प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

शायरी की कैफ़ियत बताती कैफ़ी की अज़ीम शायरी- अख़तर अली


अगर आपकी शायरी में रत्ती भर भी दिलचस्पी होगी तो आपने कैफ़ी आज़मी का नाम सुना होगा। अगर आप ने कैफ़ी का नाम नहीं सुना तो आपको यह कहने का ज़रा भी हक नहीं कि आप शायरी में दिलचस्पी रखते हैं। अगर आपने कैफ़ी आज़मी का नाम सुना है लेकिन आपको यह नहीं मालूम कि वे एक शायर भी हैं तो माफ़ कीजिएगा, आपकी जानकारी भरोसे के लायक नहीं है। आप अपनी मालूमात दुरुस्त कीजिये। मैं आपसे सिर्फ नाराज़ नहीं हो जाऊँगा बल्कि ताउम्र की दूरी बना लूँगा। अगर आप ये कहें की वही कैफ़ी जो शबाना आज़मी के वालिद हैं। कैफ़ी आज़मी की यह पहचान ना-क़ाबिले बर्दाश्त है। पहचानना है तो शबाना को कैफ़ी आज़मी की बेटी के नाम से पहचानो।

कैफ़ी आज़मी की शायरी में स्वाद के कई फ्लेवर मौजूद हैं। इश्क-मोहब्बत की शायरी भी है, प्रतिरोध की शायरी भी है, फ़िल्मी गीत भी इनकी शायरी का अहम हिस्सा है। प्रगतिशील लेखक संघ में भी रहे, इप्टा में भी ज़िम्मेदारी सम्भाली, कम्युनिस्ट पार्टी से भी वाबस्ता रहे, हर जगह काम करने का यही मकसद रहा कि दुनिया को बेहतर दुनिया बनाना है, इन्सान को इन्सान का रुतबा दिलाना है, ज़ुल्मो-सितम के ख़िलाफ़ खड़े हो जाने का नाम है कैफ़ी आज़मी। कैफ़ी आज़मी की शायरी का मकसद समझ आ जायेगा, जब उनकी यह नज़्म पढ़ी जायेगी-

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी।


कैफ़ी आज़मी की शायरी इत्मीनान माँगती है, अल्पविराम माँगती है, ठहर-ठहर कर बढ़ना माँगती है। अगर आप इसे वक़्त देंगे तो ये आपको असर देगी। इसके अल्फ़ाज़ों में जो जादू निहां है, वो आपको इनकी बज़्म से उठने न देगा। मेहनतकशों के लिए कैफ़ी साहब ने बक़ायदा आन्दोलन किया है। वे इनके लिए कितने फिक्रमंद थे, उनके हक़ के लिए उनके अपनाए तेवर का यह अंदाज़ देखिये-

मुझको देखो के मैं वही तो हूँ
कुछ मशीनें बनाई जब मैंने
उन मशीनों के मालिकों ने मुझे
बे-झिझक उनमें ऐसे झोंक दिया
जैसे मैं कुछ नहीं हूँ, ईंधन हूँ।


कैफ़ी आज़मी जैसे शायरों को पढ़ने के वक़्त हमको यह ख़याल भी रखना होगा कि शायर ने अदब को कितना वक़्त दिया और हम उसको पढ़ने में उसे कितना वक़्त दे रहे हैं? वह हम तक कितना आया- हम उस तक कितना बढ़ रहे हैं? उसने रौशन ख़यालात को शायरी में कितना फैलाया, हम उसको कितना समेट रहे हैं? शेरो-सुख़न के समन्दर में हम साहिल पर खड़े होकर नज़ारा देख रहे हैं या समन्दर में उतर कर भीग रहे हैं? हम उस शायर के कितने करीब पहुँचे, जो हमारे इतने क़रीब आ गया कि कह रहा है-

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो

आँखों में नमी हँसी लबों पर
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो


कैफ़ी आज़मी की शायरी नाराज़गी की शायरी है, तड़प की शायरी है, सवालों की शायरी है, जवाब माँगती शायरी है, बेचैनी की शायरी है। ज़रा तसव्वुर कीजिये, लिखने के पहले शायर कितना ग़मज़दा होगा, कितना परेशां होगा, हालात से कितना ना-उम्मीद हुआ होगा कि अपना दर्द यूँ बयां किया-

कोई ये कैसे बताये कि वो तन्हा क्यों है
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों है
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है
यही होता है तो आख़िर यही होता क्यों है?
एक ज़रा हाथ बढ़ा दे तो पकड़ ले दामन
उसके होठों में समा जाये हमारी धड़कन
इतनी कुर्बत है तो फिर फ़ासला इतना क्यों है?
तुम मसर्रत का कहो या इसे प्यार का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है?


