प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

डायरी

घोंसले में बैठकर बाहर निहारना
 



(प्रकाशित डायरी ‘पढ़ते-पढ़ते: लिखते-लिखते’ से कुछ अंश)
 


3 जुलाई, 2015
रूला दिया यह संस्मरण


मैं 16 साल की उम्र से ख्यात चित्रकार, रचनाकार भाऊ समर्थ जी के चित्रों, रेखाचित्रों को देखता रहा हूँ। पिछले 30-40 वर्षों की शायद ही ऐसी कोई लघु-पत्रिका हो, जिसका मुखपृष्ठ भाऊ के रेखाचित्रों से खुद गर्वित न हुआ हो। भले ही वहाँ से उनको कोई आमदनी नहीं हो पाती रही हो। उनके व्यक्तित्व को लेकर मुझे सदैव जिज्ञासा बनी रही कि आख़िर भाऊ कैसे इतने व्यापक हैं? करते क्या हैं? गुज़ारा कैसे चलता है?

पिछले दिनों जब 'चिंतन दिशा' के सुयोग्य संपादक आदरणीय हृदयेश मंयक जी से यह अंक (जनवरी-जून, 2015) मिला और उसमें संस्मरण-आलेख भाऊ समर्थ : मेरा हमसफ़र पढ़ा तो भाऊ का सारा जीवन, संघर्ष और रचनात्मकता आँखों के सामने दिखती हुई जान पड़ी। हरिपाल त्यागी जी का यह आलेख सच कहूँ तो मुझे रूला-रूला गया। दोस्तों को कैसे याद किया जाता है, दोस्ती होती क्या है? त्यागी जी की भाषा सिखा देती है बहुत कुछ संवेदनशील मन को।

सभी सामग्री में सर्वोच्च और संग्रहणीय आलेख चयन के लिए हृदयेश जी के पुनः आभार।




6 जुलाई, 2016
घोंसले में बैठकर बाहर निहारना


घर में संसार होता है और संसार बगैर घर के आख़िर क्या होता है? जो भी कहें आप! फ़िलहाल हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार तेजिन्दर जी उम्र के इस पड़ाव में जाकर अब एक ऐसे 'घर' में रहने लगे हैं, जो उनका 'अपना' है, जिसे उन्होंने ख़ुद रचा है।
मैं पूछता हूँ- ''भैया, कैसा लग रहा है अब?''
वे बताते हैं- ''अपना घर। यह एक अजब मनःस्थिति है। पक्षी का घोंसला है। उम्र के इस पड़ाव पर लगता है कि जैसे जीवन की लंबी उड़ान के बाद एक ठहराव है कि अब अपने घोंसले में इत्मीनान के साथ बैठ कर बाहर के जीवन को निहारा जाए। मुझे तो लग रहा है कि अब सिर पर छत नहीं आसमान है।''




आप भी जयप्रकाश हम भी जयप्रकाश

''यार, आप जिस साल जन्मे, मेरा बड़ा बेटा दो-तीन साल का हो चुका था।"
''जी, तब तो आप मेरे अंकल ही होंगे लेकिन क्या मैं आपका शुभ नाम जान सकता हूँ?''
"एक क्लू और... मैं और विष्णु खरे जी साथ-साथ आगे बढ़े। वे साहित्य की ओर बढ़ गये, मैं फ़िल्म की ओर...''
''जी..... उन्हें भी आपके साथ प्रणाम...पर आप....''
''एक और सुन लें... मेरी पत्नी ख्यात साहित्यकार हरिकृष्ण प्रेमी जी की बेटी हैं। हम दोनों ने साथ-साथ अंग्रेज़ी में एमए किया।''
''जी... उन्हें कौन नहीं जानता... पर आप नाम बता दें ना अंकल...''
''मेरे इंदौर वाले घर पर हिंदी की लगभग सारी बड़ी पत्रिकाएँ आती हैं। अभी 'हंस' पढ़ रहा था तो तुम्हारी कविता पढ़कर रहा नहीं गया... भई वाह... क्या बात है.... मियाँ, तुम तो बहुत ही प्यारे कवि हो अब मेरे लिए....''
''पर कौन-सी कविता अंकल प्यारे....?''
''पर्वत की छाती पर पानी का गाँव!"
''अंकल जी, बहुत-बहुत शुक्रिया पर....नाम तो बता दें प्लीज...."
हाहाहाहा, तुम मानस हो मैं चौकसे.... जयप्रकाश तुम भी, जयप्रकाश मैं भी।

अभी कुछ देर पहले मोबाइल पर जाने-माने फ़िल्म स्तम्भ लेखक जयप्रकाश चौकसे जी ही बतिया रहे थे। आगे क्या बात हुई आपको नहीं बताऊँगा।




8 जुलाई, 2014
पहचानिए ऐसे चिरकुटाधीशों को!


