प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2015
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

“...आदमी के भीतर पल रहे आदमी का यही सच है!..... आदमी होने का सुख भी यही है।” (भाग -2)
प्रीति 'अज्ञात'- काव्य-सृजन के अलावा आपको और क्या प्रिय है? अपनी पसंदीदा रचना भी कहें !
ज्योति खरे- फुरसत के समय गजल और पुराने प्रेमगीत सुनता हूँ या पत्नी सुनीता के साथ पैदल निकल जाता हूँ। जीवन जीने की बातें करते वह मेरी कमियों को समझाती चलती है और मैं पान दबाये सुनता चलता हूँ।
 
'जिनि' मेरी सर्वप्रिय रचना रही है- 
स्नेह के आँगन में 
सूरज की किरण
रखती है जब अपना पहला कदम 
उस समय तक 
झड-पुछ जाता है समूचा घर 
फटकार दिये जाते हैं 
रात में बिछे चादर 
बदल दिये जाते हैं 
लिहाफ तकिये के
 
समझाती है 
साफ़ तकिये में 
सर रखकर सोने से  
सुखद सपने आते हैं 
 
फेंक देती है 
डस्टबिन में रखकर 
बीते हुये दिन की 
उर्जा नकारात्मक--
 
आईने के सामने खड़ी होकर
बालों में लगाती हुई रबरबेंड 
गुनगुनाती है 
जीवन का मनोहारी गीत------
 
तेज-चौकन्ना दिमाग रखती है 
नहीं देती पापा को 
चांवल और आलू 
जानती है इससे बढ़ती है 
शुगर 
टोकती है मम्मी को 
कि साफ़ करके पहनों चश्मा 
करीने से साड़ी पहनों 
अच्छे से हो तैयार  
बचाती है भैय्या को 
पापा की डांट से-------- 
 
रिश्तों को सहेजकर रखने का 
हुनर है उसके पास 
दूर-दूर तक के रिश्तेदारों की
बटोरकर रखे है जन्म तारीख
भूलती नहीं है 
शुभकामनायें देना--------
 
जागता है जब कभी 
पल रहा मन के भीतर का संकल्प
कि करना है कन्यादान
टूटने लगता है 
रिश्तों की बनावट का 
एक-एक तार--------
 
सूखी आंखों में 
समा जाती हैं बूंदें
इन बूंदों को 
नहीं देता टपकने 
क्या पता 
यह सुख की हैं या दुःख की---
 
ऐसे भावुक क्षणों में 
समा जाती है मुझमें 
उन दिनों की तरह
जब घंटों सीने पर लिटा 
सुलाता था---
 
जब से सयानी हुई है    
गहरी नींद में भी 
चौंक जाता हूं
जब आता है ख्याल  
कि कोई देख रहा है उसे 
बचाने लगता हूं 
बुरी नजर वालों से 
कि नजर न लगे 
बिटिया को----
 
प्रीति 'अज्ञात'- आज का युवा क्या अपने रास्ते से भटकता प्रतीत हो रहा है? इसके लिए दोषी कौन है? युवाओं में साहित्य के प्रति रुझान कितना आवश्यक है?
ज्योति खरे- युवा वर्ग आज के संदर्भ में सबसे ज्यादा चर्चित वर्ग है। यह वर्ग बुजुर्ग और किशोरों के बीच का वर्ग है. अगर पढ़ रहा है तो कालेज का छात्र, अगर नहीं पढ़ रहा है तो बेरोजगार युवा वर्ग की आयु का भी आंकलन लगाना मुश्किल है। युवा वर्ग की परिभाषा बताना भी मुश्किल है,युवा वर्ग वही है जो सम्पूर्ण आदमी नहीं है। आज का युवा वर्ग अपने आप में प्रश्न है,इस प्रश्न को सुलझाने का प्रयास करना भी असंभव है।
 
