प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

धर्म और संगीत का अन्तर्सम्बन्ध- डॉ. हितु मिश्रा


भारतीय समाज में धार्मिक भावनाओं की तहें चिरकाल से जमी हुई हैं। उनके हृदय में वेद, पुराण, गीता, रामायण आदि धर्मशास्त्र तथा देवी-देवताओं की पूजा का भाव भी विरासत में विराजमान है। यहाँ अनेक ठीहों, पत्थरों (लिंग), कब्रों आदि की पूजा की जाती रही है। उनमें अदृश्य शक्ति विराजमान मानी जाती है। प्रत्येक साधारण व्यक्ति मनौतियों व मान्यताओं को पूरा करने के लिए अपने-अपने इष्ट देवी-देवताओं की पूजा करता है।
आध्यात्मिक शान्ति से सामाजिक व्यवस्थाओं में स्थिरता आती है। भारतीय संगीत नादब्रह्म की उपाधि से सुशोभित है। उस त्रिमुखी विधा में चाहे वह गायन हो अथवा नृत्य हो, आध्यात्मिक तत्व सभी में व्याप्त है। संगीत की साधना ही इनका आत्मधर्म है। इनमें साधक या संगीतज्ञ भक्ति के भिन्न-भिन्न अवयवों के माध्यम से परमात्मा से सम्बन्ध एवं आध्यात्मिकता का अनुभव करते हैं। यही कारण है कि सदैव से ही संगीत के सात स्वरों द्वारा ही ईश्वर भक्ति सिद्ध होती आयी है।1


भारत के विभिन्न धर्मों में संगीत का रूप:
भारत की संस्कृति विभिन्न संस्कृतियों के मिश्रण से बनी है। समय-समय पर भारत में आये विदेशियों की संस्कृति का प्रभाव भारत पर और भारत की संस्कृति का उन पर पड़ा। परिणामतः एक मिश्रित संस्कृति का जन्म हुआ। भारत को मूलतः आर्यों का देश कहा जाता है। हिन्दू धर्म इसका मूल धर्म है।
मध्यकाल में हुए आन्दोलन के परिणामस्वरूप विभिन्न धर्मों का उदय हुआ। ये धर्म हिन्दू धर्म के आश्रय से ही आगे बढ़े और उसी के अनुसार विभिन्न साधनों के द्वारा अपने-अपने धर्म का प्रचार-प्रसार किया। इन साधनों में प्रमुख साहित्य और संगीत थे, जिसके आधार पर इन्होंने भारत में अपने धर्म के विकास में संगीत का स्थान सर्वोपरि माना है।
चाहे कोई भी धर्म हो, कोई भी मज़हब या बोली हो, संगीत की भाषा वही सात स्वरों की होती है। सभी मनुष्यों की भाव-अनुभवों की जैसे एक ही सार्वभौम अभिव्यक्ति होती है। संगीत भी उसी प्रकार सार्वभौम अभिव्यक्ति का माध्यम है।2


मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर या गुरुद्वारा सभी देव स्थलों पर संगीत की परम्पराएँ विकसित एवं पल्लवित होकर आज भी जीवित हैं।
अध्यात्म संगीत की आत्मा है। कोई धर्म विशेष नहीं बल्कि वो हमें आत्मा के अनुशासन में रहना सिखाता है। और जहाँ हमारे गायन में आत्मा का स्वर मिल जाता है तो वहाँ ईश्वर स्वयं खिंचे चले आते हैं।
प्रख्यात् वैज्ञानिक आईंस्टाइन ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा है कि नाद का कम्पन जब लहरों में परिवर्तित होता है तो उससे प्रकाश प्राप्त होता है। इसके अनुसार जहाँ नाद है, वहाँ प्रकाश है3 और जहाँ प्रकाश है वहाँ ईश्वर है।


मनुष्य किसी भी धर्म से जुड़ा हो। मीरा की भक्ति में कृष्ण की पुकार हो या अल्लाह के लिए अजान, बाइबल का कैरल संगीत हो या गुरुद्वारे का सबद गायन। इन सबमें कोई अन्तर नहीं, सभी का उद्देश्य एक ही है- संगीत से परमात्मा की प्राप्ति।
संगीत चाहे शास्त्रीय हो या उपशास्त्रीय या सुगम अथवा लौकिक, वह अपने आप में इतना प्रभावशाली है। इसके अतिरिक्त चेतना का कोई और स्वरूप हो ही नहीं सकता।
भारतीय संस्कृति का मूल हिन्दू धर्म है। मध्यकाल के भक्ति आन्दोलन के परिणामस्वरूप अनेकानेक अन्य संस्कृतियों और धार्मिक मान्यताओं का उदय हुआ। ये सभी धर्म हिन्दू धर्म के ही आश्रय से आगे बढ़े और उसी के आधार पर अपने-अपने धर्मों का प्रचार-प्रसार करने लगे।


विभिन्न धर्मों में संगीत के द्वारा धार्मिक भावना का विकास

सनातन हिन्दू धर्म में संगीत
हिन्दू धर्म का मूल आधार सनातन धर्म है। प्रारंभ से ही हिन्दू धर्म में दो मार्गों द्वारा ईश्वर की आराधना की जाती है- 1. सगुण भक्ति मार्ग और 2. निर्गुण भक्ति मार्ग

1. सगुण भक्ति मार्ग
ईश्वर के साकार रूप की आराधना या पूजा-अर्चना करना सगुण आराधना कहलाती है। राग रामकली परआधारित भजन में भगवान श्रीकृष्ण अपनी माता जी से कहते हैं-

