प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर

कहानी- लाल जूते
(बांग्ला से अनुदित कहानी)

मूल लेखकः कमल कुमार मजुमदार

गौरी के साथ झगड़ा होने के कारण, आज कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मन उदास है, नीतीश समझ ही नहीं पा रहा था, आख़िर ग़लती किसकी है। मन में रह-रहकर यह बात आ रही थी- ग़लती के लिये वही ज़िम्मेदार है। ज़िन्दगी में ऐसी लड़की से अब वह बात ही नहीं करेगा।

दक्षिण दिशा के बरामदे से जितनी ही बार वह गुज़रता है, देखता है गौरी पर्दे को हटाये उधर ही देख रही है। उसे देखते ही वह झट पर्दे को गिरा देती है। इस चिंता से मुक्त होने के लिये वह बेचैन है......क्या करे...... कहाँँ जाये.......?  कोई काम करने में मन नहीं लग रहा है। अंततः शाम को याद आया, उसके जूतों का जोड़ा अब असम्मानजनक हो गया है। अनुनय-विनय कर नानी को यह बात बतानी पड़ी....रूपये भी मिल गये। अपनी कोई चीज़ ख़ुद ख़रीदने की आज़ादी में जो आनंद है, वह कहीं संभव नहीं है, लेकिन मुश्किलें भी हैं। सरकार बाबू के गँवई पसंद की छाँह में भी उसकी एक स्वतंत्र पसंद विकसित हो उठी थी, लेकिन इस पसंद में आत्मविश्वास की कमी थी।  क्या मालूम, अगर वह पसंद गलत हो?  अगर बड़ी बहनें कहने लगीं- ’’अरे! यही तुम्हारी पसंद है!  अतिम निर्णय यह पारित हो कि  -’’इसमें क्या त्रुटि है, मेरा प्यारा बच्चा इन जूतों को रगड़-घिसकर अधिक दिनों तक पहन सकता है’’- इससे गंभीर श्लेष और क्या हो सकता था।  ऐसा ही कुछ सोचते-सोचते, नीतीश सड़क पर चला जा रहा था।  उसकी पसंद के जूते छोटी दुकानों पर नहीं मिलेंगे यह धारणा उसके मन में गहरी बनी थी, इसलिये बहुत चुनकर एक दुकान के अंदर गया।  जूतेवाला, बातें इस तरह से कर रहा था कि उसके ऊपर कोई बात चल ही नहीं पा रही थी, लग रहा था जैसे कि वह नीतीश के मन की ही बातें कह रहा हो।  नीतीश को जो जूता पसंद आया था वह स्वेड और पेटेंट लेदर का काॅम्बिनेशन था।  ईष्र्या से भरकर स्कूल के सहपाठी, यदि उसके जूतों के ऊपर अपने पैर रख दें? अगर गौरी के मन में यह बात आये कि वह एक लड़के के रूप में क्यूँ नहीं पैदा हुई?


