प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

सोनपरी की चिठ्ठी

(यह पत्र एक बेटी द्वारा लिखा गया है जो अलगाव के किनारे पर खड़े माता-पिता को मन की बात कहना चाहती हैं।)


प्रिय माँ और पापा,

मैं आपकी सोनपरी अभी तो मात्र आठ साल की हुई हूॅं। सही तरीके से बोलना, चलना, खाना व अपने मन की बात कहना भी नहीं आता है पर आज ही अपने नन्हे कानों से सुना है कि मुझे आप दोनों में से एक को चुनना है, नहीं चुनना शब्द सही नहीं हैं, किसी एक के साथ रहना होगा। हॅंसते या रोते, उस समय मैं जिसका पक्ष जाने-अनजाने, भावुकता या नादानी में लूंगी, वही मेरा भविष्य बनाएगा। मुझे अब यकीन है कि आप दोनों में से तब एक-दूसरे को गर्व या घृणा से देखेगा कि यह मुझे ज़्यादा प्यार करती है, दूसरा पक्ष निक्कमा और अयोग्य घोषित किया जाएगा। उसे जीवन भर के लिए मानसिक अशान्ति में डालने का प्रयत्न किया जाएगा, पर बताओ कोई मुझे, मैंने तो यूँ ही किसी एक का नाम ले लिया होगा।


आज इसीलिए मेरे दिमाग में कई प्रश्न घूम रहे हैं। मैं एक छोटी बच्ची, जानना चाहती हूँ जो माॅं-बाप (अलगाव) चाहते हैं, वो कभी अपने आपको हमारी जगह रखकर सोचते हैं शायद नहीं?
माँ आप मेरा दिल हैं और पापा दिमाग। मेरा पहला प्रश्न यही है कि क्या एक बच्चे की परवरिश के लिए ये दोनों ज़रूरी नहीं है। माँ मैं आपकी छवि की हू-ब-हू नकल बनना चाहती हूँ। कार्बन काॅपी, आपके बाल, बिन्दी, कपडे़, नेल पाॅलिश, मुस्कुराहट, गीत-संगीत को तो मैं इस दुनिया में आने से पहले से जानती हूँ। गर्भ में जब आप मुझे अपने और पापा की दुलारी, रानी, सोनपरी कहकर बुलाती थी। मेरे लिए बुने प्रत्येक सपने को साकार करने की योजनाएं, कठिन समय में भी मुझे संभालते आप दानों की बातें सब याद हैं। फिर आप दोनों इस बात को क्यों भूल गए।
अभी कल ही कहानी में दोस्तों की ग़लतियों को माफ करने की सीख दी थी तो यह सबक मात्र बच्चों के लिए है, बड़ों के लिए नहीं। मेरे लिए तो आप दोनों ही वो आईना हैं, जिसमें मेरा वर्तमान और भविष्य दोनों ही हैं।


पापा क्या मैं पूछ सकती हूँ कि जब मैं छोटी थी, बोल नहीं सकती थी। मूक, असहाय, कमज़ोर और  लाचार थी, मुझ नन्ही सोनपरी के रोने मात्र से माँ समझ जाती थी कि भूख प्यास या गीलापन क्या परेशान कर रहा है। आप मेरी नन्ही हथेलियों को अपने बडे़ खुरदरे हाथों में लेने से भी घबराते थे, शायद मेरी नरम त्वचा, मासूमियत आपको स्नेह से आंशकित करती होगी पर दोनों ने कितने यत्नों से बड़ा किया तो अब मेरी परछाई आप दोनो क्यों नहीं बन सकते। पापा वर्तमान में तो आप मेरे स्नान एवं दिनचर्या को सहजता से करते हैं पर जब मैं सात, आठ वर्ष की हो जाऊंगी तब भी क्या इतने ही निसंकोच भाव से आप सब कर पायेंगे। मेरी शर्म और आपकी शर्म को कौन समझेगा।

माँ मुझे कौन बताएगा कि कैसे उठना बैठना है, खडे़ होना है या सोना है। आप बड़ों की दुनिया में तो हम बेटियों के लिए देखे-अनदेखे नियम बनाए हैं। उसे सीधे, साफ, दृढ एवं बेलाग शब्दों में तो माँ ही सिखा सकती हैं। वह अनुभवी हैं। क्योंकि माँ तो बेटी और माँ दोनों हैं। यदि मैं पापा के साथ हूँ तो मेरे भीतर की तड़प को दूर रह कर देखकर जी पायेंगी सुकून से, क्योंकि वक्त कितना ही आधुनिक क्यों न हो जाए, एक बेटी अपने मन की परतें माँ के सामने ही निःसंकोच भाव से खोल सकती है।

