प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्तूबर 2017
अंक -37

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
रोशनी की सड़क
 

उजाले की तलाश में
इधर-उधर भटकते,
टिम-टिम करते
इन जुगनुओं को
कौन बताए कि
यदि वे सब मिलकर
एक साथ जलेंगे तो
इस अभेद्य
अन्धकार में भी
रोशनी की एक
लSSSSSम्बी
सड़क होगी
 
 
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लक्ष्मी-पूजा
 
 
देखो कैसे सज गए हैं
सबके घर-बार
होने लगी हैं तैयारियां
लक्ष्मी-आगमन की
रंगोली बनी है द्वार-द्वार
धुंआ निकल रहा घर-आँगन से
बन रहे तरह-तरह के पकवान
खील-बताशे सजे थाली में
मिठाइयों के लगे अम्बार
चाहत सबको, नयन प्रतीक्षित
लक्ष्मी आए बस हमरे द्वार
 
तभी खबर मिली अम्मा को
बेटी हुई बिटवा को उनके
निकल पड़ा मुँह से बस "हाय राम!"
हुआ रंग में भंग जैसे
फीका पड़ा सबका उत्साह
तस्वीर लक्ष्मी-पूजा की
गिरी हाथ से धम-धडाम
 
क्यों इतनी हताश हुईं अम्मा तुम?
क्या तुम बन लक्ष्मी
इस घर में समृद्धि नहीं लाईं?
बन अन्न-पूर्णा तुमने
क्या
सबकी भूख नहीं मिटाई?
आने पर आफत घर पर
बन दुर्गा सबकी रक्षार्थ
क्या तुम आगे नहीं आईं?
 
फिर क्यों केवल
तस्वीर लक्ष्मी की पूजी है तुमने?
साक्षात लक्ष्मी जीती-जागती
जब प्रसन्न हो घर आईं
तो क्यों तुम इतना घबराईं?
भाग्यवान हो अम्मा तुम
तुम्हारी तैयारी रंग लाई
लक्ष्मी-पूजन पर बेटी बन
साक्षात लक्ष्मी घर आई
 
देख फीकी हँसी अम्मा की
मेरा दिल भर आया, लगी सोचने
कब वह दिन आएगा जब
बेटी के जन्म पर भी
इसी तरह उत्सव मनाया जाएगा?
कब लक्ष्मी-पूजन के अवसर पर
गृह-लक्ष्मी को पूजा जाएगा?
कब बेटी और बेटे के
अंतर को पाटा जाएगा?
 
बहुत समय नही है अब
सोचने से केवल क्या
बना है कभी कोई काम?
हिम्मत कर अब सबको
अपने कदम बढाने होंगे
बेटी के जन्मदिवस पर भी
घर में दीप जलाने होंगे
पाट अंतर बेटी-बेटे का
सुन्दर फूल खिलाने होंगे
तभी मनेगा पर्व हमारा यह दीपावली
गृहलक्ष्मी की पूजा ले आएगी
घर-घर में खुशहाली

- मंजु महिमा
 
रचनाकार परिचय
मंजु महिमा

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