अक्तूबर 2017
अंक - 31 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

(कहानी 'स्याथा' हिमाचल प्रदेश की प्राचीन परंपराओं पर आधारित है। पहले-पहल लोहार, नाई आदि वर्ग के लोगों से वर्ष भर काम लेने के बाद बदले में लोग उन्हें अपने खेतों में उपजी फसल का कुछ हिस्सा देते थे। काम लेने के बदले में इस दिए गए फसल के हिस्से को 'स्याथा' कहते हैं। इसी बहाने आपस में मेल-जोल हो जाया करता था मगर अब यह परंपरा लगभग खत्म होने को है। इसी विषय पर प्रस्तुत है यह कहानी।)


कहानी- स्याथा


बहादुरपुर- पहाड़ की ऊँचाई पर बसा एक खुबसूरत गाँव। देवदार और बान के ऊँचे-ऊँचे सदाबहार पेड़ पहाड़ी भूमि को अपनी हरी चादर में लपेटे रखते। पहाड़ी ढ़लान पर बने सीढ़ीनुमा खेत दूर से देखने पर यूँ लगते मानो किसी महामानव ने मिट्टी में सामानांतर अंगुलियाँ खींचकर पहाड़ को यह आकार दिया हो। पूर्व से बहकर आने वाली नदी पहाड़ की तलहटी में पहुँचकर अपनी द्रुतगति पर लगाम लगाती मानो मीलों सफर तय करने के बाद अपनी थकान मिटा रही हो। उगते सुर्ख लाल सूरज के तन से निकलती स्वर्ण रश्मियाँ नदी की धाराओं को जब स्पर्श करती तो यूँ लगता मानो नदी माणिक-रत्नों से भर गई हो। बहुत सुंदर नज़ारा होता था बहादुरपुर की सुबह का- नयनाभिराम।

पंछियों के डार आकाश से गोता लगाकर सोना बन चुकी नदी के कण-कण को कुछ इस तरह छूते मानो प्रकाशपुंज के बिखराव से पानी में बिखरे मोतियों को अपनी चोंच में बटोर लेना चाहते हो द्य अपने नम पंखों के साथ गांव की ओर उड़ जाते मानो सुबह की ताजगी को अपने नन्हें पंखों पर लादकर नींद में बेसुध सोए बहादुरपुर गांव के बाशिंदों को मुफ्त में बांट देना चाहते हो द्य

रोज की ही तरह आज भी सुबह की चिडि़या घर-घर जाकर छतों पर , हर आंगन में ,दीवाल पर बैठकर अपना मधुर गीत सुना रही थीद्य मंगतूराम के तीन कमरों के कच्चे, स्लेट वाले घर पर बैठकर वह गाने लगी द्य पर मंगतू आज उससे भी पहले जाग चुका था द्य गांव की बावड़ी से पानी लाकर ,नित्य क्रियाओं से फारिग होकर मंगतू नहा चुका था द्य तड़के से आज कहीं जाने की तैयारी में था मंगतू द्य बिलंग  से अपना सफेद कुर्ता-पजामा निकालकर लकड़ी की कुर्सी पर रखकर, कपड़ों के एक ढे़र में अपना ऊनी कोट ढूँढने लगाद्य अभी उसे अपनी पसंदीदा गोल टोपी भी नहीं मिली थी जिसे उसने गाँव में हर वर्ष होने वाले देवमिलन के उपलक्ष्य पर कई साल पहले खरीदा थाद्य मंगतू झल्लाकर अपनी पत्नी को हाक मारता है, श्रामकलिए! ओ रामकलिए ! मेरा कोट कहाँ रखा है ? ढूँढ-ढूँढ कर थक गया .. तू आकर ढ़ूँढ़ दे..अभी बहुत दूर जाना है मुझे...!श्