पापा आप पुरूष हैं। आप जानते हैं कि यथार्थ में एक पुरूष की नज़र किसी भी लड़की को किस किस जगह एवं कैसे बेध सकती है। आपकी बेटी हूँ, पूजनीय हूॅं पर दूसरे तथा कथित किसी भी रिश्तेदार के लिए में मात्र लड़की हूँ। कुछ छद्म रिश्ते चाहे कितने ही मजबूत हों पर सामाजिक एवं व्यक्तिगत स्तर पर ओछे भी हो जाते हैं। (चाहे अपवाद स्वरूप ही) वह मुझे बताने की आवश्यकता नहीं हैं। माँ और पापा माफ करना पर जब कोई भी रिश्तेदार मुझ बेचारी को पीछे से आकर बांहों मे भरेगा या गालों पर प्यार भरा चुंबन देगा तो वो स्पर्श प्यार, स्नेह, तरस या वासना का होगा; इसे कैसे परिभाषित कर पाउंगी मैं?
मैं तो अलगाव की संतान उस समय मन ही मन खुश हो जाउंगी कि माँ/पापा के अलावा भी कोई मुझे लाड कर रहा है। पर उस नरक का अर्थ तो मुझे बड़े होकर पता चलेगा। क्या, माँ उसे समझाने के लिए रूकोगी नहीं! सोचो पापा, क्या मैं आपसे यह सब कह पाऊंगी! क्या आप मेरी आंखों में सब पढ़ पायेगें। आप विश्वास नहीं करेंगे कि सबसे विश्वसनीय ने पीठ पीछे छुरा मारा है। आज जिसे बुरी नज़र से बचाने के लिए काला टीका लगाते हैं, तब वह कालिमा उसके व्यक्तित्व एवं अन्तर आत्मा तक नहीं छाएगी क्या!


पापा, जब मैं नौ से बारह वर्ष की अवस्था में कदम रखूंगी। तब मेरे शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक वृद्दि को देख तो सकेंगे पर माँ की तरह समझेंगे नहीं क्योंकि हमारा रिश्ता पापा-बेटी का है। कुछ बातों के लिए माँ को बेटी और बेटी को माँ बनना पड़ता है। यह नैसर्गिक प्रकिया है। आप दोनों जानते हैं कि एक लड़का जब निकर बिना घूमता है तो सब हँसकर टाल देते हैं। पर एक छोटी लड़की की फ्रॉक थोड़ी-सी भी ऊपर हो जाती है तो सब की नज़रो में सख्ती आ  जाती है। मैं जानती हूँ आपको यह सब बातें बचकानी लग रही हैं। आप तो पढ़े लिखे आधुनिक संसार के प्रगतिशील लोग शायद पैसे, रुतबा, अधिकार, उपहार, किताबें या अच्छी एवं महँगी परवरिश के लिए नौकर या स्कूल सोचकर आज तो खुश हो लेगें पर कल शायद बहुत देर हो जाएगी। किसी एक का साथ का अर्थ होगा अधिक लाड या अधिक सख्ती से यकीनन मैं ज़िद्दी या कायर दोनों में से एक ही तो बनूँगी। दिल और दिमाग में से यदि बच्चे को एक ही साथ मिले तो नतीजा आप जानते हैं।

कभी सोचा थोड़ा बड़ा हो जाने पर, मुझे जब लोग आप दोनों के अलगाव की झूठी-सच्ची बाते सुनायेंगे। धीमी आवाज़ में बेचारी घोषित करेंगे तब आप में से कोई दूर बैठा अपनी दुनिया से मुझे विशेष तारीखों पर उपहार, तस्वीरें या खिलौने भेजकर इति श्री कर लेगा पर मेरे सवालों का जवाब कौन देगा! मुझे रिश्तों का ठहराव, गहराई, करूणा और समझ उधार में ही मिलेगी। आपकी सोनपरी तब सुन्दर बुद्विमान भिखारिन होगी। हाँ, एक ऐसी बेटी जिसके माँ-पापा भगवान ने नहीं पर दो व्यक्तियों के अहम, जिद, गुस्से और सांमजस्य न बिठा पाने के कारण छिन गए। क्या ज़िन्दगी कोई प्रोजेक्ट है या प्रयोग है, जिसमें बच्चे मात्र आहुति हैं?