कीमत छः रूपयेः लेकिन उसके पास तो पाँच रूपये ही हैं।  मोल-भाव करने में उसे संकोच हो रहा था।  ’पसंद नहीं आया’ के बहाने, दूसरी दुकान में जाने का अवसर भी नहीं दिख रहा था, क्यूँकि जूतेवाले ने बहुत सारे डिब्बे खोलकर उसके सामने रख दिये थे।  सस्ते का जमाना है कुछ कम दाम कहने पर, क्या कम नहीं कर देगा ?  एक और इच्छा थी कि अगर संभव हो, तो कुछ पैसे बचाकर एक मोटी काॅपी खरीदेगा, गौरी की लिखावट सुंदर है, जब उससे फिर सुलह हो जायेगी वह अपने मोतियों जेैसे अक्षरों में लिख देगी - नीतीश घोष ..... सेकेण्ड क्लास ....... एकेडमी......।  जूते वाले ने कहा- ’’आप के पैरों में यह जूते जँच बहुत रहे हैं।  एक बार आईने में देखिये न।  मोल-तोल हम लोग करते नहीं हैं।  आईने की तरफ जाते हुये, पीछे घूमकर नीतीश ने देखा, पास ही एक सज्जन बैठे हैं, जिनकी उम्र का अंदाज़ नहीं लग रहा था,  लेकिन उसके बड़े भाई की उम्र के दिख रहे थे, उस हिसाब से हम उन्हें पच्चीस से तीस वर्ष की अवस्था का कह सकते हैं।  उनके हाथों में कोमल लाल चमड़े के बने दो छोटे-छोटे लाल जूते हैं।  देखकर, उसे बहुत सुंदर लगा - जूते का यह जोड़ा उन कोमल पैरों के हैं, जिन पैरों को दुलारते हुये स्नेह से भरकर सीने से चिपकाया जा सकता है।  वे चरण पवित्र, सुकोमल और निष्कलुष हैं। दुर्निवार दक्षिणी हवायें जैसे अचानक आ जाती हैं, वैसा ही एक मधुर और अनजाना आनंद किशोर नीतीश के हृदय पर आघात दे रहा था इन दो छोटे लाल जूतों की झलक विपुल हर्ष से भर देगी, उससे अनभिज्ञ था नीतीश।  खुशी से उसके प्राण जैसे भर गये हों।  मन हुआ कि जूते के जोड़े को हाथों में लेकर उसे सहलाता ही रहे।  अपनी झिझक को हटाते हुये उसने कहा - ’’महाशय, देखिये, उस तरह के जूते......’’


’’-कितने महीने के लड़के के लिये चाहिये?
गंभीर समस्या थी- कितने महीने के लड़के के लिये चाहिये! नीतीश ने कहा - ’’छः.... सात... नहीं.....नहीं.... अंदाजन आठ-दस महीने का’’।
एक छोटा बाॅक्स, उसके अंदर सो रहे दो जूते, कितना मधुर!  नीतीश की आँखों के सामने दो मंगल-चरण उभर आये।  उसे लगा, उन चरणों को वह बहुत दिनों से जानता है, पहचानता है, अनेक स्वप्नों से लिपटा, खुशियों से बने दो चरण।
वह अपनी हँसी रोक नहीं पाया, जैसे आवेग में दौड़ती आ रही थी हँसी, बिना हँसे वह रह नहीं पाया।  दिमाग पर ज़ोर डाला, किसके पैरों जैसा है? किसके पैर हैं?  याद ही नहीं आ रहा -टूटूल ?? नहीं, उसके पैर तो कहीं बड़े हैं।  मन किया कि वह उन जूतों को खरीद ले।  उसने पूछा- ’’ क्या कीमत है उस जूते की?’’
-’’एक रूपया’’।

 

अपने रूपये से खरीदने की इच्छा हुई, लेकिन वह साहस जुटा नहीं पा रहा था, उसके पास अतिरिक्त पैसे नहीं थे।  अगर कुछ सस्ते में मिल जाये।  क्या किया जाये? क्या होगा इन्हें खरीदकर?  यही कहते हुये विदा भी नहीं लिया जा सकता।  कीमत दायरे में नहीं होने के कारण, वह अपने जूते भी नहीं खरीद पाया था।  वह उठना ही चाह रहा था कि तभी उसे लगा कि जूते का वह जोड़ा उसे आकर्षित कर रहा है, अद्भुत एक आकर्षण, एक खिंचाव।  एक बार लगा जूतों का जोड़ा वह खरीद ही डाले।  क्या कहेंगे लोग, अधिक से अधिक डाँट ही तो पड़ेगी, पर हौसला नहीं मिल पा रहा था।