रामकली रसोई का काम बीच में ही छोड़ कर मंगतू का ऊनी कोट ढूँढ़ने लगी द्य पुरानी मेज पर रखी कपड़ों की तहों को उलट-पुलट कर अंततः ऊनी कोट उसके हाथ लग गयाद्य रामकली ने कोट को झाड़कर मंगतू की ओर बढ़ा दिया द्य
श्कब तक वापस आ जाओगे? मैं तो कहती हूँ कि रहने दो.. इतना सफर करना पड़ेगाद्यश्
रामकली मंगतू से बोलीद्य
श् अरे !!शाम तक तो लौट ही आऊँगा...तू मेरी फिक्र मत कर... स्याथा लेना हमारा हक भी तो है...कोई चोरी-चकारी थोड़े ही करने जा रहा हूँ.. अपनी नेक कमाई का हिस्सा लेने जा रहा हूँ..हथौड़ा मार-मारकर, कोयले सुलगाकर पूरी मेहनत से धूप में जलकर  काम किया है रामकलिए और इसी बहाने चैधरी जैसे पुराने यजमानों से मिलना भी हो जाएगाद्यश्  मंगतू ने सर पर गोल टोपी लगाते हुए कहा द्य रामकली को पता था कि मंगतू नहीं मानने वाला द्य


मंगतू ने दो-तीन छोटी बोरियां एक रस्सी से बांधकर थैले में डाली और लाठी लेकर घर से निकल पड़ाद्य रामकली उसे जाते हुए देखती रही द्य
मंगतू बहादुरपुर गांव का रहने वाला एक गरीब लोहार है द्य उम्र लगभग 65 वर्षद्य  पतली सी काया ,गजब की फूर्ति.. उसका रंग मानो धूप में तपकर  काला हो गया होद्य मूँछें लँबी मगर पतली-पतली, दाढ़ी के बालों के मध्य काफी खाली जगह थीद्य
मंगतू का घर तीन कमरों का है द्य  मिट्टी से बना छोटा सा आशियानाद्य एक कमरे में वो अपनी पत्नी के साथ रहता हैद्य उस कमरे के साथ वाला कमरा रसोईघर हैद्य उसी के एक कोने में गुसलखाना भी हैद्य साथ लगता कमरा अक्सर बंद रहता है, यह भूले-भटके कभी कभार आए  किसी मेहमान के लिए ही खोला जाता हैद्य खाना चूल्हे पर ही पकता हैद्य  चूल्हे में जलावन की लकडि़याँ जलाने से उठने वाले धुँए की गंध पूरे घर में रच बस गई हैद्य मंगतू के साफ-धुले कपड़े भी इस गंध से रहित नहीं हैद्य धुँए ने चांगड़ पर रखी हर चीज को अपना रंग दे दिया हैद्य रामकली काफी झाड़-सफाई भी करती है मगर कुछ ही दिनों में फिर से चांगड़ में रखी हर चीज पर कीरा जम जाता हैद्य


मंगतू बहुत अच्छा लोहारका करता है द्य चाहे हल की फाल तेज करवाना हो , हल के लिए हालस घड़वानी हो, दरातियों में धार चढ़वानी हो ,खेत जोतने के लिए बैलों के कंधों पर लगने वाला जुंगला बनवाना हो या धान के क्यारों में दलदली मिट्टी को समतल करने के लिए चोहणा या नए कुदालू-दराट में बींड़े लगवाने हो या फिर मजदूरी के लिए झब्बल , गैंती आदि को तपाकर तेज करवाना हो..सब आता है मंगतू कोद्य  वह ये सब करता भी पूरे मन से है द्य उसकी सोच है कि अगर उसके औजार अच्छे से काम देंगे तो भगवान विश्वकर्मा उससे कभी रूष्ट नहीं होंगे और लोग भी उसके काम से खुश रहेंगे द्य

