या?"
"चीं-चीं-चीं---बहुत ख़ुश। देखो रानी अब हमारा गुलशन महकेगा, जब हमारे नन्हें-नन्हें बच्चे चहचहायेंगे।" चिड़ा चिड़िया की चोंच से चोंच मिला कर कहता।
"चीं-चीं-चीं- तब हमारे घर बहारें ही बहारें होंगी।" चिड़िया उल्लास से भर जाती।
दोनों प्यार में चहचहाते दूर गगन में इकट्ठे दाना चुगने के लिये उड़ जाते। फिर शाम गये अपने घोंसले में लौट आते। मैं सुबह उठ कर जब बाहर आती हूँ दोनों उड़ने के लिये तैयार होते हैं। उनको पता होता है कि मैं उन्हें दाना डालूँगी, शायद इसी इन्तज़ार मे बैठे रहते हों। इसके बाद मैं कामकाज मे व्यस्त रहती और शाम को जब चाय पी रही होती तो लौट आते।


बरसों पहले कुछ ऐसा ही था हमारा घर और हम। 37 वर्ष पहले शादी हुई, फिर साल भर बाद ही भरा-पूरा परिवार छोड़ कर हम शहर में आ बसे। इस शहर में इनकी नौकरी थी। घर सजा-बना लिया। दो लोगों का काम ही कितना होता है। ये सुबह ड्यूटी पर चले जाते, मैं सारा दिन घर में अकेली उदास परेशान हो जाती। 3-4 महीने बाद मुझे भी एक स्कूल में नौकरी मिल गयी। फिर तो जैसे पलों को पँख लग गये - समय का पता ही नहीं चलता। सुबह जाते हुए मुझे स्कूल छोड़ देते और लँच टाईम में ले आते। बाकी समय घर के कामकाज में निकल जाता। रोज़ कहीं न कहीं घूमने, कभी फिल्म देखने तो कभी बाज़ार तो कभी किसी मित्र के घर चल जाते- चिड़े चिड़ी की तरह बेपरवाह!!
अतीत के पन्नो में खोई कब सो गयी, पता ही नहीं चला।


सुबह उठी तो देखा कि चिड़िया दाना चुगने नहीं गयी। चिड़ा भी आसपास ही फुदक रहा था। पास से ही कभी कोई दाना उठाकर लाता और उस की चोंच में डाल देता। कुछ सोच कर मैं अन्दर गयी और काफी सारा बाजरा पेड़ के पास डाल दिया। ताकि उन्हें दाना चुगने दूर न जाना पड़े। उसके बाद मैं स्कूल चली गयी। जब आयी तो देखा चिड़िया अकेली वहीं घोंसले के अन्दर बैठी थी। मुझे चिन्ता हुई कि कहीं दोनों में कुछ अनबन तो नहीं हो गयी? तभी चिड़ा आ गया और जब दोनों ने चोंच से चोंच मिलायी तो मुझे सुकून हुआ। देखा कि चिड़ा घोंसले के अन्दर जाने की कोशिश करता तो चिडिया उसे घुसने नहीं देती मगर वो फिर भी चिडिया के सामने बैठा कभी-कभी उसे कुछ खिलाता रहता। मैं उन दोनो की परेशानी समझ गयी। चिड़िया अपने अण्डों को से रही थी। दोनो अण्डों को ले कर चिन्तित थे। माँ का ये रूप पशु-पक्षिओं मे भी इतना ममतामयी होता है, देखकर मन भर आया।