नीतीश छोटे बच्चों को सहन नहीं कर पाता था, उनसे उसे नफ़रत थी।  वह सोच ही नहीं पाता था कि घर के सारे लोग, टूटूल को बर्दाश्त कैसे कर लेते हैं..... छोटे बच्चों को लोग गोद में भर लेते हैं।  अपने इस स्वभाव के बारे में सोचकर उसे अपने बारे में ही शर्मिंदगी हुई।  फिर भी .... फिर भी, उसे अच्छा लग रहा था, जितने ही बार वह उस जूते को भूलने की कोशिश कर रहा था,  वही लाल जूते तैरते हुये, उसकी आँखों के सामने आ जाते थे।   मधुर कल्पनाओं से परिपूर्ण दृष्टि से उन लाल जूतों की ओर देखते हुये, वह दुकान से धीरे-धीरे बाहर निकल आया।  रास्ते पर चलते हुये, कितनी ही असंभव कल्पनायें, उसके मन में जाग रही थीं।  उसके मन में, पिता बनने की एक दुर्दम्य कामना जग रही थी।  गौरी से अगर उसकी शादी हो जाये तो?  वैसे उसे लड़के-लड़कियों में रूचि नहीं थी। कोमल हाथ-पांव की एक सुंदर लड़की, निर्मला- वह अपने मन में अनुभव करने लगा।  शायद एक कमसिन गंध भी मिली।


शाम को गौरी, लगभग अँधेरे बरामदे में बैठकर चाँदी के चम्मच से उसे दूध पिलायेगी।  चम्मच को कटोरी से बजाते हुये कहेगी ... चंदा मामा आओ....चंदा मामा आओ.... आह कितना मधुर!  आकाश में दिखेगा एक तारा।  मुझे पिता कहकर पुकारेगा।  उसे सुनाई पड़ा-अपने नन्ही बाँहों को फैलाये, तुतलाते हुये गद्गद् भाव से कोई पुकार रहा है- बाबूजी।  हाथों में सोने के दो नन्हें कड़े हैं। शायद उसने देखा, गौरी ने पीछे से उसे पकड़ रखा है।  बीच-बीच में शिशु अपने संतुलन को बनाये रखने में विफल हो रहा है, उल्लास में उसके दोनों हाथ कभी हवा में ऊपर, कभी सामने टकरा रहे हैं।  हँसता-मुस्कराता चेहरा।  मैं दोनो हाथ पकड़कर कहूँगा......चले.....चले....कदम.....कदम....डग्-मग्, लुकी-छिपी गर्विनी देखे मुस्कराये.......
नाम क्या रखेंगे?  नीतीश के लिये, इस सृष्टि में गौरी नाम सबसे मधुर है, लेकिन यह नाम तो रखा नहीं जा सकता।  हज़ारों नाम याद करने की कोशिश में वह खुद शरमा गया ....छीः... वह सोच क्या रहा है? तभी जैसे अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाये किसी ने पुकारा- ’बाबूजी’।  नहीं यह छोटे बच्चे गंदे होते हैं।  ’गंदे’ इस भाव-शब्द को प्रमाणित करने में उसे जिस तर्क ने सहारा दिया- कि अगर वह मध्य रात्रि में टूटूल की तरह चीख कर रोने लगे -ओह! क्या मुसीबत है!


जिस जूते को देखकर उसका मन चंचल हो उठा था, ख्वाहिश हो रही थी कि उसके बारे में लोगों को बताये, लेकिन मन में संकोच था कि गौरी के बारे में उसकी जो कल्पनायें हैं, लोग अगर जान गये तो ? यह जानने की संभावना तो नहीं थी, तब भी लग रहा था, कोई जान सकता है।  उसके घर गौरी के आते ही नानी से लेकर दूसरे सभी सदस्य, उससे मज़ाक करने लगते हैं।  कारण भी है, एक बार स्नान करने के बाद, वह हड़बड़ी में भोजन करने ही बैठा था कि नानी ने कहा - ’’नीतीश, तुम्हारे पीठ से तो अब भी पानी टपक रहा है, तौलिये से सुखाया भी नहीं?
वहीं पास में ही, गौरी खड़ी थी, उसने अपने आँचल से नीतीश के पीठ को पोंछ दिया था।  नीतीश इस बात पर बहुत नाराज भी हुआ था।  ऐसी बहुत सारी घटनायें थी, जिससे कि घर की लड़कियों में यह धारणा थी कि नीतीश के साथ गौरी दिखती बहुत अच्छी है, शादी हो जाने पर वे सुखी रहेंगे, और इन कारणों से वे हँसी-मज़ाक भी किया करते थे।