मंगतू स्याथा लेने के लिए अपने घर से निकल चुका हैद्य कंधे पर एक नीले रंग का परना डाले ,हाथ में एक थैला जिसमें स्याथा में मिलने वाले खाद्यान्न जैसे मक्का, गेहूँ,जौ, बाजरा, सरसों,आलू आदि के लिए दो-चार बोरियाँ थीद्य  पहाड़ की पगड़ंड़ी से नीचे उतरता मंगतू दूर से देखने पर यूं लगता होगा जैसे कोई छोटी सी चीज पहाड़ की विशाल देह पर धीरे-धीरे नीचे सरक रही हो द्य मंगतू फसल रहित क्यारों की बीड़ से होता हुआ नदी के पास आ पहुंचा है द्य उजड़ डाले खेतों को मंगतू खड़े होकर देखता है। उसे यह देखकर बहुत दुःख भी हुआ । कभी फसलों से लहलहाने वाले रिड़कू के यह खेत बहुत सुंदर दिखते थे। मगर न जाने क्यों उसने इन्हें यूँ उजड़ डाल दिया । खेत में उगी जंगली झाडि़याँ मंगतू को चिडा रही थी।

नदी के पानी से अंजुली भरकर, सूर्य देव को अर्घ्य दिया, सर झुकाकर नमस्कार किया और नदी पर बने पुल से दूसरी तरफ निकल गया।
मंगतू का लोहारका इलाके में मशहूर है। कई वर्षों से बहादुरपुर के आसपास के पाँच-सात गांवों के किसान उसी से अपना लोहारका करवाते आ रहे हैं। लोग उसके काम से संतुष्ट हैं और हो भी क्यों न, मंगतू हर काम मन लगाकर करता। बदले में मिलने वाले स्याथा में जो भी मिले खुशी-खुशी कुबूल करता। उसी से उसके परिवार का खर्चा भी चलता। हालांकि उसके पास अपने दो-तीन खेत थे मगर न के बराबर।


साल में दो बार फसल कटने पर मंगतू स्याथा लेने गाँव-गाँव पहुंच जाता। इसी बहाने सबका कुशलक्षेम भी पूछ आता। दो-चार अपनी बातें सुनाता, दो-चार उनकी सुनता।
मंगतू केवल खेती में प्रयोग होने वाले औजारों में ही नहीं बल्कि काष्ठकर्म के हर काम में सिद्धहस्त था। पुराने समय से आज तक उसके बनाए सकपालों में बैठकर न जाने कितने दूल्हे दुल्हन को बयाहने गए। बहादुरपुर के आस-पास के गाँव की कितनी ही लड़कियों की शादियों में उसी ने बेहद सुंदर बेदी बनाई। एकदम मनभावन, अलग-अलग रंगों से रंगी हुई लकड़ियों की बेदी। बेदी के लिए वह खास किस्म की लकड़ी प्रयोग करता। मंगतू शादी से कई दिन पहले ही बेदी बनाने की तैयारी शुरू कर देता। चार मोटी व मजबूत लकड़ियों के ऊपर पतली व तराशी गई लकडि़यों का एक खूबसूरत ढांचा बनाता। उस पर लकड़ियों के बने तोता-मैना, लकड़ी का हिरण-घोड़ा व अन्य आकृतियाँ सजाता। मंगतू शहर जाकर लाल, पीला, हरा रंग लाकर सबका अलग-अलग घोल बनाकर इन लकड़ियों को रंगता। फिर इन्हें धूप-छाया में बारी-बारी सुखाता। शादी से 10-12 दिन पहले इन लकड़ियों का गट्ठा बांध, अपनी पीठ पर लादकर लड़की वालों के घर पहुंचा देता। उसकी कला देखकर कोई सौ-पचास उसी वक्त थमा देते जिसे वह थोड़ी ना नुकुर करने के बाद स्वीकार कर लेता।


कई दफा लोगों ने मंगतू को बेदी बनाते-बनाते अपनी आँखें नम करते हुए भी देखा है। उसे लगता है कि उसके हाथों से बनी बेदी लड़की वालों के आंगन में सजेगी, ब्याह होगा और बेचारी लड़की पराई हो जाएगी। फिर अगले पल वह ये भी सोचता कि कहीं न कहीं उसी बेदी तले होने वाले कन्यादान जैसे महापुण्य में थोड़े पुण्य का हकदार वह भी बन जाता होगा।

