प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

बालगीत- बारिश आई

बारिश आई, बारिश आई।
सबका दाना-पानी लाई।।

पेड़ों को आई नहलाने,
तप्त धरा की प्यास बुझाने।
चमकाने सारी धरती को,
धुँधले जग की धुँध हटाने।
साफ़ नीर की धार बहाई।
बारिश आई, बारिश आई।।

पानी-पानी सबके आँगन,
कीचड़-कीचड़,फिसलन-फिसलन।
भीग रहीं खेतों में फसलें,
जमकर देखो हँसता सावन।
धरती अर्से बाद नहाई।
बारिश आई, बारिश आई।।

ताल-तलैया भर-भर जाएँ,
कागज़ की हम नाव चलाएँ।
वस्त्र नये क्यों पहने हमने?
जल्दी से छाता फैलाएँ।
टप-टप की धुन मन को भाई।
बारिश आई, बारिश आई।।


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बालगीत- सूर्य नहीं, वह गेंद बड़ी

सूर्य नहीं, वह गेंद बड़ी।
बीच गगन के देख पड़ी।।

सोने की लगती रोटी,
बहुत बड़ी, दिखती छोटी।
कैरम की मेरी गुम जो,
लगे मुझे ये वो गोटी।
मेरे आँगन में गिरना!
नहीं पड़ेगी तुझे छड़ी।।

लाल कभी लगती पीली,
चमक बड़ी है चमकीली।
ज़्यादा गर्मी देगी तो,
कर देगा बादल गीली।
इधर शरारत की तुमने,
उधर तुम्हें फ़िर डाँट पड़ी।।


- संजय तन्हा
 
रचनाकार परिचय
संजय तन्हा

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गीत-गंगा (1)