देश की गिरती साख, राजनीति की निम्नतम स्थिति,सेल्यूलाईड का क्रेज,फैशन का बढ़ता चलन,युवा वर्ग को सृजनशील बनाने की अपेक्षा उसकी मनःस्थिति को अधकचरा संस्कृति और आधुनिकवाद की तरफ ले जाने में सक्रिय है। युवा वर्ग पिस्टल,चाकू,तलवार,तेज़ाब से डरता नहीं है बल्कि चौबीसों पहर इनसे खेलता रहता है। यह फिल्मों से निकली संस्कृति को "फालो" करता है,फैशन के रंग में रंगना चाहता है और "बाईक" में बैठकर अपनी छोटी सी जिंदगी नापना चाहता है। आज का युवा विश्वविद्यालय कैम्पस में नारे लगाता है,हड़तालें करता है,युवा नेता बनना चाहता है। संजय दत्त स्टाईल बाल रखता है,फ़िल्मी कलाकार इसके आदर्श हैं,लड़कियों को छेड़ना इनके शौक में शुमार है,बलात्कार करना इनका "पैशन" है ,यह समाज के लिए समस्या बन गया है,अपने नैतिक स्तर से गिर ही नहीं रहा,सामाजिक स्तर से भी गिर गया है। यह शिक्षा पद्धति के दोषपूर्ण होने का परिणाम है.यह शिक्षा पद्धति ना तो पूरी तरह भारतीय और ना पूरी तरह पाश्चात्य. ठीक इसके विपरीत भारतीय सभ्यता और संस्कृति अपना बुनियादी मापदंड खोती जा रही है. समाज एकलवादी परंपरा में विश्वास रखने लगा है,लोग अपनों को ही खुशबूदार "स्प्रे" छिड़कते हैं। संस्कृति पलायनवादी पगडंडी पर चल पड़ी है। विश्वविद्यालय उच्चादर्शों और अत्याधुनिक प्रयोगात्मक विधियों से समाहित शिक्षा का प्रसार चला रहा है.फिर भी तीस प्रतिशत ही विद्यार्थी सही मायने में शिक्षा ग्रहण कर पाता है। बचे हुए सत्तर प्रतिशत का युवाओं का क्या होता है "यही वह बात है जहां आकर पूरी सामाजिक राजनैतिक और नैतिक अव्यवस्था मौन हो जाती है" यह अव्यवस्था ही वह मीठा जहर है जो युवाओं को मार रही है। प्रकृति प्रतिकूलता,जमाने का दोष, कलयुग का दौर, भाग्य का चक्र आदि कारण बता कर मन को समझाया ही जा सकता है. पर यह समाधान नहीं है युवा समस्या का। राजनीति,धनशक्ति युवाओं के मानस पटल पर भीतर तक घर कर गयी है जो भटकाव का कारण है। राजनीति के ग्लेमर में रहकर युवा अपने आप को "कलफ"किए हुए कुर्ते के समान दिखना पसंद करता है। पूंजीवादी मानसिकता को ओढ़ना चाहता है,पर जब "रहीस' और "नेता" बनने कि कोशिश चरमरा जाती है,तो वह अपराधिक प्रव्रत्ति का होने लगता है। अपने मानसिक विकास को सृजनात्मक दृष्टिकोण से नहीं देखता बल्कि वह अपने स्तर से गिरा पाता है। जनमानस भी इससे अछूता नहीं है,जनमानस भी इसका दोषी है।
 