कुछ दिन ऐसे ही निकल गए। मैं रोज़ बाजरा आदि छत पर डाल देती। एक दोने में पानी रख दिया था ताकि उन्हें दूर न जाना पड़े। उस दिन, रात जल्दी नींद नहीं आयी। सुबह समय पर आँख नहीं खुली, वैसे भी छुट्टी थी। चिड़ियों का चहचहाना सुनकर बाहर निकली तो देखा धूप निकल आयी थी। पेड़ पर नज़र गयी तो वहाँ चिड़िया के घोंसले में छोटे-छोटे बच्चे धीमे से चीं-चीं कर रहे थे। चिड़िया अन्दर ही उनके पास थी। चिड़ा बाहर डाल पर बैठकर चिल्ला रहा था, जैसे सब को बता रहा हो और आसपास पक्षिओं को न्यौता दे रहा हो कि उसके घर बच्चे हुए हैं। मैं झट से अन्दर गयी और घर में पड़े हुए लड्डू उठा लाई। उनका चूरा कर छत पर डाल दिया। इधर-उधर से पक्षी आते, अपना-अपना राग सुनाते, लड्डु खाते और चीं-चीं करते उड़ जाते। आज आँगन में कितनी रौनक थी।

ऐसी ही रौनक अपने घर में भी थी, जब हमारा बड़ा बेटा हुआ था। मेरी नौकरी के कारण मेरे सासू जी भी यहीं आ गये थे। स्कूल से आते ही बस व्यस्त हो जाती। हम उसे पाकर फूले नहीं समा रहे थे। अभी से कई सपने उसके लिये देखने लगे थे। इसके बाद दूसरा बेटा और फिर एक बेटी हुई। तीन बच्चे पालने में कितने कष्ट उठाने पड़े, ये सोचकर ही अब आँखें भर आतीं। कभी कोई बच्चा बीमार तो कभी कोई प्रॉब्लम। जब कभी सासू जी गाँव चली जातीं तो कभी छुट्टियाँ ले कर तो कभी किसी काम वाले के जिम्मे छोड़कर इन्हें जाना पड़ता। अभी बेटी 6 माह की हुई थी कि सासू जी भी चल बसीं। बच्चों की खातिर मुझे नौकरी छोड़नी पड़ी। उस दिन मुझे बहुत दुख हुआ था। मेरी बचपन से ही इच्छा थी कि मैं स्वावलम्बी बनूँगी मगर हर इच्छा कहाँ पूरी होती है! इनका कहना था कि आदमी अपने परिवार के लिये इतने कष्ट उठाता है। अगर अच्छी देखभाल के बिना बच्चे ही बिगड़ गये तो नौकरी का क्या फायदा। मुझे भी इनकी इस बात में दम लगा। मगर बच्चे कहाँ समझते हैं माँ बाप की कुर्बानियाँ! उन्हें लगता है कि ये माँ-बाप का फ़र्ज़ है बस। मैं नौकरों के भरोसे बच्चों को छोड़ना नहीं चाहती थी। हम जो आज़ाद पँछी की तरह हर वक्त उड़ान पर रहते, अब बच्चों के कारण घर के होकर रह गये थे।

बच्चे स्कूल जाने लगे। छोटी बेटी भी जब पाँचवीं मे हो गयी तो लगा कि अब समय है। बच्चे स्कूल चले जाते हैं और मैं नौकरी कर सकती हूँ। वैसे भी तीन बच्चों की पढाई एक तन्ख्वाह में क्या बनता है। भगवान की दया से एक अच्छी नौकरानी भी मिल गयी। मैंने भागदौड़ कर एक नौकरी ढूँढ ली। पता था कि मुश्किलें आयेंगी। घर, परिवार और नौकरी। बहुत मुश्किल काम है। मगर मैंने साहस नहीं छोड़ा। बच्चों को अगर उच्च शिक्षा देनी है तो पैसा तो चाहिये ही था।