अंत में, मैं सोनपरी उन सब बच्चों की ओर से जानना चाहती हूँ कि जिस बेटी को दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में पूजते रहें, उसे ही कठोर यथार्थ, नग्न , भयावह तथा कथित अति आधुनिक समाज में बिना बड़ा किए ही छोड देना चाहते हैं। हाँ, हमारी जैसी बेटियाँ चाहती हैं कि घर में इठलाती, घूमती, डरती, रोती-हँसती माँ और मजबुत हाथों में नाजुक हथेली पकडे़ पापा। जिन बेटियों को कंधे पर बिठा कर धूल मिटटी, कीड़े-मकोड़ों से बचाते चलते हो पापा और माँ आप भीड़ में सामान उठाए भी दूसरे कंधे पर मुझे लादे कई स्पर्शों से बचाने की कोशिश करती हैं पर कब तक। फिर एक दिन अलगाव की बाढ़ में या तो पिता का हाथ या माँ का सीना।

आप दोनों के लिए एक नई दुनिया, नया सफर, नई मंजिल, नई कठिनाईयाॅं पर सोनपरी की नज़रें तो अपने प्यारे माॅं और पापा को एक साथ तलाशेंगी। माॅं आप मेरे शरीर की आत्मा हो और पापा आप वो अदृश्य कवच, जिसके रहते काई कुदृष्टि मेरी ओर देखने का साहस नहीं कर सकती है। मैं तीन साल की सोनपरी धीरे-धीरे तीस साल की होना चाहती हूॅं। पलंग पर एक पैर माॅं के पेट पर और दूसरा हाथ पापा का काॅलर पकड़ कर सोना चाहती हूँ। मैं सिर्फ आप दोनों की लाड़ो बनी रहना चाहती हूॅं बूढ़ी होने तक।

क्या मेरे प्रश्नों से बड़ों को कुछ समझ आ रहा है या उसका भी कोई तर्क संगत उत्तर तैयार है! एकदम किताबी। जैसे कि अपना-अपना भविष्य, दुनिया में प्रगति, आधुनिक दुनिया की ख़ूबियां, नये जीवन की सोच, न झुकने का फैसला ही अटल है। हे बड़ो! बच्चा बन जाओ। मेरी ओर देखो। अलगाव बड़े चाहते हैं, बच्चे नहीं। काश बच्चों की कोई कोर्ट होती, जहाॅं वो अपने माता-पिता के अलगाव के खिलाफ अपील कर पाते। पर उसका वकील एवं जज एक ऐसा बच्चा होना चाहिए जो भुक्त भोगी हो।

यह आपकी सोनपरी कोमल है, छोटी है, नासमझ है पर आप दोनों के भीतर के द्वंद्व, दुख, परेशानी को देख रही है, बांटना चाहती है, पर कैसे! मुझे तो आपने पूछा ही नहीं?



स्नेह के साथ,
सोनपरी



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लघुकथा- समझ

राजेश और रजनी अन्तर्राष्टीय कम्पनी में कार्यरत उच्च अधिकारी हैं। श्रमशील, सहनशील और जीवन को योजनाबद्ध रूप से आगे बढाने वाले, अपनी सुझ-बूझ से कम आयु में भी अपने कार्यालय में एक स्थान बनाए हुए हैं। दोनों अपने शयनकक्ष में बैठे सोच रहे थे कि उनकी आरूषी नन्ही परी क्यों मुरझा रही है। आरूषी के कमरे में बचपन को सुखद बनाने वाली हर चीज थी- कार्टून, खिलौने, बैटरी चलित वाहन, बोलने वाली गुडिया, कोई कल्पना भी नहीं कर सके वो सब। कमरे की छत चाँद सितारों से अटी पड़ी थी। कपड़े, जूते, गहने, बैग पर नन्हीं जान के चेहरे पर बचपन वाली चमक नहीं थी।

राजेश को याद आता है कि इसकी उम्र में हम चार पाँच रोटियाँ, अचार के साथ यूँ ही खा जाते थे। माँ से छुपकर मलाई दही चट कर जाते थे। दोपहर को भी सोने का बहाना करके कच्चे अमरूद, इमली, बेर खाते थे। पर सब व्यर्थ दूसरी तरफ तारों जडे़ कमरे में बैठी आरूषी नन्हें हाथों को ठोड़ी पर टिकाए सोच रही थी कि आया माँ की पोती कितनी लक्की और हैप्पी है। वह अपनी दादी के पेट पर पैर रखकर उसके पास सोती है। ढेर सारी कहानियाँ उनसे सुनाती है। उन्हें छू कर गुदगुदी भी कर सकती है पर उसकी दादी तो दूर गाँव में रहती है। माँ-पापा कहते हैं कि गाँव जाने से आरूषी बीमार हो जाएगी। वहाँ गन्दगी है, सुविधाए नहीं हैं। पर उसे थ्री-डी एनिमेशन पर कार्टून देखना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है। पापा-मम्मी दोनों बुद्धु हैं। रियल-अनरियल में अन्तर भी नहीं समझते हैं। आरूषी की नन्हीं मासूम आँखों में दादी और आँसू थम जाते हैं। वह फिर भी मुस्कुरा रही है क्योंकि यदि माँ-पापा को उसके रोने का पता चलेगा तो वे बाज़ार से और खिलौने खरीद लाएँगे। नन्हीं उसी मुद्रा में मुस्कुरा दी।


- डॉ. नीना छिब्बर
 
रचनाकार परिचय
डॉ. नीना छिब्बर

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कथा-कुसुम (2)