मैया कबहूँ बढ़ेगी चोटी
किती बार मोहि दूध पिबत भई, यह अजहू ही छोटी।।4

इस प्रकार अनेकानेक कवियों तथा मीराबाई के ‘गीतगोविन्द’ में भी कृष्ण भक्ति के पदों को रागबद्ध कर इस परम्परा को विकसित किया है।



2. निर्गुण भक्ति मार्ग
इस सम्प्रदाय में ईश्वर को सर्वत्र विद्यमान और निरन्तर मानकर उसकी आराधना की जाती है। जैसे राग बागेश्री में भजन-

बीत गये दिन भजन बिना रे
बाल अवस्था खेल गवायो, जब योवन तब मान घनारे।।

इस प्रकार कबीर की भाँति अनेकानेक भक्त कवियों व संगीतकारों ने निर्गुण भक्ति की और ईश्वर के निराकार रूप की अपने गीत-संगीत के माध्यम से उपासना की।

वृन्दावन में संकीर्तन की दृष्टि से ही गोस्वामी विट्ठलनाथ ने आठ भक्त कवियों पर अपने आशीर्वाद की छाप लगाकर अष्टछाप का नाम दिया। अष्टछाप के कवि आठ प्रहर की संगीतमयी सेवा किया करते थे।

 

मुस्लिम धर्म का सूफी संगीत
मुस्लिम भक्ति समुदाय सूफी समुदाय कहलाया। इस धर्म में भी ईश्वर के निराकार रूप को माना गया। सूफीवाद में ईश्वर से निकटता प्राप्त करने का मार्ग ढूँढ़ना या प्राप्त करना ही इस धर्म की विशेषता है। सूफी संगीत के पदों में ईश्वर को अपना प्रियतम और स्वयं मानव को प्रेम करने वाला माना गया। इब्ने अरबी के शब्दों में कोई धर्म इतना अच्छा नहीं जितना प्रेम से पूर्ण धर्म, “सारी कायनात (संसार) इस बात को मानती है।” अतः संगीत के द्वारा परमात्मा से प्रेम की प्यास दर्शाने वाले पदों व गीतों के दर्शन सूफी संगीत में मिलते हैं। इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान अमीर खुसरो का है। इनके अरिक्त मोहम्मद शाह रंगीले, शेख बुरहाउद्दीन, फिरोज खाँ आदि ने सांगीतिक योगदान दिया।

बौद्ध धर्म में संगीत
बौद्ध धर्म, जिसने सारे संसार को क्षणिक तथा संगीत को सैद्धान्तिक दृष्टि से हीन माना था, वह भी उसके प्रभाव व प्रयोग से अछूता न रह सका। प्रसिद्ध दार्शनिक अश्वघोष ने बुद्ध का संदेश संगीत के द्वारा ही बहुजन समाज तक पहुँचाया वे गायकों की टोली बनाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते थे तथा गीत व वाद्ययन्त्रों के सहारे बौद्ध तत्व ज्ञान का प्रसार करते थे।

जैन धर्म में संगीत
जैन धर्मावलम्बियों में भी मांगलिक अवसर पर गायन-वादन का आयोजन किया जाता है। आज भी जैन मंदिरों में संगीतात्मक स्तोत्र व पूजा में संगीत का प्रचुर मात्रा में प्रयोग होता है तथा आध्यात्मिक स्वरूप को आधार मानकर ही भक्तिपरक रचनाएँ संगीतमयी की गयी हैं।

सिख धर्म में संगीत
‘गुरुग्रंथसाहिब’ धार्मिक, दार्शनिक एवं सामाजिक मान्यताओं के साथ-साथ सांगीतिक नियमों एवं परम्पराओं को व्यक्त करने वाला ग्रंथ है। गुरुओं के मतानुसार वाणी का रागबद्ध गायन मन को अधिक प्रभावित करता है। उन्होंने सृष्टि के समस्त जीवों को परमात्मा के एक सूत्र में पिरोने के लिए संगीत का प्रयोग करने का निर्देश दिया है।5
गुरु अर्जुन देव जी ने कहा है कि संगीतमयी कीर्तन करने से ही हम ईश्वर की निकटता प्राप्त कर सकते हैं।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारत के विभिन्न धर्मों में संगीत का स्थान सर्वोपरि माना गया है। सभी धर्मों में परमात्मा की प्राप्ति का साधारण मार्ग संगीत ही है। उस परम सत्ता को हम ईश्वर कहें, अल्लाह कहें, जीसस या वाहे गुरु, सभी में उसे पुकारने में प्रयुक्त होने वाले हमारे संगीत के सात स्वर ही हैं, जो कभी भेदभाव नहीं करते। वही सात स्वर अपनी विविधता के संसार में सम्पूर्ण विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का संदेश देते हैं।

 

 

 


संदर्भ सूची-
1. डॉ. सुनीता शर्मा, भारतीय संगीत का इतिहास, पृ. 24
2. कला वसुधा (मासिक पत्रिका) वर्ष 2003, पृ. 4
3. संगीत मासिक पत्रिका का भक्ति संगीत अंक, वर्ष 1970, पृ. 15
4. भजन संग्रह, गीताप्रेस गोरखपुर, पद संख्या 165
5. डॉ. सुनीता शर्मा, भारतीय संगीत का इतिहास, पृ. 69


- डॉ. हितु मिश्रा
 
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डॉ. हितु मिश्रा

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