प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- रेस का घोड़ा

शाश्वत ने घर में पाँव रखा ही था कि मेहा बोली, "शाश्वत कपड़े मत बदलियेगा, अभी हमें रेयान को लेकर एडमिशन कराने चलना है।"
"एडमिशन? अरे वो शहर के सबसे अच्छे स्कूल में जा रहा है, कितनी कठिनाइयों के बाद तो वहाँ एडमिशन हुआ है।"
"अरे वो तो मुझे भी पता है। मैं स्कूल नही कुमाॅन क्लासेज की बात कर रही हूँ।" शाश्वत समझ गया कि मेहा की किसी मित्र ने कुमाॅान कक्षा में अपने बच्चे का प्रवेश कराया है औैर मेहा को रेयान का पूरा भविष्य अंधकारमय लगने लगा है, भला किसी भी जगह उसका बेटा किसी से पीछे कैसे रह सकता है?
"कुमॅान!! ये क्या बला है?" शाश्वत ने हल्के मूड में कहा।
पर मेहा मजाक के मूड में नही थी। उसने बताया, "कुमाॅन एक जापानी विधा है, इसमें छात्र को किसी भी विषय में इतनी बार अभ्यास कराया जाता है कि वह सोते में भी वह काम आसानी से कर लेगा।"
"अच्छा पर तुम्हें पता कहाँ से चला?" शाश्वत ने पूछा। उसको भी इसकेे बारे में जानने की उत्सुकता हुई।


मेहा ने बताया, "विदिशा ने अक्षरा का एडमिशन करवाया है। फिर रहस्यात्मक ढंग से बोली, "पता है वह तो मुझे बताती ही नहीं पर कल जब मैं रेयान को लेकर स्कूल से लौट रही थी तो विदिशा टेम्पो का इंतजार कर रही थी। मैंने उसे अपनी गाड़ी में बैठने को कहा तो वो टाल-मटोल करने लगी। मुझे कुछ शक हुआ, सदा मुझसे लिफ्ट लेने को आतुर विदिशा आज मना कर रही है, ज़रूर कुछ बात है! मैंने उसे ज़ोर देकर अपनी गाड़ी में बैठा ही लिया।"
"फिर?"
"फिर वो पार्क रोड के मोड़ पर बोली, रोक दो। मैंने पूछा यहाँ कैसे! तब बोली अरे कुछ नहीं, अक्षरा को कुमॉन क्लासेज ले जाना है।"
"मैने पूछा कुमान क्लासेज क्या है, तो बोली कुछ नही मैथ्स की प्रैक्टिस होती है बस।"
मेहा ने विदिशा की आवाज की नकल उतारते हुये कहा। फिर विजयी स्वर में बोली, "पर मैं कोई कम नही हूँ, मैंने घर आकर इंटरनेट पर पूरी जानकारी ले ली और उसके सेंटर फीस समय आदि सब देख लिया।"
"वाह मेरी शरलक होम्स।" शाश्वत ने प्रसन्न हो कर कहा।
वैसे तो शाश्वत और मेहा सरलता से किसी बात पर एकमत नहीं होते थे पर बात जब रेयान की हो तो दोनो पूर्णतः एकमत होते कि उनका बेटा किसी भी क्षेत्र में किसी से पीछे नहीं हो।


उसी दिन शाम को रेयान का एडमिशन कॅुमान की कोचिंग में हो गया। शाश्वत और मेहा दोनो ऐसे प्रसन्न थे, मानो किसी युद्ध में विजय पायी हो। वह बात और है कि रेयान को अच्छा नही लगा, उसके शाम को तीन से पांच सोने के और पांच से सात खेलने के समय में एक-एक घंटे की कटौती जो हो गयी थी। पर उसकी आवाज़ तो नक्कारखाने में तूती की आवाज़ थी। उस नादान को क्या पता कि पापा-मम्मी उसे सर्वश्रेष्ठ बनाना चाहते हैं।

पहले तो रेयान रोज़ स्कूल से आकर खाना खा कर तीन बजे से पाँच बजे तक सोता था। फिर दूध पी कर सात बजे तक खेलता और एक घंटे पढ़ाई करके आठ बजे सो जाता था। पर अब जब उसे चार ही बजे मम्मा उठातीं तो रोज़ ही वह ना-नुकुर करता  और कभी प्यार से, कभी मम्मा की डांट खा कर कुमाॅन क्लास में जाता। मम्मा उसे समझाती, "बेटा हम तुम्हें अच्छा बच्चा बनाने के लिये ही भेजते हैं, देखा अक्षरा भी जाती है न।"
पर रेयान को न ही अच्छा बच्चा बनने में कोई रुचि थी, न ही अक्षरा जैसा बनने में। उसे तो सोना भी अच्छा लगता था और खेलना तो उससे भी अच्छा। खेलने के लिये तो वह सोना भी छोड़ सकता था। उसे याद है कि जब वह कुमॅान क्लास में नहीं जाता था और जल्दी खेलने जाना चाहता था तो मम्मा उसे ज़बरदस्ती सुलाती थीं कि बच्चों को अधिक सोना चाहिये और अब वो सोना चाहता है तो उसे चार बजे ही उठा देती हैं। इन बड़े लोगों का कुछ भी पता नहीं होता, वह मन ही मन सोचता।