भट्टतोत सदियों पहले कह गये हैं:

दर्शनाच्च वर्णनाच्च रूढा लोके कवि श्रुतिः
नो दिता कविता लोके यावज्जामा न वर्णना।।

मतलब 'दर्शन' और 'वर्णना' दोनों के योग से ही 'काव्य' का जन्म होता है। ज़ाहिर है ऐसी स्थिति में कवि-चेतना अनुभव को जो रूप देती जाती है वही 'वर्णना' है। बाहर काग़ज पर जो लिखा जाता है वह तो 'लिपिबद्ध करना' कहा जायेगा, जो सृजन से अतिरिक्त कर्म है। यदि ऐसा नहीं है तो अपढ़ कबीर और अंधे सूर को स्रष्टा पद त्यागना पड़ेगा।
यानी 'लिपिबद्ध' करते रहना 'काव्य' नहीं है।

मेरा लब्बोलुआब सिर्फ़ इतना ही कि फेसबुक पर अधिकांश 'नर-नारी' (संभावनाशील भी कतई नहीं) 'लिपिबद्ध' हो रहे हैं, और कुछ 'नरपुँगव' ऐसे भी हैं जो उनकी कथित 'लिपिबद्धता' मात्र को ही 'काव्य' सिद्ध किये जा रहे हैं।
इस प्रकार क्या यहाँ एक अशुद्ध और फूहड़ रोमानियत को विकसित नहीं किया जा रहा कि 'लिखो तो कुछ सही' यानी 'लिपिबद्ध' तो करो कुछ और परिणाम में 'क ख ग' का सही क्रम तक नहीं जान पाने वाले संवेदनहीन और फटाफटप्रिय 'नर-नारी' ठीक दूसरे क्षण से 'कवि' ही नहीं 'काव्याचार्य' होने के रूतबे से आप को गुरेरने पर आमादा होने लगे हैं।

पहचानिए खुद को, ऐसे 'चिरकुटाधीशों' को और उनकी 'चिरकुटई' को भी.....



खेत और बाज़ार

गाँववाले दादा जी हैं कि खेत के प्याज को 5 रूपये में भी बेच कर दुःखी नहीं होते और शहरवाले पोते हैं कि उसी प्याज को बाज़ार से 35 रूपये में भी ख़रीद कर सुखी नहीं होते।



धर्म का अनुभव

लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे। एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा।
लिंकन ने कहा– “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था 'जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ, और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ। यही मेरा धर्म है।"




9 जुलाई, 2015
रोटी तू छोटी नहीं


उन्होंने अपने जीवन-काल अर्थात् 73 साल में 2-4 सौ नहीं बल्कि 10-10 लाख दोहे रचे। उनका नाम 'वर्ल्ड गिनीज़ बुक' में दर्ज हुआ। ताज़्जुब कि उन्होंने कबीर साहेब की तरह कभी कलम तक नहीं छुआ था। राजस्थान के दूरदराज़ और पिछड़े कस्बे करौली (ब्रज-प्रदेश) में उनका सारा जीवन बीता। रैदास की तरह एक दलित (चमार) परिवार में जन्म लेकर भी वे सदैव रचनात्मक बने रहे, तुलसी बाबा की भाँति दोहे को माध्यम बनाकर। 2009 में 5 दिसंबर के दिन ऐसी लोक-विभूति को हृदयाघात की वजह से दुनिया से डेरा-डंडा उसाल कर जाना पड़ा।

मैंने कहीं पढ़ा है सुपरिचित आलोचक शंभु गुप्ता ने उन पर एक पुस्तक भी संपादित की है- 'दो अक्षर सौ ज्ञान' जिसे शिल्पायन, दिल्ली ने प्रकाशित की है। पुरानी भाषा और पुराने छंद में नया तेवर वह भी वर्गीय चेतना एक लोक कवि में खँगालना हो तो अर्जुन कवि से दूसरा और कौन हो सकता है भला! देखते हैं कुछ दोहे उनके:

रोटी तू छोटी नहीं, तो से बड़ौ न कोय।
राम नाम तो में बिकै, छोड़े सन्त न होय।।

अर्जुन राजन-राज में, आजादी क्या चीज़।
चाखी नहीं गरीब नै, देखा कभी न बीज।।

खीर खून में पक रही, चढ़ा विश्व का देग।
जातिवाद भट्टी जलै, मनख मनख खा सेक।।

अर्जुन बुलबुल का करै, परे पिछारी काग।
ऊपर दुश्मन बाज है, नीचे बैरी नाग।।



फ़ेसबुक पर मिला आशीष

(पिछले दिनों हिंदी के वरिष्ठ कवि-आलोचक आदरणीय सेवई सिंह शेखावत जी ने मुझ अगोत्री के लिए यह आशीष रचा है। मैं उनकी उदारता को प्रणाम करता हूँ)
'मानवीय रिश्तों की ऊष्मा और गहरे आदर भाव से सम्पृक्त जयप्रकाश मानस की कविता ठेठ हिन्दुस्तानी कविता है- गाँव-गवाड़, धरती-आकाश, धूप-बारिश, नदी-पोखर की कविता। जहाँ जीवन अपनी समूची ज़िंदादिली के साथ मौजूद है। जीवन अनुराग से भरी उनकी कविता जीवन मूल्यों की तरफ़दारी करते उन युक्तियों की भी खोज करती है जो जीवन को आसान बनाते हैं।
बाज़वक्त वे उन सवालों से भी टकराते हैं जिन्हें जीवन-दर्शन कहा गया हैं। लेकिन जीवन-दर्शन के नाम पर वे यर्थाथ से हर्गिज़ किनारा नहीं करते। इसीलिए वे यह कह पाते हैं कि: जो सबसे महान हैं/ ये किसने कहा/ कि उनमें तुच्छताएँ नहीं हैं। और यह भी कि ये किसने कहा/ उनमें महानताएँ आएँगी ही नहीं/ की जो सबसे तुच्छ थे।

उन्होंने तीन कविताएँ जिनके पिता तो थे पर वे बेटे न थे, बहुत ढूँढने के बाद और किसने कहा को अपने वॉल पर सजाया है। 27 कवियों ने इस पर अपनी सम्मति दी है। माधव नागदा कहते हैं- सुंदर विश्लेषण किया है सवाई सिंह जी ने। कविताएं तो अच्छी हैं ही। वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत 'बहुत सुंदर' कहकर काम चलाते हैं लेकिन मदन कश्यप कहते हैं– कवि पर फेसबुक के अलावा भी ध्यान देना होगा।




9 जुलाई 2015
जब तक मैं जीवित हूँ, ज़िंदा तो रहने दें


विष्णु प्रभाकर जी की अंतिम अवस्था में कभी-कभी उनके बेटे के पास संपादकों के फ़ोन आते थे– "चलो, जो हुआ वही ईश्वर को मंजूर था।"
बेटा भौंचक होकर पूछता– "हुआ क्या आख़िर?" तो संपादक कहते– "प्रभाकर जी हमें अकेले छोड़ गये....। "अरे नहीं भई, क्या हुआ पिताजी को? वे तो पूरी तरह जीवित है, क्षमा करें, आपके पास ग़लत सूचना है।"
आदरणीय प्रभाकर जी कहते थे– पालीवाल, धन्य हैं हिंदी के संपादक, जब तक मैं जीवित हूँ, ज़िंदा तो रहने देते!


कल वरिष्ठ कवि-कथाकार राकेश कुमार पालीवाल ने रायपुर में अनेक साहित्यकारों के रोचक, अनुकरणीय और रंगारग संस्मरण सुनाये।
उन्होंने वरिष्ठ रचनाकार सुभाष पंत को याद करते हुए कहा कि उनका मानना था कि रचनाकार को अपनी रचना के समान ही अच्छा होना चाहिए।
वीरेन्द्र कुमार वर्णवाल के अनुसार अच्छा लिखने के लिए अच्छा पढ़ना चाहिए। मैंने जब उनसे पूछा कि आख़िर कितना पढ़ना चाहिए तो श्री वर्णवाल ने कहा था कि 1 कविता या कहानी लिखने के लिए कम से कम 100 कविता या कहानी पढ़ना चाहिए।


ख्यात कथाकार कामतानाथ जी मेरे मित्रों में सर्वाधिक आत्मीय हैं। वे बिना अनुभव के कुछ भी नहीं लिखते थे। कालकथा में उन्हें वीर सावरकर पर एक अध्याय लिखना था। हम दोनों सेलुलर जेल पहुँचे। जेल के उस सेल में पहुँचते ही उन्होंने मुझसे कहा– "भाई मुझे अब बिल्कुल अकेला छोड़ दें। मैं अकेले इस काल कोठरी में अनुभव करना चाहता हूँ कि आख़िर सावरकर ने कैसा अनुभव किया होगा?" और वे उस सेल में आधे घंटे अकेले बैठे रहे।