बच्चे पढ़ लिख गये। बड़ा सॉफ्टवेर इंजिनियर बना और अमेरिका चला गया। दूसरा भी स्टडी विज़ा पर आस्ट्रेलिया चला गया। बेटी की शादी कर दी। हम दोनों बच्चों के विदेश जाने के हक़ में नहीं थे मगर ये विदेशी आँधी ऐसी चली है कि बच्चे पीछे मुड़कर देखते ही नहीं। जिसे देखो विदेश जाने की फिराक में है। बच्चे एक पल भी नहीं सोचते कि बूढे माँ-बाप कैसे अकेले रहेंगे! कौन उनकी देखभाल करेगा! कितना खुश रहते हम बच्चों को देख कर। घर में चहल-पहल रहती। कितना भी थकी होती मगर बच्चों के खान-पान में कभी कमी नहीं रहने देती। ख़ुद हम दोनों चाहे अपना मन मार लें मगर बच्चों को उनके पसंद की चीज़ ज़रूर ले कर देनी होती थी। छोटे को विदेश भेजने पर इनको जो रिटायरमेन्ट के पैसे मिले थे, लग गए। बेटी की शादी कर दी। घर बनाया तो लोन लेकर। अब उसकी किश्त कटती थी। ले दे कर बहुत मुश्किल से साधारण रोटी ही नसीब हो रही थी।

मगर बच्चों को इस बात की कोई चिन्ता नहीं थी। बच्चों के जाने से मन दुखी था। मुझे ये भी चिन्ता रहती कि वहाँ पता नहीं खाना भी अच्छा मिलता है या नहीं। कभी दुख-सुख में कौन है उनका वहाँ दिल भी लगता होगा कि नहीं। जब तक उनका फोन नहीं आता मुझे चैन नहीं पड़ता। हफ्ते में दो-तीन बार फोन कर लेते।

बड़े बेटे के जाने पर ये उससे नाराज़ थे। हमारी अक्सर इस बात पर बहस हो जाती। इनका मानना था कि बच्चे जब हमारा नहीं सोचते तो हम क्यों उनकी चिन्ता करें। जिन माँ-बाप ने तन-मन-धन लगाकर बच्चों को इस मुकाम पर पहुँचाया है, उनके लिये भी तो बच्चों का कुछ फर्ज़ बनता है। वैसे भी बच्चों को अपनी काबिलियत का लाभ अपने देश को देना चाहिये। मगर मेरा मानना था कि हमें बच्चों के पैरों की बेड़ियाँ नहीं बनना चाहिये। बड़ा बेटा कहता कि आप यहाँ आ जाओ। मगर ये नहीं माने। हम लोग वहाँ के माहौल में नहीं एडजस्ट कर सकते।

बड़े बेटे ने वहाँ एक लडकी पसंद कर ली और हमें कहा कि मैं इसी से शादी करूँगा। आप लोग कुछ दिन के लिये ही सही यहाँ आ जाओ। मगर ये नहीं माने। उसे कह दिया कि जैसे तुम्हारी मर्जी हो कर लो। दोनों पिता-पुत्र के बीच मेरी हालत खराब थी। किसे क्या कहूँ!! दोनो ही शायद अपनी अपनी जगह सही थे। उस दिन हमारी जमकर बहस हुई।
"मैं कहती हूँ कि हमें जाना चाहिये। अब ज़माना हमारे वाला नहीं रहा। बच्चे क्यों हाथ से जाएँ?"
"वैसे भी कौन-सा अपने हाथ में है। अगर होते तो लड़की पसंद करने से पहले कम से कम हमें पूछते तो? बस कह दिया कि मैंने इसी से शादी करनी है। आप आ जाओ। ये क्या बात हुई!!"
"देखो अब समय की नज़ाकत को समझो। जब हम अपने आपको नही बदल सकते, वहाँ एडजस्ट नही कर सकते तो बच्चों से क्या आपेक्षा कर सकते हैं। फिर हमने अपनी तरह से जी लिया, उन्हें उनकी मर्ज़ी से जीने दो। फिर हम भी तो माँ-बाप को छोड़कर इस शहर मे आये ही थे!"
"पर अपने देश में तो थे। जब मर्जी हर एक के दुख-सुख में आ जा सकते थे। वहाँ न मर्जी से कहीं आ जा सकते हैं न ही वहाँ कोई अपना है।"