क्या करे...... किसी को अपने मन की बात नहीं कह पाने के कारण, नीतीश ने अपनी बड़ी भाभी को कहा -’’जानती हो भाभी, आज जूते का एक जोड़ा देख आया हूँ।  जूते छोटे हैं, टूटूल के पैरों में शायद फिट् आ जाये।  कितना मुलायम था, तुम्हें कैसे कहूँ ?  कीमत भी सिर्फ एक रूपया।’’  वैसे नीतीश को इस बात पर घोर आपत्ति थी कि टूटूल का नाम लेकर, ऐसे सुमधुर भावनाओं को मुक्ति मिलेे।  भाभी ने कहा - ’’ अच्छी बात है, कल तुम्हें रूपये दूँगी, तुम ले आना।  उसका मन क्रुद्ध हो उठा था।  क्या मालूम, अगर सचमुच जूते लाने ही पड़े तो ?  अंततः उन जूतों को टूटूल के पैरों में ही देखना होगा।  आशा की किरण बस इतनी थी कि यह कहने के बाद भाभी भूल गईं थीं यह प्रकरण।  नीतीश अपने पढ़ने के कमरे में चला गया।  आज पढ़ने में दिल नहीं लग रहा था, हर पल वही चिंता उसे सता रही थीे।  अपनी कल्पना के अनुसार, उस शिशु के चेहरे को देखने की प्रबल कामना हो रही थी।  वह कभी इस कि़ताब को उलटता कभी उस कि़ताब को।  कहीं नहीं मिल रहा था, उस शिशु का चेहरा, जिसे वह ढँूढ रहा था।  उसका चित्र कहीं नहीं था..... कहाँ है .... कहाँ है....?
अचानक पास वाले कमरे से गौरी की आवाज़ सुनाई दी।  उसके स्वर कुछ अस्वभाविक लग रहे थे।  हर बार, झगड़े के बाद, उसका स्वर ऐसा ही होता था।  गौरी को वह समझ नहीं पता था।  गौरी शायद अंदर उसके कमरे में जा जाये, इसी आशा में वह बाहर की ओर देखता रहा।  तेज़ आँधी-झंझावात से कमरे के दरवाजे और खिड़कियाँ जिस तरह काँप उठती हैं, गौरी के प्रवेश करते ही वैसे ही काँप उठी। नीतीश के कंधे पर अपने हाथ रखते हुये गौरी ने कहा - ’’नाराज हो!’’ सुनते ही नीतीश की नाराज़गी हवा हो गई।


नाराज होने का कारण भी है।  गौरी चैथी क्लास में पहुँचकर, अपने को महान समझने लगी है।  गणित में क्या लोगों से गलतियाँ नहीं होतीं?  अगर हो भी गई तो क्या हुआ?  पहली बार सही हल नहीं कर पाया, दूसरी बार तो हल कर दिया था।  हल सही नहीं होने पर, गौरी इस तरह हँसने लगी, और ऐसे मंत्रों का उच्चार किया कि अच्छे से अच्छे सभ्य सुसंस्कृत व्यक्ति के धैर्य की सीमा भी टूट जाये, नीतीश की तो बात ही अलग है।
नीतीश की नाराज़गी कम हो गई थी, लेकिन अपना चेहरा उठाकर उसे देख नहीं पा रहा था, वही कल्पना उसके मन में मंडरा रही थी।
’’तुम नाराज़ हो ? अच्छा फिर नहीं कहँूगी, कभी नहीं कहूँगी- बलिहारी है, तुम्हारे नाराज़गी की।  मैं तो तुमसे नाराज़ नहीं हुई’’?
-’’मतलब ? मैंने तुमसे क्या कहा, जो तुम नाराज़ होगी ?’’
गौरी की इन बातों को सुनकर उसे गुस्सा तो बहुत आता था, लेकिन कुछ कहा भी नहीं जा सकता था।
-’’चुप क्यूँ बैठे हो? गणित के इस सवाल को हल कर दो न!
-’’नहीं गणित-वणित कुछ नहीं होगा मुझसे’’।
- ’’तुम्हारे पैर पकड़ती हूँ’’।
इतनी देर बाद, नीतीश ने उसकी तरफ देखा। उसे देखते ही अब विस्मय की काल-सीमा नहीं रह गई थी। बिल्कुल उस शिशु का चेहरा, जिसे उसने अपने अंदर समाये रखा था।  एकदम गौरी की तरह गोरा, वैसी ही सुंदर, चंचल काली आँखे।