जिस स्थिति के लिए समाज युवा वर्ग को दोषी ठहरता है, वही समाज अच्छी से अच्छी प्रतिभायें भी उत्पन्न करता है। आज का समाज आधुनिकवाद का शिकार हो गया है। ऐसे में वह एक साफसुथरी विचारधारा को क्या जन्म देगा, जिस समाज ने या इससे जुड़े थोड़े से ही लोगों ने किसी वैचारिक विचारधारा का अध्ययन,मनन किया है तो निःसंदेह ऐसे समाज से प्रतिभा संपन्न युवा सामने आए हैं, जिंन्होंने समाज,देश और शहर का नाम रौशन किया है। साफ सुथरे व्यक्तित्व का जन्म पैदाइशी नहीं होता,इसे बनाया जाता है,इसके बनने,संवरने की प्रक्रिया बड़ी जटिल है और जटिल है हमारा सृजनात्मक सोच से जुड़ना। युवा अपने आप में पूर्ण समर्थ है.इनमे अनंत सम्भावनायें हैं। इनका प्रतिभा संपन्न होना स्वयं और समाज पर निर्भर है.परिस्थितियों को दोषी ठहराना तर्कसंगत नहीं है,वास्तविक कारण ढूँढना, तथ्य की जड़ तक पहुंचना ही निष्कर्ष है। समकालीन दौर की सबसे चर्चित समस्या है युवाओं की स्थितियों को बदलना। इसकी आवश्यकता अब ज्यादा महसूस होने लगी है। अब युवाओं के भटकाव के मूल कारणों की तह तक पहुंचना पड़ेगा अन्यथा सूखते मुरझाये पेड़ को हार बनाने के लिए पत्ते सींचने और जड़ की उपेक्षा करने जैसी गलती होती रहेगी। 
साहित्य एक ऐसी परंपरा है जो अपने आप में एक विशेष स्थान रखती है,युवाओं का साहित्य से जुड़ना नितांत आवश्यक है.इससे स्वस्थ मानसिकता का जन्म होता है। नये-नये पहलुओं का अध्ययन होता है, बेबाकअपनी बात उजागर करने की क्षमता पैदा होती है. युवाओं को इस पारदर्शी विचारधारा से जोड़ने का काम पुरानी पीढ़ी ही कर सकती है. सामाजिक संस्थायें,संगीत विद्यालय, नाट्यसंघ, लेखक संघ इस दिशा में भी बहुत अच्छे प्रयास कर सकते हैं। नयी पीढ़ी को अब नये सिरे से, नये सृजनशील वातावरण में लाना ही पुरानी पीढ़ी का दायित्व होना चाहिए, नहीं तो युवा वर्ग अपनी मौत से पहले ही मर जायेगा। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- देश में हिन्दी साहित्य की दिशा और दशा दोनों ही बदल रहीं हैं. इस बदलाव से आप कितने संतुष्ट हैं? आजकल एक अच्छी पुस्तक का अच्छा होना ही काफी नहीं होता, 'मार्केटिंग' अब एक अहं हिस्सा बन चुका है ! पहले लेखक का कार्य लेखन-मात्र ही था पर अब उसे अपने 'प्रोडक्ट' को जनता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी ज्यादातर स्वयं ही उठानी पड़ती है ! क्या यह एक अतिरिक्त भार नहीं?
ज्योति खरे- हिंदी साहित्य के हालात ठीक हैं, अच्छा लिखा जा रहा है पर एक बात है कि पाठकों की रूचि उतनी नहीं है जैसे पहले हुआ करती थी। युवा वर्ग अंग्रेजी साहित्य की तरफ अपना ध्यान ज़्यादा रखता है। यही कारण है कि हिंदी पाठकों की संख्या में गिरावट आई है। हिंदी साहित्य में बेहतरीन कवितायें और कहानियाँ लिखी जा रहीं हैं, किताबे भी निकल रही हैं पर हिंदी किताबों के प्रकाशक किताबों की "मार्केटिंग" करने में अपनी रूचि नहीं दिखा पा रहें हैं। वहीँ अग्रेजी किताबों के प्रकाशक बेहतर "मार्केटिंग" करते हैं. आज के दौर में साहित्य "प्रोडक्ट" हो गया है और प्रोडक्ट को बेचने के लिए बेहतर विज्ञापन "पैकेजिंग" और "मार्केटिंग" की आवश्कता है। इसका असर हिंदी किताबों की बिक्री और पाठक पर तो पड़ रहा है,अगर लेखन की बात करें तो इसमें भी बहुत प्रयोग होने लगे हैं। चाहे कविता हो या कहानी,रचनाकार प्रयोग और पाठक को आकर्षित करने के चक्र में अपनी मूल अभिव्यक्ति को व्यक्त नहीं कर पा रहा है। यही कारण है कि हिंदी साहित्य की दिशा और दशा दोनों बदल रही है और इस बदलाव में हिंदी साहित्य को जूझना तो पड़ेगा। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- आधुनिक हिंदी कविता या अतुकांत कविता को कुछ लोग, 'कविता' मानना ही खारिज़ कर देते हैं, इस बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है? आपके लिहाज से एक अच्छी कविता की क्या विशेषता होनी चाहिए?
ज्योति खरे- कविता तो कविता होती है पर जब कविता किसी वाद या "फार्मेट" या खेमे में बटने लगती है तो वह कई भागों में विभक्त हो जाती है। कविता, आधुनिक कविता, समकालीन कविता, अतुकांत कविता, गीत, नवगीत, गीत लिखने वाले आधुनिक कविता को कविता नहीं मानते और आधुनिक कविता लिखने वाले गीत नवगीत को नहीं मानते। दो विचारधाराओं की लड़ाई में कविता पिस रही है और नया रचनाकार समझ नहीं पाता कि वह क्या लिखे? आज आधुनिक कविता सबसे ज्यादा लिखी जा रही है और इसके अपने पाठक भी हैं। जो खारिज कर रहें हैं, करते रहे कविता तो नदी की तरह बहती रहेगी। 
अच्छी कविता वो जो मन को छू ले और मन को मथ दे,सहज सरल हो। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- आप कई वर्षों से ब्लॉगिंग की दुनिया में हैं ! तब और अब में आप क्या अंतर देखते हैं ? ईमानदार पाठकों तक पहुँचने का क्या यह सही मार्ग है ? 
ज्योति खरे- ब्लॉग पहले की अपेक्षा अब बड़े कैनवास पर फलफूल रहा है। अब तो ब्लॉग बहुत सुंदर और आधुनिक टच के हैं। गूगल प्लस पर सीधा साझा हो जाता है जिससे पाठक को ब्लॉग में पहुचने में आसानी होने लगी है। ब्लॉग को पढने-लिखने वाले रचना और सृजन के प्रति बेहद ईमानदार होते हैं यही कारण है कि ब्लॉग का अपना विशेष महत्व है। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- सोशल मीडिया, यू-ट्यूब, ऑडियो और संचार के अन्य माध्यमों के जरिये लोगों तक अपनी बात पहुँचाना, क्या पुस्तक के मुकाबले ज्यादा आसान और सहज है ?
ज्योति खरे- संचार के साधन बढ़े हैं सोशल मीडिया नये-नये प्रयोग कर रहा है। किताबों के मुकाबले यह तेजी से लोगों तक पहुँच रहा है तो इससे जुड़ने में क्या हर्ज है! किताब का अपना एक महत्व है पर नये समय के साथ चलना तो पड़ेगा नहीं तो हम पीछे रह जायेंगे। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- हमारी पत्रिका 'हस्ताक्षर' के लिए कुछ कहना चाहेंगे?
ज्योति खरे- "हस्ताक्षर" का मतलब ही शिक्षा सृजन और संवेदना है। अभिव्यक्ति को जागरूक पाठकों और सृजनधर्मी तक पहुंचाने की यह सार्थक पहल है। वर्तमान समय में पुरानी और नयी पीढ़ी के रचनाकारों को जोड़ने की कड़ी में, आपका यह "हस्ताक्षर" अभियान सृजन के नये इतिहास को रचेगा, आपको साधुवाद। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- बहुत-बहुत आभार!
ज्योति खरे- आपका भी धन्यवाद!
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कार्यक्षेत्र -
 