अब श्रीलाल शुक्ल जी का एक रोचक संस्मरण सुनें– मैंने उनसे पूछा शुक्ल जी, लोग इतनी शराब पीते क्यों हैं कि वे गंदे नाली का भी दर्शन कर आते हैं?
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा– "अमा, जनता को पता तो चलना चाहिए कि अमूक लेखक पीकर गिर पड़ा और गिरने-पड़ने से ही ख़बर फैलती है।"
श्री देवेन्द्र इस्सर ऐसे इकलौते रचनाकार-समीक्षक हैं जो समान लय में हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी में रचते रहे और जिन्हें समान श्रद्धा से भारत और पाकिस्तान में पढ़ा-गुना जाता है।


श्री पालीवाल ने गोविन्द मिश्र, नरेश सक्सेना, शिवमूर्ति, शैलेन्द्र सागर, डॉ.चंद्रकांत बांदिवडेकर, आबिद सुरती आदि उन सभी वरिष्ठ रचनाकारों से जुड़े एक से बढ़कर एक संस्मरण मोहक और रोचक शैली में सुनाये, ख़ास तौर पर जिन पर पिछले वर्षों में ‘शब्दयोग’ पत्रिका ने विशेषांक निकाले हैं।
इसके अलावा उन्होंने स्थानीय रचनाकार और पाठकों की विशेष माँग पर कई कविताओं का पाठ भी किया।


वरिष्ठ कथाकार तेजिन्दर ने श्री पालीवाल को आदिवासी और बेजुबानों की आवाज़ को शामिल करने गद्यकार और कवि बताते हुए अपनी चिंता में कहा कि डिजीटल इंडिया की ओर बढ़ते देश की 80 प्रतिशत आदिवासी जनता अभी भी वीर सावरकर की अँधेरी सैल में फँसी हुई है।
वरिष्ठ व्यंग्यकार और संपादक गिरीश पंकज ने श्री पालीवाल को प्रिंसिपल कमिश्नर (आयकर) जैसे शक्तिशाली पद पर रहने के बाद परम सहज, सरल और सादगी का पर्याय मानते हुए भूलने वाले समय में याद करने और करानेवाले रचनाकार बताया।




11 जुलाई, 2015
कई माह की तनख्वाह हो जैसे


उन दिनों जब डाकिया हमारे घर आता था तो माँ अपनी बहु से कहती थीं- "कल्पना! देख-देख!! जयप्रकाश का चेहरा तो देख...!!! डाकिया पत्र-पत्रिकायें या किताब न लाया हो.... जैसे कई माह की तनख्वाह इसके लिए एक साथ ले आया हो।"



यह मेरे गाँव के बारे में कहा जा रहा

जहाँ असली नाटक खेले जाते हैं, वहाँ बड़े से बड़ा नाट्य समीक्षक जाता ही नहीं। जहाँ वह ले जाता है वहाँ ज़रूर नाटक होते होंगे जो सिर्फ़ उसे, उसके चेलों, कलाकारों, कथित पत्रिकाओं की नाटकीय अकांक्षा हों।

नाटक का असली दर्शक समीक्षा नहीं पढ़ता, वह नाटक देखते हुए बीच से अपनी प्रतिक्रिया देकर अगले नाटक की विषयवस्तु का संकेत दे देता है।
यह पटना के बारे में नहीं, मेरे गाँव के बारे में कहा जा रहा है जिनकी संख्या दर्जनों में नहीं, सैकड़ों-हज़ारों बल्कि लाखों में हैं और ये कामचोर समीक्षक शायद ही कभी यहाँ आकर समीक्षा लिखें।

मेरे गाँव के लोग ऐसे नाट्य लेखक, निर्देशक, कलाकार, दर्शक, समीक्षक हैं जिन्होंने किसी हवाई नाट्य विशेषज्ञ की कोई परवाह ही नहीं की । और उसकी तो कतई नहीं जो अपनी दाढ़ी के बल पर नाटक का गुर सिखाता फिरे।




13 जुलाई, 2017
मेकअप


'मेकअप' शब्द सुनते ही अब किसी को समझने में देरी नहीं लगती कि इसका नया अर्थ 'रंगाई पुताई का महा उद्योग' ही है और यदि 'मेकअप होने वाली' धर्मपत्नी ही हैं तो इसमें एक और अर्थ जुड़ जाता है कि अभी आप केवल प्रतीक्षा कीजिए। (वह भी बिना भुनभनाये)

बहुत पहले गाँव-चौपाल में जब स्वाँग, नाटक, नाचा, गम्मत हुआ करता था और सुनते थे कि अभी 'मेकअप' चल रहा है तो उसका अर्थ होता था पलक झपकते ही मंच पर आनंद आने वाला है।

हाँ! तब 'मेकअप' का मतलब केवल कोयला, गेरू, राख, रोली, छुई, मुर्दार शंख, काजल, स्याही, चश्मा, छड़ी, लाठी, पोथी, पतरा, खरजी, पोटली आदि ही होता था।



रंक
पैसा इंसान को 'रंक' बना देता है!



