प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

ज़िम्मेवारी

बड़े हो रहे हैं बच्चे
और देख रहे हैं तुम्हें
कहाँ से लाते हो रुपये?
खर्च करते हो कैसे?
घर की ज़रूरतें कैसे करते हो पूरी?
किससे, क्या बात करते हो?
कब बोलते हो झूठ?
कब बनाते हो बहाना?
कितना देते हो
बड़ों को आदर?
कितना करते हो
छोटों से प्यार?
कैसे निभाते हो रिश्ते?
कब हँसते हो?
कब होते हो चिंतित?
कब झुंझलाते हो?

बच्चे बड़े हो रहे हैं
सब देख रहे हैं
और सीख रहे हैं, जीना तुमसे
तुम्हारी तरह
बड़ी ज़िम्मेवारी है तुम्हारी
तुम्हारे हाथ में है भविष्य
बच्चों का,
परिवार का,
समाज का
और राष्ट्र का...भी।


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शाबास

अच्छा लगता है मुझे
देखकर तुम्हें
कबूतरों को चुगाते हुए दाना
बगीचे में सींचते हुये पानी
बाबा को पेंशन के लिये
ले जाते हुए बैंक
माँ के साथ जाते हुए मंदिर
पुस्तकालय में पढ़ते हुए किताबें

ये भी अच्छा लगता है
तुम्हें किसी होटल में न जाते हुए
पान, गुटखा न खाते हुए
तेज बाइक न चलाते हुए
कभी ज़रूरत पड़ने पर
गुल्लक फोड़कर
हाथ में सारे पैसे थमाते हुए

इतना भी ठीक है
ख़ुश होने के लिये

जानता हूँ
बाकी तो आप ही आ जायेगा

शाबास!
तुम में हैं खूबियां
ख़ुशी देने के लिये
बड़ों के लिये भी
ख़ुद के लिये भी।


- नरेन्द्र श्रीवास्तव
 
रचनाकार परिचय
नरेन्द्र श्रीवास्तव

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कविता-कानन (1)