कैफ़ी आज़मी की शायरी का कोई भी अध्याय उठा लिया जाये, वह इश्क-मोहब्बत की शायरी हो या जुदाई की, देशभक्ति की रचनाएँ हो या फ़िल्मी गीत या फिर जनवादी नज़्म, कैफ़ी साहब ने चंद लफ़्ज़ों में ऐसा ख़ाका खींचा है कि वह शायर की बात नहीं बल्कि पढ़ने-सुनने वाले को अपनी ख़ुद की आप-बीती लगने लगती है। आगे और बात करने के पहले कैफ़ी आज़मी की शायरी का थोड़ा मुआयना कर लिया जाये-

ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाँहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू
शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जादू, सियाह गेसू
नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू
तमाम शोखी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू
हज़ारों जादू जगा रही हो
ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो



हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा
ज़हर चुप कर के दवा जान के खाया होगा
बेमहल छेड़ पे जज़्बात उबल आये होंगे
ग़म पशेमां तबस्सुम में ढल आये होंगे
नाम पर मेरे जब आंसू निकल आये होंगे
सर न काँधे से सहेली के उठाया होगा
हो के मजबूर.......
रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या है
दिल ही शोला है तो ये सोज़-ए-मोहब्बत क्या है
वो मुझे भूल गई इसकी शिकायत क्या है
रंज तो ये है के रो-रो के भुलाया होगा
हो के मजबूर .......



कभी जमूद कभी सिर्फ इन्तिशार-सा है
जहां को अपनी तबाही का इन्तिज़ार-सा है
तमाम जिस्म हैं बेदार, फ़िक्र खाबीदा
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार-सा है
कोई तो सूद चुकाए, कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंकलाब का जो आज तक उधार-सा है



वो कभी धूप कभी छाँव लगे
मुझे क्या-क्या न मेरा गाँव लगे
एक रोटी के तअक्कुब में चला हूँ इतना
कि मेरा पाँव किसी और ही का पाँव लगे
रोटी-रोज़ी की तलब जिसको कुचल देती है
उसकी ललकार भी एक सहमी हुई म्याँव लगे



राम वनवास से जब लौटकर घर में आये
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये
रक्से-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा
छह दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहाँ से मेरे घर आये
धर्म क्या उनका, क्या ज़ात जानता कौन
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा, लोग जो घर में आये
शाकाहारी है मेरे दोस्त, तुम्हारे खंजर
तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की ख़ता, ज़ख्म जो सर में आये
पाँव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे
कि नज़र आये वहाँ खून के गहरे धब्बे
पाँव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुई अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फ़िज़ा आई नहीं रास मुझे
छह दिसम्बर को मिला दूसरा वनवास मुझे


कैफ़ी आज़मी की शायरी के स्तर को समझने में बहुत कारगर उनके लिखे फ़िल्मी गीत होंगे, जो इस बात का सबूत हैं कि उन्होंने वहाँ भी साहित्य के स्तर को बनाये रखा। ज़रा आप यू-ट्यूब पर इन गानों को सुनिये तो सही-

झूम झूम ढलती रात (फिल्म- कोहरा)
ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं (फिल्म- हीर रांझा)
चलते-चलते यूँ ही कोई मिल गया था (फिल्म- पाकीज़ा)
तुम जो मिल गए हो तो ये लगता है (हँसते ज़ख्म)
वक़्त ने किया क्या हंसीं सितम (फिल्म- काग़ज़ के फूल)
धीरे-धीरे मचल ऐ दिले-बेकरार कोई आता है
बहारो मेरा जीवन भी संवारो (फिल्म- आख़िरी ख़त)
जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम (फिल्म- शोला और शबनम)
मिले न फूल तो काँटो से दोस्ती कर ली (फिल्म- आख़िरी रात)
धड़कते दिल की तमन्ना हो (फिल्म- शमा)
आका सलीम चिश्ती मौला सलीम चिश्ती (फिल्म- गरम हवा)


कैफ़ी आज़मी की शायरी इतनी दबंग शायरी है कि इसको पढ़ने से हमारा डर काफ़ूर हो जाता है। ये हमें हमारी हैसियत बताती है। ताकत और हिम्मत से लबरेज़ शायरी के शायर हैं कैफ़ी आज़मी। ज़िन्दगी के खेल में कैफ़ी रेफरी की भूमिका में हैं। कैफ़ी आज़मी की शायरी में ख़ामोशी है लेकिन इस ख़ामोशी की धूम ज़बरदस्त है। यही वजह है कि अपने ज़िम्मेदाराना कलाम की वजह से कैफ़ी साहब आदरणीय और फिर प्रातः स्मरणीय होते चले जाते हैं। कैफ़ी आज़मी की शायरी अदब की वह पूंजी है, जो हमें कभी ग़रीब नहीं होने देगी।

यूँ तो 10 मई 2002 को कैफ़ी आज़मी इस दुनिया-ए-फ़ानी से हमेशा हमेशा के लिए रुख़सत हो गये लेकिन अपनी नज़्मों, ग़ज़लों और गीतों में आज भी ज़िन्दा हैं। आख़िर में फिल्म हक़ीक़त का वह गीत गा लिया जाये, जिसके एक-एक लफ़्ज़ में कैफ़ी साहब ने इतना जोश, इतनी उमंग, इतनी देशभक्ति भर दी है कि अगर ये गीत सुन लो तो पूरे जिस्म में सरसराहट हो जाती है। वह अमर गीत है-

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियों
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई
फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया
कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया
मरते-मरते रहा बाँकपन साथियों
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों

ज़िन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने की रुत रोज़ आती नहीं
हुस्न और इश्क दोनों को रुसवा करे
वह जवानी जो खूं में नहाती नहीं
आज धरती बनी है दुल्हन साथियों
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों

खींच दो अपने खूं से ज़मीं पर लकीर
इस तरफ़ आने पाए न रावण कोई
तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे
छू न पाए सीता का दामन कोई
राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियों
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों


- अख़तर अली
 
रचनाकार परिचय
अख़तर अली

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