-’’क्या देख रहे हो’’?
शरमाते हुये, उसने गणित के सवाल को हल कर दिया।  उसके बाद बहुत सारी बातों के बाद लाल जूते के बारे में कहा -’’इतना सुंदर, तुम्हें लगेगा जैसे सचमुच दो लघु चरण हैं।  उन लघु चरणों के बारे में कल्पना करते हुये, गौरी का हृदय भी एक अनजाने आनंद से भर उठा, झूम उठा, जिस आनंद का प्रादुर्भाव और दर्शन अब तक सिर्फ नीतीश के चिŸा पर था।  गौरी ने कहा -’’ठीक है, कल तुम्हें मैं पैसे दूँगी, टिफिन के पैसों से मैंने बचाकर रखे हैं।  क्यूँ, कैसा रहेगा?’’
सज्जनता की ताक़ीद से उसने कहा -’’तुम्हारे पैसे क्यँू लूँ भला?’’
गौरी के हृदय में यह बात अटक गई।  उसने अपने गणित की काॅपी को उठाया और धीमे क़दमों से कमरे के बाहर निकल गई।  नीतीश अचरज में उसे देखता ही रहा।
पैसे इकट्ठे करने में एक-दो दिन लग गये।  इन दो दिनों में, गौरी उसके घर नहीं आई।
नानी ने पूछा -’’नीतीश, आजकल गौरी यहाँ क्यूँ नहीं आती रे ?
- ’’मुझे क्या मालूम?’’
अपने घर से ही, गौरी ने यह बातें सुनीं।  गौरी उसी समय अपने कमरे की खिड़की केे पर्दे को हटाकर खड़ी हो गई।
नानी ने पूछा - ’’आती क्यूँ नहीं हो?’’
- ’’बुख़ार है’’।


बुख़ार की बात सुनकर, नीतीश थोड़ा भी विचलित नहीं हुआ, उसे मालूम था कि यह एक झूठ है।  रूपया लेकर उस जूते के जोड़े को लाने के लिये वह धर से निकल पड़ा।  रास्ते में उसे तुड़वा भी लिया, क्यूँकि रूपये का खो जाना असंभव तो नहीं था। सड़क के हर मोड़ पर एक बार गिन लेता, पैसे तो ठीक है न!  जूते की दुकान में जाते ही उससे कहा - ’’दीजिये तो वही लाल जूते, वही जो मैं उस दिन देख गया था।
दुकानदार ने एक जोड़ी जूते दिखाये। उसने कहा .... नहीं ....नहीं...ये नहीं.... उस शेल्फ पर ज़रा देखिये तो....। सपनों का वह जूता मिल गया था।  न जाने क्यूँ जूते और अच्छे लग रहे थे, उसके अंदर न जाने क्या छिपा था।  चिŸा में एक हिंसक आनंद की अनुभूति हुई - क़ीमत को लेकर कोई झमेला नहीं हुआ, एक रूपया देकर उसने जूते ले लिये।  जूतेवाले ने कहा - ’’फिर आईयेगा’’। नीतीश को लगा उसने ठग लिया है। सड़क से गुज़रते वक्त उसने कई बार सोचा कि डिब्बे को खोलकर एक बार देख ले, लेकिन वह ऐसा कर नहीं पाया।  एक बार मन में आया, इस जूते का वह करेगा क्या?  किसके लिये खरीदा उसने?  क्या वह पागल है?  झूठ-मूठ पैसे बर्बाद किये।  नीतीश के भीतर से एक आवाज़ आई - ’’अगर यह टूटूल के पैरों में फिट् हो जाये तो?  टूटूल की याद आते ही उसे थोड़ा भय हुआ, अगर सचमुच उसके नाप के जूते हुये, तब सब गड़बड़ हो जायेगा। फिर प्रश्न उठ खड़ा हुआ - उसने खरीदा किसके लिये है। कोई बात नहीं, उसे अच्छा लगा कि उसने खरीद लिया है। अच्छा लगने के कारण, इंसान तो बहुत सारे निरर्थक काम करता है - पटाखे फोड़ता है, गंगा में गहने फेंकता है- यह तो कम से कम जूते हैं।  उसने कोई अपव्यय नहीं किया है, बिल्कुल सही निर्णय है, वह सौ बार खरीदेगा।  उसकी जीभ अचानक दाँतों के दबाव में आ गई।  कहते हैं, अगर कोई याद कर रहा हो, तो अक्सर ऐसा होता है।  लेकिन, नीतीश को कौन याद कर रहा होगा ? गौरी ?  आज गौरी से मिलना जरूरी है।  घर पहुँचकर उसे उस मूल्यवान वस्तु कोे दिखाने की इच्छा हो रही थी, लेकिन साहस जुटा नहीं पा रहा था।  अगर लोग परिहास करने लगे तो?  पहली बात तो यह थी, किसके लिये खरीदे हैं, उसने जूते?  क्यूँ खरीदे हैं?


