प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़ास-मुलाक़ात

हिन्दी कविता के पठनीयता के संकट को युवा ग़ज़लकार दूर करेंगे- अनिरुद्ध सिन्हा
 



(लोकप्रिय हिन्दी गजलकार और आलोचक अनिरुद्ध सिन्हा जी से के.पी.अनमोल की बातचीत)


अनमोल– अपने शुरूआती साहित्यिक जीवन के बारे में कुछ बताएँ?
सिन्हा जी– साहित्य का न तो आरंभ होता है और न ही अंत। हाँ, जहाँ तक लेखन और प्रकाशन या उसे अभिव्यक्ति देने का प्रश्न है तो इस पर कुछ कहा जा सकता है। कला या साहित्यिक सृजनात्मकता अन्तर्मन की क्रिया है। लेखन का यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष एक भावुकतापूर्ण परिवेश है। ये दोनों पक्ष आत्मतुष्टि की भावना से प्रोत्साहित होते हैं, जिसमें अंधविश्वासों, पूर्वसंस्कारों तथा पूर्वग्रहों से मुक्ति की छटपटाहट होती है। मेरे खयाल से लेखन की यह पहली शर्त है।
मेरी साहित्यिक यात्रा जब मैं आठवीं कक्षा में था, उस समय से आरंभ होती है। जैसा कि मैंने ऊपर ही कहा है; लेखन का एक पक्ष भावुकतापूर्ण परिवेश होता है। मेरी माँ का निधन मेरे चौथे बसंत में हो गया। घर में मेरे अतिरिक्त दो बहनें, जो मुझसे तीन साल और पाँच साल बड़ी थीं और पिता जी थे। हम लोग एक छोटे-से गाँव में रहते थे। मेरे गाँव से हाई स्कूल दो किलोमीटर दूर था। हम दो भाई-बहन नियमित स्कूल जाते थे। गाने का शौक भी था। ईश्वर ने अच्छा कंठ भी दिया है। किसी भी गाने की पैरोडी बना लेना बहुत आसान था। प्रत्येक शनिवार को स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम होता था। उस कार्यक्रम में निश्चित रूप से कुछ न कुछ मुझसे गंवाया जाता था। एक दिन मेरी बहन ने वर्ग शिक्षक को बता दिया कि यह भी गाने की नकल कर गाना बनाता है। फिर क्या था, मेरे वर्ग शिक्षक पड़ गए मेरे पीछे। वहीं से आरंभ हुआ मेरे लेखन का पहला सत्र। फिर तो टास्क की तरह प्रत्येक शनिवार को अपनी लिखी चीज़ को पढ़ना हो गया।

लेखन की एक यह भी विशेषता है कि वह लेखक को गंभीर और संवेदनशील बना देता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मैट्रिक पास कर आगे की पढ़ाई के लिए 1971 में मुंगेर आ गया। 1972 में एक स्थानीय प्रकाशक ने मेरा पहला कविता संग्रह 'नया साल' छाप दिया। काफी उत्साहित हुआ। कॉलेज के प्राध्यापकों और मित्रों से काफी प्रशंसा मिली। इस पुस्तक के बाद तो लेखन मेरी प्रतिबद्धता बन गया। आज जो भी हूँ, जैसा भी हूँ, निरंतर लेखन से जुड़ा हूँ।


अनमोल– आपके नव रचनाकार को किस तरह का साहित्यिक परिवेश मिला? किस साहित्यकार से प्रभावित हुए।
सिन्हा जी– मैं जिस शहर मुंगेर में हूँ, साहित्य के मामले में यहाँ की धरती काफी उपजाऊ है। गोपाल सिंह नेपाली, रामधारी सिंह दिनकर, रॉबिन शा पुष्प, अवध भूषण मिश्र, बाल्मीकि विकट, आलोक धन्वा आदि इसी मिट्टी की उपज हैं। परिवेश भी मिला और मेहनत भी रंग लाई। वरिष्ठ गीतकार तथा 'गंगा' के संपादक रमेश रंजक, रमाकांत श्रीवास्तव, मृणाल पांडे आदि का सदैव मेरे सिर पर हाथ रहा। उनकी पत्रिकाओं के लिए मैं निरंतर लिखता रहा। लिखवाने का दबाव भी बना रहा।