कई बार मुझे इनकी बातों मे दम लगता। हम बुज़ुर्गों का मन अपने घर के सिवा कहाँ लगता है? 'जो सुख छजू दे चौबारे, वो न बल्ख न बुखारे'। मैं फिर उदास हो जाती। बात वहीं खत्म हो जाती।
एक दिन इन्होंने बेटे से कह दिया कि हम लोग नहीं आ सकेंगे। तुम्हें जैसे अच्छा लगता है कर लो, हमे कोई एतराज़ नहीं। मैं जानती थी कि ये बात इन्होंने दुखी मन से कही है।
बेटे ने वहीं शादी कर ली और हमें कहा कि आपको एक बार तो यहाँ आना ही पड़ेगा। इन्होंने कहा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं, वहाँ तुम मेडिकल का खर्च भी नहीं उठा पाओगे। आयेंगे जब तबीयत ठीक होगी। बेटा चुप रह गया। मगर मैं उदास रहती। एक माँ का दिल बच्चों के बिना कहाँ मानता है? छोटे को अभी दो तीन वर्ष और लगने थे पढाई में। उसका भी क्या भरोसा कि वो भी यहाँ वापिस आये या न।


एक साल और इसी तरह निकल गया। बेटे के बेटा हुआ। उसका फोन आया तो मारे खुशी के मेरे आँसू निकल गये। उसने कहा कि माँ हमें ज़रूरत है आपकी। आप कुछ दिन के लिये आ जाओ।
इन्हें ख़ुशख़बरी सुनाई मगर इनके चेहरे पर खुशी की एक किरण भी दिखाई नहीं दी।


"देखिये बहु भी अभी बच्ची ही है वो अकेली कैसे बच्चे को सम्भालेगी? इस समय उन्हें हमारी ज़रूरत है, हमें जाना चाहिये।" मैंने डरते हुए इनसे कहा। मगर वही बात हुई। इनको गुस्सा आ गया-
"हाँ आज उन्हें हमारी ज़रूरत है तो हम जाएँ मगर बहन की शादी पर हमें भी तो उसकी ज़रूरत थी तब क्यों नहीं आया था।"
"तब उसे गये समय ही कितना हुया था। हो सकता है कि उसके पास तब इतने पैसे ही न हों फिर उसने कहा भी था कि इतनी जल्दी मैं नहीं आ सकता। आप शादी की तारीख छ: आठ माह आगे कर लें, मजबूरी थी उसकी।" मैंने बेटे का पक्ष लेने की कोशिश की।
"देखो, मैं तुम्हें नहीं रोकता। तुम्हें जाना है तो जाओ मगर मैं अभी नहीं जा सकता। तुम देख रही हो मैं बीमार हूँ। बी पी कितना बढ रहा है। फिर वहाँ कुछ हो गया तो उनके लिये मुसीबत हो जायेगी। मुझे फिर कभी कहना भी नहीं। मैंने मन को पक्का कर लिया है। उनके बिना भी जी लूँगा। वो वहीं मौज करें।"


गुस्सा इनका भी सही था। मगर माँ का दिल अपनी जगह सही था। माँ भी किस तरह कई बार बाप और बच्चों के बीच किसको चुने वाली स्थिती में आ जाती है।
पति की बात जितनी सही लगती है, बच्चों की नादानी उतनी ही छुपाने की कोशिश में ख़ुद पिस जाती है। भारतीय नारी के लिये पति के उसूल बच्चों की मोह ममता पर भारी पड़ जाते हैं। मैं भी मन मसोस कर रह गयी। समझ गयी कि अब बेटा हाथ से गया। अगर अब हम चले जाते तो भविष्य मे आशा बची रहती कि वो कभी लौट आयेगा। अब शायद वो भी नाराज़ हो जाये।