उस वक्त टूटूल बरामदे में खेल रहा था।  उसने उसके पैरों का नाप लिया, जूते के नाप से मिलाया।  जूते थोड़े बड़े थे, लेकिन उसे लगा, जूते बहुत बड़े हैं, टूटूल के पैरों के नाप से।  शंकित चिŸा से नानी के पास जाकर उसने कहा - ’’तुम लोगों को उस लाल जूते के बारे में बताया था न .... यह देखो..... रसोईं-घर में हँसी के फव्वारे छूटने लगे।  नानी ने कहा .... अरे भगवान .... कहाँ जाऊँ? क्या करूँ?  बच्चे के आने के पहले ही उसके जूते  .... शोर मच गया।  नीतीश का चेहरा शर्म से लाल हो उठाा था।  उसने कहा - ’’यह जूते टूटूल के लिये लाया हूँ........’’
कौन सुनता था उसकी बात।  कुछ समझ नहीं आने पर, वह पढ़ने के कमरे में जाकर, लाईट आॅन किया और बैठ गया।  
सामने जूते का जोड़ा रखा था, वह उन्हें जी भर देख रहा था।  यह देखना, ख़ुद को देखना था।  वह सोचने लगा, गौरी को कैसे बुलाया जाये ? शोर सुनकर, गौरी खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई थी, और नीचे देख रही थी।  मामला क्या है, वह समझ नहीं पा रही थी।  मन में कामना हो रही रही थी कि अगर उसी चिर-परिचित इशारे से, नीतीश एक बार उसे बुला लेता।  जब रहा नहीं गया तो ऊपर से नीचे उतर आई।  उसके आते ही नीतीश ने कहा - ’’तुम्हें एक चीज़ दिखाऊँगा, रूकना ज़रा’’।  गौरी सिर उठाकर उसे देखती रही।  नीतीश के शर्ट के ऊपरी हिस्से का एक बटन टूटा हुआ था।


- ’’तुम्हारे शर्ट के ऊपरी हिस्से का एक बटन टूटा है, एक लाकर दूँ?’’
- ’’ले आओ’’
गौरी की चूडि़यों में सेफ्टिपिन नहीं था।  सिर्फ एक था, ब्लाऊज़ में बटन की जगह।  देने के बाद उसे समझ में आया कि ब्लाऊज़ खुला है।  उसने कहा - ’’वह मुझे लौटा दो, तुम्हारे लिये एक लेकर आती हूँ’’।
- ’’रहने दो’’
- ’’रहने क्यूँ दूँ .... ला देती हूँ, कातर स्वर में उसने कहा।
- ’’रहने दो, ’’ कहते हुये और मुस्कुराकर उसने जूते के डिब्बे को खोल दिया और गौरी के चेहरे की तरफ देखने लगा।  गौरी का चेहरा आनंद से भर उठा था।  गहरे प्रेम में उसकी काली आँखें स्वप्निल हो उठीं थीं।  जूते को देखकर, गौरी सिहर उठी थी।  उसके देह में वसंत की पुलक थी।  उसे लगा कि जैसे जूते का वह जोड़ा, उसके बच्चे का ही है।  शरीर आनंद से शिथिल हुआ जा रहा था।  एक रमणीय सुख की अनुभूति।  फिर कहा - ’’आह....!  सब कुछ जैसे आज पूर्ण हो गया था।  अपनी-अपनी कल्पनाओं में जो सुंदर थे, उसी को रूप देने के लिये, आज दोनों एक दूसरे से जुड़ गये थे।