अनमोल– आपके तीन संग्रह कविता और कहानी से संबंध थे, बाद में ग़ज़ल आलोचना की पाँच पुस्तकें और पाँच ग़ज़ल संग्रह आए। ग़ज़ल की तरफ कब और कैसे प्रवृत हुए?
सिन्हा जी– मैंने शुरू में ही कहा है छंदों से मेरा लगाव था। कहानी और कविता लिखने के बाद भी मैं छंद लेखन करता रहा, जिसे मैं कभी गीत कह देता तो कभी ग़ज़ल। इसी बीच एक स्थानीय कवि मित्र ने छंद की बारीकियों को सीख लेने का ताना दिया, वह भी कई कवियों के बीच में। यह बात मुझे चुभ गई। उनके ताने को मैंने दिल से स्वीकार किया। गीत और ग़ज़ल की ओर मेरा झुकाव हो गया। काफी प्रयास के बाद भी मैं गीत और ग़ज़ल की दहलीज़ को पार नहीं कर सका। मुझे लगा इनके माध्यम से मैं अपनी बातें दूर तक पहुंचा सकता हूँ।

अनमोल– ग़ज़ल को उर्दू और हिन्दी के खांचों में बाँटने की कितनी ज़रूरत समझते हैं?
सिन्हा जी– मेरे मन के लिए इस प्रकार का बौद्धिक विभाजन ठीक नहीं। नकल की प्रवृति जन्म लेने के बाद ही विभाजन का संकट उत्पन्न होता है। हिन्दी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल छंद की दृष्टि से भले ही समान हैं लेकिन कथ्य और शब्द दृष्टि से दोनों अलग-अलग हैं। विभाजन का शोर-शराबा करने से क्या लाभ। हाँ, एक बात मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ, सौंदर्य और कला की दृष्टि से उर्दू ग़ज़ल हिन्दी ग़ज़ल से काफी आगे है लेकिन कहन की दृष्टि से पिछड़ जाती है। लेखन से ज़्यादा महत्वपूर्ण कहन होता है। निर्णय आप करें। उर्दू ग़ज़ल में श्रवण गुण है। कुछ लोग इसी श्रवण गुण को ग़ज़ल का मुख्य उद्देश्य समझते हैं। उर्दू ग़ज़लकारों के समक्ष यही संकट है। ग़ज़ल को परिमार्जन की तकनीक के स्तर पर उतार कर रख देना ही ग़ज़ल की विशेषता नहीं है।

अनमोल– दुष्यंत के 4 दशक बाद हिन्दी ग़ज़ल को कहाँ पाते हैं? इस दौरान हिन्दी ग़ज़ल को सँवारने वाले किन-किन ग़ज़लकारों का उल्लेख करना चाहेंगे?
सिन्हा जी– यह मानता हूँ दुष्यंत कुमार ने हिन्दी ग़ज़ल को एक रास्ता दिया, जो कभी लंबा था। हिन्दी ग़ज़ल ने दुष्यंत कुमार के रास्ते पर चलना आरंभ किया। अनेक साहित्यिक वाद-विवादों पेशेवर कवियों के अनेक संघटनों और आलोचकों से निपटते हुए आज भी शान के साथ चल रही है। ढेर सारे ग़ज़लकर अपनी पूरी ऊर्जा और शिद्दत के साथ हिन्दी ग़ज़ल की मशाल उठाए हुए हैं। दुष्यंत के साथ आज के ग़ज़लकारों को नहीं जोड़ा जा सकता। दुष्यंत कुमार का दौर आपातकाल का था, आज का दौर भूमंडलीकरण और उत्तर आधुनिकता का है। फिर कैसे हो दोनों की तुलना! हाँ, इतना तो हुआ आलोचकों ने इसे नोटिस लेना आरंभ कर दिया है। दुष्यंत कुमार को अपने काल में एक भी अपना आलोचक नहीं मिला। अगर आज मिल रहा है तो इसका श्रेय आज के ग़ज़लकारों को जाता है।