बेदी और सकपाल बनाना मंगतू के लिए हमेशा भावनात्मक रहा है। मंगतू की कोई संतान नहीं है। मगर बेदी वह यही सोचकर बनाता कि वह ये अपनी लड़की की शादी के लिए तैयार कर रहा है। वह सोचता कि काश! उसका लड़का होता तो उसके लिए ऐसा सकपाल बनाता, जैसा आज तक किसी लड़के की शादी में न बना हो। उसमें खूबसूरत नक्काशी करता, फूल पत्तियाँ उकेरता। और अगर उसकी बेटी होती तो उसके लिए भव्य बेदी बनाता, जिसकी सब तारीफ करते। बेदी के नीचे उसकी बिटिया लाल जोड़े में घूंघट डाले बैठती। समस्त वैवाहिक क्रियाएं पूर्ण होने के पर वह नम आंखों से अपने जिगर के टुकडे़ को विदा करता।

सूरज अपनी बढ़ती प्रखरता के साथ आसमान में काफी सफर तय कर चुका था। मंगतू अपने ही ख्यालों में खोया दूर के एक गाँव के पास पहुंच गया। इस गाँव में उसके बहुत जानकार हैं। सब के सब उसके काम की तारीफ करने वाले। इसी गाँव के हैं सत्यदेव चौधरी। सौ बीघा से भी ज्यादा जमीन के मालिक। पहले-पहल जब मंगतू चौधरी का लोहारका करता था तो 5-7 दिन उसके औजारों की मुरम्मत में ही लग जाते। मंगतू का पूरा-पूरा दिन आंगन में औजारों के मध्य ही निकल जाता।

मंगतू के आंगन में आम का पेड़ है, उसी के नीचे बैठकर वह अपना लोहारका करता। एक बड़े से पत्थर का सीना छीलकर उसने पानी संग्रहित करने के लिए एक छोटा हौद बनाया है, जिसे मंगतू अरथरी कहता है। अरथरी की लंबाई एक फुट और चैड़ाई आधा फुट के लगभग है। मिट्टी की दो-ढ़ाई फुट ऊँची भट्ठी बनाई है। इसे मंगतू अरंडी कहता है। अरंडी के छोटे से आंगन व गहरी दहलीज में कोयला सुलगाकर मुरम्मत के लिए लाए दराट, दराटी, कुदालू, हल की फाल में लगा लोहा आदि को सुर्ख लाल किया जाता है। जमीन में तीन चौथाई गाड़े आयताकार मुँह वाले लोहे के अड्डे पर अरंडी में तपाए लाल किए लोहे को मंगतू हथोड़ी मार मारकर मनचाही आकृति देता है। अरंडी की दाई दीवार में किए गए सुराख से हस्तचालित हवा प्रवाहित करने वाली मशीन की एक नलिका अंदर घुसाई गई है ताकि हवा के प्रवाह से कोयले सुलगते रहे। अरंडी की पिछली दीवार में दो तीन छेद हैं, जहाँ से धुँआ, राख और दहकते कोयले की चिंगारियाँ बाहर निकल जाया करतीं। सुलगते अंगारों के बीच लाल हुए लोहे को चिमटे से पकड़ता, अड्डे पर रखता है और फिर हथौड़े से पीटकर मंगतू अरथरी में डालकर ठंडा करता है। गरम-गरम लोहा अरथरी के पानी में जाकर एक तेज आवाज उत्पन्न करता।