मन आजकल उदास रहने लगा था। जब से रिटायर हुई हूँ तब से तो बहुत अकेली-सी पड़ गयी हूँ। पहले तो स्कूल में फिर भी दिल लगा रहता था। चार लोगों में उठना, बैठना, दुख-सुख बँट जाते थे। अब घर में अकेलापन सालता रहता है। बच्चों की याद आती है छुपकर रो लेती हूँ। मगर ये जबसे रिटायर हुए हैं, इन्होंने एक नियम-सा बना लिया है- सुबह उठकर सैर को जाना, नहा धोकर पूजा पाठ करना, फिर नाश्ता कर के किसी ग़रीब बस्ती की ओर निकल जाना। वहाँ ग़रीब बच्चों को इक्ट्ठा कर के पढ़ाना और सब की तकलीफें सुनना, अगर किसी के काम आ सके तो आना। दोपहर को आराम करना फिर शाम को सैर, पूजा पाठ, ख़बरें सुनना, खाना खाकर टहलना और सो जाना। मगर मैं कुछ आलसी-सी हो गयी थी। मैं अभी अकेलेपन की ज़िन्दगी और बच्चों के मोह से अपने आपको एडजस्ट नहीं कर पा रही थी।

"क्या बात है, आज नाश्ता-पानी मिलेगा कि नहीं।" इनकी आवाज़ सुन कर मैं वर्तमान मे लौटी। पक्षी अभी भी चहचहा रहे थे। नाश्ता बनाकर इनके सामने रखा और खुद भी वहीं बैठ गयी।
"अपना नाश्ता नहीं लाई क्या आज, नाश्ता नहीं करना है?"
"कर लूँगी, अभी भूख नहीं।"
ये कुछ देर सोचते रहे फिर बोले-
"राधा, तुम सारा दिन घर में अकेली रहती हो- मेरे साथ चला करो। तुम्हारा समय भी पास हो जायेगा और लोक सेवा भी।"
"सोचूँगी। अपने बच्चों के लिये तो कुछ कर नहीं पाई, बेचारों को मेरी ज़रूरत थी। आखिर में कन्धे पर तो वो ही उठाकर ले जायेंगे।" मन का आक्रोश फूटने को था।
"मुझे किसी से उमीद नहीं। जो देखना है ज़िन्दा रहते ही देख लिया, मर कर कौन देखता है। बाक़ी कन्धे की बात तो जब मर ही गये तो कोई भी उठाये नहीं उठायेंगे तो जब पड़ौसियों को दुर्गन्ध आयेगी तो अपने आप उठायेंगे। मैं इन बातों में विश्वास नहीं करता।"


मेरी आँखें बरसने लगीं और मैं उठ कर अन्दर चली गयी। ये नाश्ता कर के अपने काम पर चले गये।
रात को जब खाना खाने बैठे तो बोले-
"राधा ऐसा करो तुम बेटे के पास हो आओ। मैं टिकट बुक करवा देता हूँ। तुम्हारा मन बहल जायेगा। मगर मैं नहीं जाऊँगा।"
"अकेली? मैं आपके बिना क्यों जाऊँ? नहीं नहीं।"
 "मैं मन से कह रहा हूँ। गुस्सा नही हूँ। बस मेरा मोह टूट चुका है और तुम अभी मोह त्याग नहीं पा रही हो। जानता हूँ वहाँ विदेशी बहु के पास भी अधिक दिन टिक नहीं पाओगी। इसलिये नहीं चाहता था कि तुम जाओ।"
"सोचूँगी।" कह कर मैं काम में लग गयी।
रात भर सोचती रही। इनकी बातें भी सही थीं। फिर क्या करूँ यही सोचते-सोचते नींद आ गयी। कुछ दिन इसी तरह निकल गये। मगर कुछ भी निर्णय नहीं ले पाई। कई बार इन्होंने पूछा भी मगर चुप रही।