कभी आकर हमें भी देख जाओ

बारिश के इन दिनों में भी यहाँ धूल चुभ रही है और उधऱ मेरे गाँव में ये फूल लुभा रही हैं- जैसे कह रही हों- माँ की तरह भाभी और भतीजियों ने हमें खिलाना और खुद खिलखिला उठना भूला कहाँ है। कभी आकर हमें भी देख जाओ! एक तुम्हीं हो जो हमें भूला बैठे हो शायद। तितलियाँ बैठी हैं यहीं कहीं- तुम आओ तो हम सब हँस उठें एक साथ!

(नीति बिटिया ने भेजा है आज)



बचपन की ग़लत पढ़ाई

बचपन में हमें पढ़ाया जाता था- 'पुरुष' का विलोम 'स्त्री'। यानी एक-दूसरे के विरूद्ध। यानी दोनों में असमानता। यानी कुछ अर्थों में बैरता भी। बहुत बाद में समझ आया कि हमें ग़लत पढ़ाया जाता रहा। पुरुष और स्त्री जीवन के दो पहिये हैं। विलोम नहीं। एक-दूसरे के लिए पूरी तरह अनुलोम।
'स्त्री' शब्द का असली आशय तो 'अर्धांगिनी', 'सहधर्मिणी', 'वामांगिनी' शब्द में ही रूपायित होता है पर अफ़सोस यही कि आज के प्रगतिशील लोग ऐसे ही शब्दों और उनके मर्मों से चिढ़ उठते हैं।




19 जुलाई, 2014
माँ की आँखों में ईश्वर


आज बहुत दिनों के बाद दिल्ली के वरिष्ठ रचनाकार प्रकाश मनु और चर्चित कथाकार गीताश्री से मिलने-बतियाने का अवसर भी मिला।
प्रकाश मनुजी को पढ़ा बहुत था, सुना पहली बार: वे अपनी रचना प्रक्रिया पर विस्तार से बोल रहे थे। इतना सरल जितना कोई बच्चा हो। सच भी है- बिना बच्चा बने बाल रचना लिखी भी नहीं जा सकती। बच्चों को सिखाया कम, उसने सीखा अधिक जा सकता है।

उन्होंने प्रतिभागी बच्चों से पूछा- ईश्वर क्या है? कैसा होता है? कहाँ होता है? किस तरह होता है?
जब वे पहले दिन स्कूल से लौटे और माँ को बताया कि स्कूल में उन्हें बहुत कुछ शब्द सीखने मिले तो अनपढ़ माँ की आँखें भर उठीं। माँ ने कहा कि बेटे मैं तो अक्षरों से दूर रही, तुम कभी इससे दूर मत होना।

श्री मनु ने आगे कहा- "मैंने उस समय माँ की आँखें देखीं। सच कहूँ उसके बाद मैंने कभी ईश्वर को नहीं देख सका। हाँ, इसके बाद जब भी देखा उसे बच्चों की आँखों में ही देखा।"

आभार तो नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली का,  जिसके सौजन्य से एक बड़े साहित्यकार को उसकी संपूर्ण सारल्य रूप से देख सुन सका।



नन्हें सितारों के बीच एनबीटी

नेशनल बुक ट्रस्ट की दो दिवसीय 'सतत् संवाद कार्यशाला', बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में प्रारंभ। 300 से अधिक विद्यार्थियों को लेखन का गुर सिखाते लेखक गण- प्रकाश मनु, गीताश्री, सतीश जायसवाल, गिरीश पंकज, जयप्रकाश मानस, डॉ. सुधीर शर्मा, किशोर दिवसे, संदीप तिवारी, अहफाज रशीद और नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली के संपादक व राज्य प्रभारी, पुस्तक उन्नयन अभियान, छत्तीसगढ़ ललित लालित्य एवं अन्य लेखक गण। आत्मीय सहयोग- दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे, बिलासपुर।


- जयप्रकाश मानस
 
रचनाकार परिचय
जयप्रकाश मानस

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