1997 में प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा और ज्ञानरंजन के संयोजन में कटनी में राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित "स्मृति परसाई" का आयोजन (महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह)।
अखिल भारतीय किरण संगीत समारोह जिसमें देश के युवा कलाकारों को "कत्थक में नृत्य श्री "गायन में स्वरश्री” से सम्मानित किया जाता है और यह संस्था मध्य प्रदेश कला परिषद से मान्यता प्राप्त है, में 1994 से 2001 तक सचिव। इस दौरान रवींद्र जैन, ग़ुलाम मुस्तफ़ा, तीजनबाई, गुलाबो, उमा शर्मा का सम्मान और कार्यक्रम का आयोजन।
प्रगतिशील लेखक संघ कटनी इकाई के 2002 से 2005 तक अध्यक्ष पद पर कार्य। इस दौरान "मुंशी प्रेमचंद" पर महत्वपूर्ण आयोजन, कविता विमर्श, नुक्कड़ नाटकों का आयोजन
मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा भारत भवन में 2003 को आयोजित "पाठक मंच" कार्यशाला में सम्मलित।
पाठक मंच कटनी के संयोजक।
28 पुस्तकों की समीक्षा गोष्ठी का आयोजन और संचालन।
"लगातार" कविता फोल्डर का प्रकाशन।
लगभग एक दर्जन पुस्तकों की समीक्षा पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित।
 
प्रकाशन -
होना तो कुछ चाहिए (कविता संग्रह, प्रकाशक : ब्लू बक पब्लिकेशन्स)
बालार्क (साझा कविता-संग्रह)
भारत के लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में पिछले तीस वर्षों से कविताएँ एवं लेखों का प्रकाशन।
दूरदर्शन एवं आकाशवाणी में पिछले तीन दशकों से अनवरत प्रसारण।
 
सम्मान एवं पुरस्कार -
मध्य प्रदेश गौरव - 1995
प्रखर व्यंग्यकार सम्मान - 1998
रेल राजभाषा सम्मान - 1999
सरस्विता पुरस्कार - 2014
 

- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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