प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- सबसे बड़ा ईनाम


यह चेतन के पिता विशाल का रोज़ का ही काम था। घंटों-घंटों मोबाइल में व्यस्त रहना। दफ्तर तो दफ्तर, घर में भी यही रुटीन थी। कोई विशाल को मोबाइल पर बात करने से रोकता तो वह उस पर खूब गुस्सा होता। एक बार तो विशाल ने मोबाइल सुनने से रोकने के लिए चेतन की माॅं पर हाथ तक उठा लिया था। इसलिए कोई विशाल को अब मोबाइल न सुनने के लिए नहीं टोकता था।

दसवीं में पढ़ने वाला चेतन अब बड़ा हो रहा था। वह बार-बार इसी बात से चिढ़ता रहता कि पापा हमारे साथ कभी बात करने का समय भी नहीं निकालते। यदि पापा को कभी अपने स्कूल की कोई बात, अपने दोस्तों के बारे में या अपनी कोई खुशी-परेशानी या फिर कोई अन्य बात बतानी हो और पापा से कोई राय लेनी हो तो कैसे लें? उन्हे तो जैसे अपने परिवार से बात करने का समय ही नहीं था।

चेतन उदास होते हुए आज फिर बोला, "मम्मी! आॅफिस की बातें तो ठीक लेकिन यह हमेशा जो दोस्तों के साथ हर छोटी-छोटी बात पर लम्बी-लम्बी काॅल, आखिर यह क्यों? हमारे साथ तो पापा कभी इतनी देर तक बात नहीं करते। कभी बात शुरू हो भी जाए तो फिर मोबाइल बज उठता है और पापा उसमें ही मस्त हो जाते हैं। मम्मी अपनी बात हम कब पापा के सामने रख पाएंगे?"
"अभी तुम जाओ बेटा। मैं पापा से इस बारे में बात करूँगी।" मम्मी चेतन को विश्वास दिलाती हुई बोली।
"मम्मी ज़रूर बात करना।" चेतन एक उम्मीद लिए अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।


कुछ दिन बीत गए लेकिन पापा की आदत जस की तस थी। उनमें ज़रा भी बदलाव नहीं आया था। आज जब चेतन स्कूल से घर पहुंचा तो उसने देखा पापा आज जल्दी घर आ गए थे और मोबाइल पर ही व्यस्त थे।
स्कूल बैग रखते ही उसने मम्मी से पूछा, "मम्मी क्या आपने मोबाइल वाली बात पापा से उस दिन की थी?"
"हाॅं बेटा, की थी।"
"लेकिन पापा की आदत में तो ज़रा भी बदलाव नहीं है मम्मी।" हल्की-सी चुप्पी के बाद चेतन फिर बोला, "कभी अपनी खुशी उनसे शेयर करनी हो तो कैसे करें ?" चेतन निराश होता हुआ बोला।
"कैसी खुशी बेटा?"
"पापा जब साथ होंगें तभी बताउंगा।" चेतन ज़िद करते हुआ बोला।
"बेटा, उस दिन तेरे पापा मान गए थे। पर पता नहीं क्यों? ये फिर शुरु हो जाते हैं। मेरी समझ में कुछ नहीं आता। इनकी यह बेकार की आदत अब हमारे लिए भी परेशानी का कारण बन गई है। मेरे तो कान पक जाते हैं इनकी मित्रों के साथ इनकी बातें सुनते-सुनते। पर बेटा, जाने दो यदि तेरे पापा नहीं मानते हैं तो। हमें भी यह आदत अब डाल लेनी चाहिए।" माॅं चेतन को समझाते हुए उदास मन से बोली और चेतन को अपने कमरे में जाकर स्कूल ड्रेस बदलने के लिए बोलकर पापा को चाय और चेतन को खाना परोसने के लिए किचन की तरफ मुड़ गई।


विशाल का व्यवहार बहुत ही रूखा-सा था। इसलिए चेतन की आज तक अपने पापा से कभी खुलकर बात करने की हिम्मत ही नहीं हुई। चेतन अपने कमरे में पहुॅंच चुका था। चेतन को कमरे में पहुंचे अभी कुछ ही समय बीता था कि उसे किचन से माॅं के चीखने की आवाज सुनाई दी। चेतन भागता हुआ किचन में पहुंचा तो उसने देखा कि बर्तन की सारी उबलती चाय बर्तन समेत माॅं के पेट के ऊपर गिर चुकी थी। माॅं किचन के फर्श पर ही फिसली पड़ी थी। माॅं दर्द से चीख रही थी। चेतन ने फटाफट ठण्डे पानी का बर्तन भरकर माॅं के पास रख दिया और माॅं को इस पानी को अपने जले हुए हिस्से पर फैंकते रहने के लिए बोलकर फटाफट पापा को बुलाने के लिए दूसरे कमरे की ओर भागा।