रेयान की डायरी में अध्यापिका ने लिखा था कि वह रेयान के अभिभावकों से मिलना चाहती हैं, जब शाश्वत और मेहा गये तो रीता मैम ने कहा, "आजकल रेयान पढ़ाई में बहुत गलतियां करता है, उस पर ध्यान दीजिये।"
पहली बार रेयान की शिकायत हुई थी, नहीं तो उसकी तो मैम सदा ही प्रशंसा ही करती थीं।
मेहा और शाश्वत अब रेयान की पढ़ाई का और अधिक ध्यान रखने लगे। दिन-रात वो उससे कुछ न कुछ याद कराते रहते, चाहे वह खाना खा रहा हो या नहा रहा हो।


आज उसका परिणाम आना था। मेहा श्हश्वत स्कूल गये तो सदा प्रथम स्थान पर रहने वाला रेयान काफी पीछे था। घर आके वो काफी नाराज़ हो गये। उन्होंने उसका खेलना बन्द कर दिया, अब उस समय भी उसे पढ़ाई करनी होती थी। मेहा स्वयं उसे एक-एक पाठ याद करातीं।
वह आश्वस्त थी कि इस बार रेयान अवश्य प्रथम आयेगा, पर उनकी आशा के विपरीत इस बार वह और पीछे हो गया है तो मेहा और शाश्वत मैम से मिले और कहा, "आप मेरे बेटे को क्यों कम नम्बर देती हैं, उसे तो हम सब याद कराते हैं।"
रीता मैम ने कहा, "मैं आपसे मिलना ही चाहती थी। मैं तो स्वयं आश्चर्य में हूँ कि इतना कुषाग्र था रेयान, पर पता नहीं अब उसे क्या हो गया है! न तो उसका मन पढ़ाई में लगता है, न ही वह परीक्षा में पहले जैसा उत्तर लिखता है और थका-थका सा रहता है। कभी-कभी तो सो जाता है।"


शाश्वत और मेहा को चिन्ता हो गई। मेहा ने शाश्वत से कहा, "अब तो रेयान को और अच्छा परिणाम लाना चाहिये। अब तो वह कुमाॅन कक्षा में भी जाता है।"
शाश्वत ने और मेहा ने रेयान से बात की तो उसने कहा, "हमें पढ़ना अच्छा नहीं लगता।"
मेहा ने समझाया, "बेटा अगर पढ़ोगे नहीं तो कैसे बड़े ऑफिसर बनोगे फिर खूब पैसा कैसे आएगा, अच्छी वाली कार कैसे लोगे?"
रेयान ने ठुनकते हुए कहा, "हमें नही चाहिये कार पैसा बस हमें खेलना है।"
शाश्वत ने कहा, "तुम फर्स्ट आओगे तो हम  मनपसंद गेम देंगे।" तो भी रेयान की एक ही हठ थी कि हमें पढ़ना नही खेलना है।
शाश्वत को गुस्सा आ गया, उसकी पिटाई कर दी। रेयान हतप्रभ था, उसे पहली बार मार पड़ी थी।
उस दिन उसने खाना भी नहीं खाया और सो गया। मेहा जब उसे जगाने गई तो उसका बदन तप रहा था। मेहा ने उसे सहलाया तो वह चौंक पड़ा और बेसुध-सा चिल्लाने लगा, "मुझे नहीं पढ़ना, मुझे कार नहीं चाहिये, पैसा भी नही चाहिये।"


अन्ततः वो लोग उसे चिकित्सक के पास ले गये। डॉक्टर ने पूरी बात सुनी तो उनसे कहा कि वो रेयान से बात करना चाहता है। उसने रेयान से बात की, उसे दवा दी और मेहा व शाश्वत से कहा, "इलाज  की आवश्यकता रेयान को नहीं, आपको है जो अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने हेतु आपने उसका यह हाल किया है। उसके सामर्थ्य से अधिक बोझ उस पर डाल दिया है। यही वजह है कि वह थक जाता है और पढ़ाई से विमुख हो गया है।"
डॉक्टर ने समझाया, "बच्चे संवेदनशील होते हैं। आज आपने उसे पहली बार मारा तो वह इस धक्के को सह नहीं पाया। यदि उस पर ऐसे ही दबाव पड़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब वह मनोरोगी हो़ जाएगा।"


यह सुन कर शाश्वत और मेहा के हाथ के तोते उड़ गये पर अभी भी उन्हें चिन्ता यह थी कि अक्षरा भी तो यह सब करती है। जब वो कर सकती है तो उसकी आयु का रेयान क्यों नहीं?
डॉक्टर ने कहा, "हर बच्चे की अलग-अलग क्षमता होती है। हो सकता है जो रेयान की विशेषता हो वह अक्षरा में न हो और यदि वह अधिक विलक्षण हो तो, क्या आप अपने बच्चे की जान ले लेगें? यह आपको तय करना है कि आपकी महत्वाकांक्षा अधिक महत्वपूर्ण है या आपका बच्चा?"
दोनों डॉक्टर का आशय समझ गये थे। उन्होंने रेयान को गले से लगा लिया। शाश्वत बोला, "नहीं नहीं, हमें हमारा बच्चा प्यारा है। हमें नही बनाना उसे सर्वश्रेष्ठ।"
तो मेहा बोली, "अरे नहीं पढ़ेगा तो हम उसे दुकान खुलवा देंगे न!"
डॉक्टर ने हँसकर कहा, "ऐसा भी नहीं है कि आप उसे पढ़ाएं ही नहीं। आपका बेटा कुशाग्र है, उसे पढ़ाइये और आगे बढ़ाइये पर उसे बच्चा समझिये रेस का घोड़ा नही।"


- अलका प्रमोद
 
रचनाकार परिचय
अलका प्रमोद

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कथा-कुसुम (4)