मंगतू गाँव में प्रवेश कर चुका है। "मंगतू चाचा राम-राम! बड़े ही टैम बाद दर्शन हुए आपके।" गाँव के किसान हरिया ने कहा। "हाँ, दो साल बाद चक्कर लगा पाया हूँ, पिछली बार किसी और को ही भेजा था।" मंगतू ने मुँह पर से पसीना पोंछते हुए कहा।
अभी मंगतू थोड़ा आगे ही बढ़ा था कि उसने फट-फट-फट की कानफोडू आवाज सुनी। मंगतू ने इसे  हेलिकाप्टर के ईंजन की आवाज जानकर आसमान की ओर देखा। मगर आसमान पर ऐसा कुछ भी नहीं था। मंगतू को आवाज अपने पास आती हुई प्रतीत हुई। गली के घुमाव पर मंगतू को दूसरी तरफ से दो पहिए वाली फट-फट की आवाज करती हुई एक चीज अपनी तरफ बढ़ती नजर आई। उस आवाज करती चीज के पीछे एक प्रवासी मजदूर उसको थामे चल रहा था। मंगतू उसे दूर तक जाता देखता रहा। उसे अभी तक कुछ भी समझ नहीं आया था कि वह चीज आखिर थी क्या! मन में अनेक प्रश्न लिए मंगतू आगे बढ़ गया।


दो सालों में काफी कुछ बदल गया था। चौधरी ने एक बड़ा मकान बना लिया था। तीन-चार मंजिला। एक बड़े बंगले जैसा। इतना ऊँचा कि ऊपर तक देखने के लिए मंगतू ने ज्यों ही गर्दन ऊपर की, सिर पर पहनी गोल टोपी नीचे लुढ़क गई। आँगन में चौधरी एक चारपाई पर बैठकर हुक्का पी रहा था। "पैरी पैणां चौधरी जी!" मंगतू ने बड़े ही विनम्र भाव से दायां हाथ माथे पर लगाते हुए सिर झुकाकर कहा। "ओ हो! आओ भई मंगतूवा!  कैसा है तू? बहुत टैम बाद आया? भूल ही गया चौधरी को अब? चौधरी ने एक हाथ से मुँछों को ताव देते हुए कहा। "अरे नहीं मालिक! बस ऐसे ही...कभी काम में व्यस्त होता हूँ ..तो कभी बमारी-समारी चली रहती है।" मंगतू ने अपना परना कंधे से उतारकर नीचे आँगन पर बिछाया और वहीं बैठ गया। आंगन में लगी संगमरमर पर हाथ फेरता हुआ मंगतू बोला, "मालिक! नया घर बना लिया आपने तो ..!" "हाँ मंगतूवा! अभी कुछ महीने ही हुए ..एक मकान और बन रहा है हरिया के घर के पास वाले हमारे खेत में।" चौधरी ने हरिया के घर की तरफ इशारा करते हुए कहा। "क्या मालिक? मकान उस खेत में क्यों? वो तो बहुत उपजाऊ खेत है .. मक्का और गेहूं की खूब फसलें पैदा होती हैं उस खेत में। आपने वहाँ मकान बना लिया....!!" मंगतू ने हैरान होते हुए पूछा।


गुड-गुड कर हुक्का पीते हुए चौधरी बोला, "अरे मंगतूवा! अब कहाँ रही वो पहले सी बातें... जब दिन भर खेतों में मेहनत कर किसान अपना गुजारा करता था।आजकल तो सब कुछ दुकानों में उपलब्ध है। पहले तो चावल भी अपने होते थे, दालें भी, सरसों का तेल भी बस नमक दुकान से लाना पड़ता था। पर आज कल तो सब दुकान में मौजूद है।" चौधरी ने कहा। "मंगतूवा! पहले सारे गाँव वाले मिलकर खेतों में काम करते थे, ज्वारी देते थे, घास काटने की ज्वारी, कपास बिनने की ज्वारी, गोबर खेतों में डालने की ज्वारी। इसी बहाने एक-दूसरे से मुखातिब भी हो जाते थे। मगर अब हालात बदल गए हैं। यहाँ लोगों ने खेती करना लगभग छोड़ दिया है। कोई खेती करता भी है तो बहुत कम। कुछ जंगली जानवरों बंदरों, सुअरों ने आतंक मचा रखा है। दिन भर खेतों में काम करने के बाद रात को भी खेतों में गश्त लगानी पड़ती है। और फिर अब बरसण भी कहां टैम का होता है। कभी कभी तो पाँच महीनें बिना बारिश के ही निकल जाते हैं। अब तो लोग शहर में जाकर काम ढूंढने लगे हैं। वहाँ चाहे दो-तीन हजार ही कमाए..वो  उनको मंजूर है.. कइयों ने तो अपनी पुश्तैनी जमीन तक बेच डाली।"
मंगतू चुपचाप सुनता रहा। कहने को तो बहुत कुछ था पर शब्द मुँह से बाहर नहीं आ पा रहे थे।