जैसे ही वह कमरे में पहुंचा तो उसने देखा पापा अभी भी मोबाइल पर ही व्यस्त थे। वे किसी दोस्त के साथ पिछले महीने की पिकनिक की बातों में मस्त थे। उन्हें अपनी पत्नी की इतने ज़ोर की चीखने की आवाज़ भी सुनाई नहीं दी थी।
चेतन ने पापा का हाथ पकड़कर उन्हें किचन की ओर चलने के लिए कहा और उन्हें पूरी बात को बताने की कोशिश भी की। लेकिन विशाल तो अपने मित्र के साथ बातों में इस कदर व्यस्त था कि उसे चेतन की कोई भी बात जैसे सुनाई ही नहीं दे रही थी। विशाल मोबाइल पर बातें करता हुए चेतन को कमरे से बाहर निकलने का इशारा करता रहा।


चेतन को अपने पापा पर खूब गुस्सा आ रहा था। वह इस बार गुस्से में खूब ज़ोर से चिल्लाया, "पापा! कभी इस मोबाइल को बंद भी कर दिया करो!"
चेतन के ज़ोर से ही चिल्लाने की देरी थी कि विशाल ने दो तमाचे चेतन के गालों पर दे मारे और अपने मित्र को बाद में बात करने को कहकर मोबाइल काट दिया और खूब गुस्से में चेतन पर चिल्लाए, "बदतमीज़, तुझे पता नहीं, जब कोई बात कर रहा हो तो बीच में नहीं बालते। क्यों चिल्ला रहे थे?"
चेतन रोते हुए बोला, "पापा, मम्मी के ऊपर सारी गर्म-गर्म चाय गिर गई है। मम्मी तकलीफ में है। मैं बस यही आपको बार-बार बताने की कोशिश कर रहा था।"
यह बात सुनते ही विशाल का सारा गुस्सा एकदम से छू-मंतर हो गया। वह चेतन को हाथ से पकड़े किचन की ओर दौड़ पड़ा। माॅं ने अभी तक अपने आप को थोड़ा संभाल लिया था। वह किचन से निकलकर बाहर ड्राइंगरूम के पंखे के नीचे लेटी थी। विशाल अपने कमरे से फटाफट बरनौल लेकर आया और पत्नी के पेट पर जले हुए हिस्से पर मल दिया।


बरनौल से माॅं को कुछ राहत मिल रही थी। माॅं विशाल से बोली, "तुम बस मोबाइल पर ही व्यस्त रहा करो। अगर आज चेतन यहाँ नहीं होता तो मेरी परेशानी और ज्यादा बढ़ जाती। बेचारा कब से कह रहा था- मम्मी पापा मोबाइल से कब फ्री होंगे, उन्हें एक खुशखबरी सुनानी है।
"कैसी खुशखबरी?" उत्सुकतावश विशाल ने पूछा।
"यह तो इसने मुझे भी नहीं बताया है। कह रहा था पापा जब साथ होंगें तब बताऊंगा।"
"बताओ बेटा चेतन। कौन-सी खुशखबरी है वह? मुझे भी तो पता चले बेटा।" विशाल ने प्यार से कहा।
पापा के इतने प्यार से बात करने पर चेतन के चेहरे पर खुशी की फुहार लौट आई थी। चेहरे पर मुस्कान लिए वह एकदम बोला, "आज स्कूल में सरप्राइज पेंटिंग कम्पीटिशन हुआ, जिसमें मेरी बनाई पेंटिंग को पूरे स्कूल में पहला स्थान मिला है और एक ट्राॅफी भी।"
"अरे वाह, यह तो बहुत ही खुशी की बात है। खूब-खूब बधाई बेटा।" विशाल खुश होते हुए बोला।
"थैंक यू पापा।" पापा की बधाई पर चेतन के चेहरे की रौनक देखने लायक थी।


कुछ क्षण की चुप्पी के बाद विशाल बोला, "बेटा, आज एक खुशखबरी मैं भी तुम्हें देना चाहता हूॅं।"
"कौन-सी खुशखबरी पापा? बताओ न!" चेतन उत्सुकतावश बोला।
"बात यह है बेटा कि मैं आज से मोबाइल पर फिजूल की बातें बंद करने की पूरी कोशिश करूँगा और अपने परिवार के संग ज्यादा से ज्यादा समय बिताउंगा। आज की घटना ने मुझे मेरी गलती का अहसास करवा दिया है। और चेतन बेटा, तुम पापा को माफ कर देना। तुम्हें मैंने बिना बात के ही मारा।"
पापा की सारी बात सुनकर चेतन और माॅं की खुशी का ठिकाना न था। चेतन खुशी में झूमता हुआ अपने पापा के सीने के साथ लगते हुए चिल्लाया, "थैंक यू पापा। आज यह बात कहकर आपनेे हमें सबसे बड़ा इनाम दे दिया है। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।"


- पवन चौहान
 
रचनाकार परिचय
पवन चौहान

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