विस्मय से भरा नीतीश बस देखे जा रहा था। अरे यह क्या....? पड़ोस वाले घर से तिलक-कामोद के जोड़ की स्वर लहरियाँ आ रही थीं। उसकी गहरी झनकार हवा में तैर रही थी। वह संगीत और इस जीवन के महासंगीत ने उन दोनों को, हिंसक वास्तविकता के जंगल से एक ओट दे रखा था। जो बात अदृश्य थी, अंतर में थी, वह जैसे थिरकते हुये, ऊपर आकर नृत्य करने लगी थी। कितने ही जन्मों का मातृस्नेह-मातृत्व।  गौरी ने देखा, सुंदर अनागत शिशु जो उसकी कल्पनाओं में था, अंग जिसके मातृ स्नेह के माधुर्य से गढ़े गये थे, जो देखने में बिल्कुल नीतीश जैसा है, उसकी आत्मा जैसे शिशु के आकार में प्रवेश कर, एक शरीर का रूप ले चुकी है। चाहत हुई कि सीने से लिपटाकर उसे दुलारे, सीने से लगाकर वेदना सिक्त साँसे छोड़े। दोनों जूतों को धीरे-धीरे सहलाते हुये, अचानक ज़ोर से पकड लिया और जितनी भी ताकत उसके शरीर में थी, उसे लगाकर अपनी छाती में भींच लिया। भग्न स्वर में कुछ ध्वनियाँ उसके कंठ से निकल रही थीं। आह....!! .आनंद से आँखें विस्फारित थीं। आज उसने अपने को अनुभव किया। शांत हो गईं, हज़ारों वासनायें, हज़ारों वेदनायें......हज़ारों सपने मूर्त हो गये।


इस किशोर अवस्था में ही उन दोनों ने जगत की सारी अपूर्णताओं पर उपलब्धि पाई। पूर्णता की संभावनाओं में दोनों महाआनंद के नशे में झूम उठे। गौरी के हृदय के अंदर से, वही लाल जूते पहनकर नीतीश डग-मग् चलने लगा और गौरी स्वयं, नीतीश के हृदय-पथ की पगडंडी पर राह निकाले चल रही थी। अचानक उसने, एक ध्वनि के साथ जूतों को चूम लिया। उसके बाद, थोड़ी लज्जा से रक्तिम हुये चेहरे को उठाकर कहा - ’’ये किसके लिये लाये हो, जी....?  नीतीश ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा- ’’तुम्हारे लिये...’’      
- ’’वाह तुम तो बड़े वो हो.....इतने छोटे जूते, मेरे पैरों में आयेंगे कभी.... कहो न.... तुम्हारे हैं क्या?’’
- ’’धत् मेरा क्यूँ होगा?’’
भवें सिकोड़कर गौरी ने कहा - ’’तब किसके लिये हैं ?’’ उसके आँखों की पुतली नाच उठी थी।
- ’’तुम्हारी गुडि़यों के लिये लाया हूँ।’’
- अरे ....ऐसा क्यूँ होगा भला, अगर तुम लाये हो, जरूर अपने बेटे के लिये लाये होगे’’।
- ’’ अच्छा चलो.... हम दोनों का है’’।
- ’’हट् .... असभ्य कहीं के...’’कहते हुये गर्दन को घुमाते हुये वह उस मधुर हया को अनुभव करने लगी। लाल जूते का वह जोड़ा तब भी उसकी गोद में था। एक मातृमूर्ति।








 


- शेष अमित
 
रचनाकार परिचय
शेष अमित

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