प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

गीत- वर उन्हें मिलता नहीं

मील के पत्थर सफर में पढ़ लिए तो जान पाए।
डर गए जो ठोकरों से हारकर वो घर गए थे।

ठान ले पौरुष अगर तो सागरों को पार कर ले,
और निश्चय हो प्रबल तो तर्जनी पे शैल धर ले।
तैरते पत्थर की भाषा पढ़ चुके तो जान पाये,
कर गए वो नाम जग में जो किसी पे मर गए थे।

हर घड़ी चुभने-चुभाने की जिसे है चाह होती,
बस उसी के भाग्य में ही कंटकों की राह होती।
देख पाये सत्य जीवन का बगीचे में गये तो,
भर गए वो फूल, फल से जो अहम से झर गए थे।

हर किसी के चित्त में पलती विजय की कामना है,
पूर्ण कर दे कामना जो नाम उसका साधना है।
तीर चिड़िया के नयन पर सध गया तो जान पाये,
वर उन्हें मिलता नहीं जो माँगने दर-दर गए थे।


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गीत- मन का आँगन सूना है

जबसे दूर हुए तुम हमसे,
मन का आंगन सूना है।

तुम संग जीवन रंग-बिरंगा,
तुम बिन कितना साधा है।
सुधियों की आवा-जाही में,
उपजी कितनी बाधा है।
खुशी हो गयी आधी तुम बिन,
गम का हिस्सा दूना है।
जबसे दूर हुए तुम हमसे,
मन का आँगन सूना है।।

सच कहते हैं आग बुरी है,
सबको जलना पड़ता है।
लेकिन जीवन नाम इसी का,
फिर से फलना पड़ता है।
इस अग्नि ने सूखे के संग,
हरियाली को भूना है।
जबसे दूर हुए तुम हमसे,
मन का आँगन सूना है।।

सारे मुक्तक मंत्र हुए है,
गीत भजन में निखरे हैं।
कविताओं के पुष्प दुःखों के,
कल्पवृक्ष से उतरे हैं।
इस साधू मन के भीतर ही,
एक धधकता धूना है।
जबसे दूर हुए तुम हमसे,
मन का आँगन सूना है।।


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गीत- मैं तुम्हारी याद को क्या नाम दूँगा

ज़िन्दगी के पृष्ठ पढ़कर सोचता हूँ
मैं तुम्हारी याद को क्या नाम दूँगा?

पाँव में काँटे चुभे थे इस तरह से,
फूल माथे पर कभी भी धर न पाया।
देव ने वरदान में माँगा मुझे पर,
मैं समय की साध पूरी कर न पाया।
आरती की साँझ गुज़री सोचता हूँ,
मैं नयन के देव को क्या धाम दूँगा?

तुम अगर आते तो भंवरे गुनगुनाते,
तुम अगर आते कली हर मुस्कुराती।
तुम अगर आते तो बासंती बहारें,
रूप की हद क्या है यह पहचान पाती।
चाँद जब ठहरा नहीं तो सोचता हूँ,
किस सितारें को अंधेरी शाम दूँगा?

तोड़ने को तोड़ डाले तंत्र लेकिन,
राज की यह बात फिर भी अनछुई है।
भाव ने नापी अभावों में उड़ानें,
साधनों से साधना मद्धम हुई है।
अंतरे इतने पड़े है सोचता हूँ,
गीत को किस मोड़ पे आराम दूँगा?

जिंदगी के पृष्ठ पढ़कर सोचता हूँ,
मैं तुम्हारी याद को क्या नाम दूँगा?


- राम लखारा विपुल
 
रचनाकार परिचय
राम लखारा विपुल

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गीत-गंगा (1)