उस दिन ये सुबह काम पर चले गये और मैं चाय का कप लेकर बरामदे में बैठ गयी। चिड़िया के बच्चे अब उड़ने लगे थे मगर दूर तक नहीं जाते। चिड़िया उनके पास रहती और चिड़ा अकेला दाना चुगने जाता था। कितना ख़ुश है ये परिवार फिर अपना ही क्यों बिखर गया। सोचते हुए आँख भर आयी। रात को ये खाना खा रहे थे-
"देखो राधा मैं मन से कह रहा हूँ तुम चली जाओ। मेरी चिन्ता मत करो। मैं कोई न कोई इन्तजाम कर लूँगा। न हुआ तो कुछ दिन की बात है मैं ढाबे में खा लूँगा। आज सोच कर मुझे बता देना कल टिकट बुक करवा दूँगा।"
मैं फिर कुछ न बोली। रात भर सोचती रही। सोच में चिड़िया का घोंसला आ जाता। चिड़िया कैसे घोंसले के पास बैठी रहती- देखते-देखते बच्चे फुदकने लगे हैं। चिड़िया उन्हें चोंच मारना, खाना और उडना सिखाती। धीरे-धीरे जब वो पँख फैलाते तो चिड़िया खुश होती। हम भी ऐसे ही उनको बढते-पढते देखकर खुश होते थे। अब मुझे लगता कि चिड़िया की खुशी मे एक पीड़ा भी थी। अब उड़ने लगे हैं। हमें छोड़कर चले जायेंगे।


आज वही पीड़ा सामने आ रही थी। आज मैंने देखा, चिड़ा चिड़िया और बच्चे इकट्ठे बैठे हुए हैं। चोंच से चोंच मिलाकर बात कर रहे हैं।
"चीं-चीं-चीं" चिड़िया चिड़े की आवाज़ में उदासी थी।
"चीं-चीं-चीं" मगर बच्चों की आवाज़ में जोश था और उसी जोश से वो उड़ गये दूर गगन में।


"चीं-चीं-चीं-- बच्चों हम इन्तजार करेंगे, लौट आना।" चिड़िया की आवाज़ रुँध गयी थी। दोनों उदास, सारा दिन कुछ नहीं खाया। मौसम बदल गया था। प्रवासी पक्षियों का आना भी सतलुज के किनारे होने लगा था। गोविन्द सागर झील के किनारों पर रौनक बढ गयी थी।
थोड़ी देर बाद चिड़ा चिड़िया की चोंच से चोंच मिला कर 'चीं-चीं-चीं' कर रहा था।
"चीं-चीं-चीं-- रानी ऐसा कब तक चलेगा? बच्चे कब तक हमसे चिपके रहते? आखिर हम भी तो ऐसे ही उड़ आये थे। उनका अपना संसार है। उन्हें भी हमारी तरह अपना घर बसाना है। जो सबके साथ होता है, वही अपने साथ हुआ है। चलो सतलुज के किनारे चलते हैं। दूर-दूर से हमारे भाई बहिन आये हैं। उनका दुख सुख सुनते हैं।" चिड़े ने प्यार से चिड़िया के परों को चोंच से सहलाया और दोनों सागर किनारे उड़ गये।


हाँ, ठीक ही बात है। सारा देश अपना है। लोग अपने हैं। बस सोचकर उन्हें प्यार से अपनाने की बात है।
मेरे भी आँसू निकल गये थे। पोंछकर सोचा कि यही संसार का नियम है तो फिर क्यों इतना मोह? आखिर कब तक बच्चे हमारे पल्लू से बन्धे रहेंगे। आजकल नौकरियाँ भी ऐसी हैं कहाँ-कहाँ उनके साथ भागते फिरेंगे? चिड़े-चिड़िया ने जीवन का सच सिखा दिया था। मुझे भी रिटायरमेन्ट के बाद जीने का रास्ता मिल गया था।


सुबह जब नाश्ता कर के बस्ती में जाने के लिये तैयार हुए तो मैं बोल पड़ी-
"मुझे भी अपने साथ ले चलें।"
"क्या सच?" इन्हें सहज ही विश्वास नहीं हुआ। इनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। इनकी आँखों में संतोष की झलक देखकर ख़ुशी-सी हुई। बच्चों के मोह में हम दोनों के बीच एक दूरी-सी आ गयी थी। आज उस दूरी को पाट कर हम दोनों एक हो गये थे।  मैं भी चिड़िया की तरह उड़ी जा रही थी इनके साथ अनन्त आकाश की ओर।


- निर्मला कपिला
 
रचनाकार परिचय
निर्मला कपिला

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