अनमोल– वर्तमान समय के युवा ग़ज़लकारों से कितना संतुष्ट हैं?
सिन्हा जी– बहुत ज़्यादा है। कुछ ग़ज़लकारों के भीतर आग है, जो आज की विसंगतियों को जलाकर राख कर देने के लिए धधक रही है। आज जो हिन्दी कविता में पठनीयता का संकट आया है, इसे हमारे युवा ग़ज़लकार दूर करेंगे। मुझे पूरा विश्वास है।

अनमोल– आपने हमारे दौर के वरिष्ठ साहित्यकार उद्भ्रांत की ग़ज़लों पर एक आलोचनात्मक पुस्तक 'उद्भ्रांत की ग़ज़लों का यथार्थवादी दर्शन' लिखी है। उद्भ्रांत जी की ग़ज़ल की किस खूबी ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया?
सिन्हा जी– एक नहीं। उनकी ग़ज़लों पर मैंने दो पुस्तकें लिखी हैं- 1. उद्भ्रांत की ग़ज़लों का यथार्थवादी दर्शन 2. हिन्दी ग़ज़ल का सौंदर्यात्मक विश्लेषण। दरअसल उद्भ्रांत जी की ग़ज़लों में साफगोई है। उनकी ग़ज़लें हमें तिलिस्स्म की दुनिया में नहीं ले जातीं। उद्भ्रांत जी की ग़ज़लें हिन्दी ग़ज़ल पर बात करने का एक बहाना भर थीं। आप पढ़ेंगे तो पता चल जाएगा।

अनमोल– हिन्दी कविता की आलोचना में ग़ज़ल को भी शामिल किया जाना चाहिए, आप क्या कहेंगे इस पर?
सिन्हा जी– हिन्दी ग़ज़ल हिन्दी आलोचकों से आलोचना की भीख नहीं मांगती। यह खुद समर्थ है पाठकों के साथ चलने और अपनी शख्सियत का लोहा मनवाने के लिए।

अनमोल– इंटरनेट पर आने के बाद अपने लेखकीय जीवन में क्या बदलाव महसूस करते हैं?
सिन्हा जी– कोई खास नहीं। हाँ, इतना है अपने प्रिय लेखकों और पाठकों से सीधे संवाद का मार्ग प्रशस्त हुआ है। चिट्ठियों का ज़माना चला गया। इंटरनेट के सामने हमने अपनी विरासत को भी मरते देखा है, जो इसका सबसे नकारात्मक पक्ष है।

अनमोल– आप 'हस्ताक्षर' से काफी समय से जुड़े हैं, क्या कहना चाहेंगे हमारे प्रयास पर? कोई सुझाव/सलाह जो हमारी कोशिशों में और निखार लाने में सहायक रहे?
सिन्हा जी– 'हस्ताक्षर' का प्रत्येक अंक पठनीय होता है। इससे स्पष्ट होता है कि आपकी टीम मेहनती और सम्पादन के लिए योग्य हैं। आप खुद एक अच्छे रचनाकर हैं। चीजों को जाँचने और परखने की क्षमता तो आपके भीतर होगी ही। सूरज को क्या दीया दिखाना!

अनमोल– नए रचनाकारों के लिए कोई संदेश?
सिन्हा जी– लिखने से ज़्यादा पढ़ें और चिंतन करें।


- अनिरुद्ध सिन्हा
 
रचनाकार परिचय
अनिरुद्ध सिन्हा

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