प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

बाल गीत-कथा: चिड़िया और बन्दर

बच्चों आओ तुम्हें बताएँ,
सीखी चिड़िया क्या बन्दर से।

किसी पेड़ पर चिड़िया का था,
एक घोंसला छोटा-सुन्दर।
चीं-चीं करते बच्चे उसके,
साफ-सफाई बहुत वहाँ पर।
दूर कहीं से बन्दर आया,
देख चकित था इतने भर से।
बच्चों आओ तुम्हें बताएँ,
सीखी चिड़िया क्या बन्दर से।

चिड़िया बोली, "आओ भाई"
लगी पूछने पता-ठिकाना।
बेघर बन्दर जल-भुन बैठा,
समझा, चिड़िया मारे ताना।
"चिड़िया को औकात बताऊँ
ज़हर भरी है यह अंदर से"।
बच्चों आओ तुम्हें बताएँ,
सीखी चिड़िया क्या बन्दर से।

बादल आये तभी घनेरे,
लगा बरसने झमझम पानी।
बच्चों के संग छिपी घोंसले,
दुबक गयी फिर चिड़िया रानी।
लेकिन बन्दर रहा भीगता,
उबल रहा था वह भीतर से।
बच्चों आओ तुम्हें बताएँ
सीखी चिड़िया क्या बन्दर से।

देखा आव न ताव झपट कर,
बन्दर जा पहुँचा उस डाली।
एक झटक में नोंच घोंसला,
उसने खुन्नस खूब निकाली।
तिनका-तिनका बिखर गया था,
उजड़ गया था साया सर से।
बच्चों आओ तुम्हें बताएँ,
सीखी चिड़िया क्या बन्दर से।

सही कहा है कभी मूर्ख से,
बिना ज़रूरत बात न करना।
करो मित्रता, सोच-समझ कर,
डाह करे यदि हाथ न धरना।
समझ गयी ये चिड़िया भी सब,
बेघर आज हुई जब घर से।
बच्चों आओ तुम्हें बताएँ,
सीखी चिड़िया क्या बन्दर से।


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बाल गीत- भला भला सा यह घर अपना

भला-भला सा यह घर अपना,
यही सुखद संसार हमारा।

हम घर से ही जाने जाते,
इस घर से ही माने पाते।
खेल खेलते, उधम मचाते,
मगन हुए हम गाने गाते।
इसके होने ही से अपना,
सबल सधा आधार हमारा।

घर में दादा, दादी माँ हैं,
घर में चाचा और पिताजी।
चाची, भाई और बहन हैं,
व्यस्त-व्यस्त हैं अपनी माँजी।
एक सुबह से गये रात तक
जीवन अपरम्पार हमारा।

घर का मेरे पहिचान बड़ा,
है घर के आगे नीम खड़ा।
शीतल छाया नीम पेड़ दे,
औ’ नहीं करेला दिखे चढ़ा
छोटी-सी बगिया है प्यारी
फूलों-सा है प्यार हमारा।

घर ही से हर रिश्ता-नाता,
सबके होने से घर होता।
प्यार भरोसा चैन लुटाता,
घर हो तो जीवन सुख होता।
इस घर के हर कोने से है,
बना हुआ व्यवहार हमारा।


- सौरभ पाण्डेय
 
रचनाकार परिचय
सौरभ पाण्डेय

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