प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -39

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

बच्चों पर हाइकु, बच्चों के लिए हाइकु और बच्चों के द्वारा हाइकु- कंचन अपराजिता


बच्चों के हाथ
हाइकु की किताब
बाल दिवस


वर्तमान साहित्य में हाइकु चर्चित विधा का स्थान ले चुका है। देश-विदेश में अनेक भाषाओं में हाइकु लिखे जा रहे हैं। इसे लिखने की नई शैली, नये विषय और नये प्रयोग जहाँ हुए हैं, वहीं नयी पौध अर्थात् बच्चों पर भी हाइकु के कुछ रंग चढ़े हैं। बच्चों की सृजनशीलता के विकास के लिए कुछ प्रयास किये गये, कुछ किये जा रहे हैं, कुछ भविष्य में करने हैं।
बाल-हाइकु शब्द से तीन विचार आते हैं। प्रथम बच्चों पर हाइकु, द्वितीय बच्चों के लिए हाइकु और तृतीय बच्चों के द्वारा हाइकु। यदि हमें हाइकु के विकास रथ को आगे बढ़ाना हैं तो तीनों परिपेक्ष्य को भूत, वर्तमान और भविष्य की कसौटी में कसना होगा।

हाइकु कवियों ने बच्चों के लिए इस दिशा मे कुछ कार्य किये हैं। कवि रामाकांत श्रीवास्तव ने 110 हाइकु बच्चों के लिए लिखकर 'बाल श्री' नाम से पुस्तिका प्रकाशित की, वे बच्चों के लिए हाइकु का रास्ता खोल लिखते हैं-


बच्चों से जुड़ो
छोड़ो हैवानियत
आदमी बनो

शौशव जहाँ
बस देवता वहाँ
स्नेह अर्घ्य दो


हाइकुकार कमलेश भट्ट 'कमल' कहते हैं, "बच्चे हाइकु का साक्षात रूप होते हैं। उनकी प्रत्येक गतिविधि हाइकु जैसी ही आकर्षक और प्रभावी होती है। ऐसे में बच्चों पर बहुत सार्थक हाइकु लिखे जा सकते हैं।" वे लिखते हैं-

बोल-बोल में
छुपाए हैं हाइकु
अबोध बच्चे

छुपाए बैठे
दुनिया का भविष्य
हाइकु बच्चे


वहीं प्रसिद्ध हाइकुकार सुधा गुप्ता ने भी अपने हाइकु संग्रह 'धूप मे गपशप' में बच्चों के लिए सुंदर हाइकु दिये। वे लिखती हैं-

चिड़ियाँ रानी
चारकनी बाजरा
दो घूँट पानी

उछलकूद
चंचल हिरनौटा
छोटा झरना

धानी दुपट्टा
खेत मे लहराये
वर्षा ठुमकी


बच्चों के लिए कई हाइकुकारों ने कलम चलाई है। सरस्वती माथुर लिखती हैं-

भाई के भाल
टीका है अनमोल
कोई न मोल

बाल-दिवस
बच्चे खेलते खेल
रेलमपेल


बच्चों के लिए ज्योत्सना शर्मा की लेखनी से हाइकु-

दे दाना भैया
चुनमुन चिरैया
करे ता थैया

नाचे है कैसा
पूँछ सजाए पैसा
मस्ती में मोर

ओ मिट्ठू मेरे
बोलो राम-राम
दूँगी ईनाम


बच्चों मे हाइकु का बीजारोपण के दौरान  'किलकारी' बिहार बाल भवन में 9-16 वर्ष के बच्चों के द्वारा प्रशिक्षण के क्रम में रचे कुछ हाइकु-

चाँद उजला
कौनसी क्रीम ज़रा
है वो लगाय
- अभिनंदन गोपाल (14 वर्ष)

जन बदले
किलकी किलकारी
बेटी होने पे
- अतुल रॉय (15 वर्ष)

पेड़ों की छाँव
याद आती है मुझे
प्यारा वो गाँव
- सम्राट समीर (12 वर्ष)

फूलों के बाग
काँटे की राह भी है
हमें मिलने
- खुशबू सिन्हा (10 वर्ष)

जिद्द है मेरी
आसमां छूने और
भू पे लाने की
- रानी कुमारी (17 वर्ष)

सर्दी जो आई
नाक लाल हो गये
आग जला ली
- राजेश्वरी (10 वर्ष)


बाल कलम से हाइकु का एक संग्रह 4 दिसंबर 2007 में डॉ. अंजलि देवधर ने निकाला। 242 पृष्ठ के संग्रह 'हाइकु प्रवेशिका' में 30 देश के बच्चों के 306 हाइकु हैं। यह विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित हुई। वे हाइकु के अनुवाद में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। वहीं डॉ. जगदीश व्योम ने भी बच्चों के द्वारा लिखे 'भारतीय बच्चों के हाइकु' संग्रह का प्रकाशन 2015 में किया। यह हाइकुकारों के बालमन के प्रति लगाव को ज़ाहिर करता है। इस संग्रह से बाल कलम के द्वारा लिखे कुछ हाइकु, जो बाल-मन के संवेदना को ब-खूबी व्यक्त करते हुए-

बंदी है तोता
गाली देता ही होगा
मिर्च खाकर
- सौरभ शर्मा  (कक्षा- 8)

नहीं लगती
गंगाजल में काई
पवित्र नदी
- हिमांशु कुमार (कक्षा- 8)

कुत्ते लड़ते
इलाके छीनने को
लहूलुहान
- शुभम राणा (कक्षा- 8)

छिप जाते हैं
सूर्य की रौशनी में
तेज तारे भी
- प्रिंस कुमार (कक्षा- 6)

लड़ते खूब
आपस में कौए भी
रहते साथ
- अभिजीत (कक्षा- 9)


वरिष्ठ हाइकुकार कमलेश भट्ट 'कमल' कहते हैं, "बच्चों में हाइकु सृजन की अपार संभावनाएं हैं। लेकिन इस दिशा में कार्य किए जाने की शुरुआत भर ही हो पाई है।" डॉ. जगदीश व्योम द्वारा बच्चों की हाइकु कार्यशालाएँ आयोजित करते हुए उनसे जो हाइकु लिखवाये गए, उनसे न केवल बच्चों की अपनी अलग दुनिया का पता चलता है, अपितु हिन्दी हाइकु की दुनिया भी समृद्ध हुई है। देश के हर विद्यालय में ऐसे हाइकु सृजन की अनन्त संभावनाएं भरी पड़ी हैं। आवश्यकता केवल ऐसी संभावनाओं के दोहन के लिए किसी एनजीओ के सामने आने की है, जो इन संस्थाओं में छिपी हाइकु बाल प्रतिभाओं को सामने ला सके। क्या पता इन्हीं बच्चों में कल का कोई बाशो, टैगौर या अज्ञेय अथवा सत्य भूषण वर्मा छिपा बैठा हो।

समय के साथ बाल-हाइकु को समुचित प्रोत्साहन देने के लिए बाल-मन को समझना होगा। समय-समय पर हाइकु की कार्यशालायें आयोजित करनी होंगी। बाल-हाइकु की पत्रिका निकालनी होगी अथवा बाल पत्रिका में हाइकु के लिए स्थान बनाना होगा। तभी जो हाइकु रविन्द्र नाथ ठाकुर 101 वर्ष पूर्व लाये, को पर्याप्त खाद पानी मिल पायेगी।


- कंचन अपराजिता
 
रचनाकार परिचय
कंचन अपराजिता

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