मंगतू वक्त के साथ आए बदलावों को महसूस करने लगा था। पहले-पहल एक नीम का पेड़ चौधरी के आंगन की शोभा बढ़ाया करता था। कितनी घनी छाया होती थी उसकी। तौंदी में चौधरी उसी की छाया में चारपाई पर आराम करता। ठीक सामने रसोईघर हुआ करता था जिस में काम करती चौधरानी अक्सर दिख जाया करती। वह मंगतू को मीठा पानी पिलाने के बाद खाना परोसते। अब चौधरानी भी नहीं रही। घर में दो-दो बहुएं हैं मगर अपने-अपने कमरों में ही सीमित।

पहले नीम के पेड़ के नीचे चौधरी की चारपाई के आस-पास तीन चार लोग उसकी खिदमत करते हुए दिख जाया करते थे। मगर आजकल एक मक्खी भी नहीं फटकती है।
तभी घर के एक कमरे से बच्चा दौड़ता हुआ आया और चौधरी के पास आकर उनसे लिपट गया। "आ जा मेरा बच्चा! चौधरी ने हुक्के की कली को दूसरी तरफ मोड़कर बच्चे को पकड़ लिया।
"मंगतूवा, ये है मेरा पोता जैक्की!" चौधरी ने बच्चे को पुचकारते हुए कहा।
"बहुत प्यारा बच्चा है मालिक! ये नाम सुनकर मंगतू को याद आया कि उसके पड़ोसी रामू के कुत्ते का भी यही नाम है। मंगतू सोचने लगा कि क्या जमाना आ गया। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान तैर आई थी।


"मालिक! माल-भारा क्या कर रखा है? मंगतू ने पूछा।
"मंगतूवा! पशु तो एक भी नहीं है अब... गौशाला खाली पड़ी है ..वहाँ पर तीन चार गोरखे रहते हैं। वहीँ ग्रीन हाउस में मजदूरी करते हैं। यह जवाब सुनकर मंगतू स्तब्ध रह गया। "फिर मालिक खेतों में जुताई कैसे होती है?" "बड़ा लड़का शहर से एक पावर टीलर ले आया है.. उसी से अब जुताई होती है..मुझे तो नहीं आता चलाणे..लड़का ही चलाता है....बहुत आवाज करता है पावर टीलर...फट फट फट...और काम भी फटाफट हो जाता है....बैल की जोड़ी तो हमने दो साल पहले ही बेच डाली थी। आजकल तो गाँव में कईयों ने पावर टीलर ले लिए है।"
मंगतू को यकायक ख्याल आया कि गली में जो फट फट करती हुई चीज उसने देखी थी हो न हो वो यही होगी .. पावर टीलर।


"हरे राम!! हरे राम !! मंगतू के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा। उसका हलक सूख रहा था। दो हाथ अंजुलि की आकृति में जोड़ते हुए मुंह के पास लाकर चौधरी की गोद में बैठे उसके पोते की तरफ पानी पीने का संकेत किया। बच्चा पहले से ही उसे घूरे जा रहा था मानो उसने मंगतू को नहीं किसी दूसरे ग्रह से आए विचित्र प्राणी को देख लिया हो। चौधरी ने मंगतू को इस मुद्रा में देखा तो पानी मंगवाने के लिए आवाज दी।
"जाह्नवी बेटा! जरा पानी लाना!"
मंगतू ने यह नाम पहली बार सुना था। वह बंगले के हर दरवाजे पर टकटकी लगाए देख रहा था कि कब जैसे कोई दरवाजा खुले और उसे पानी पीने को मिले। थोड़ी देर के बाद एक नवयुवती हरे रंग का टॉप और ब्लू जींस पहने हाथ में पानी की बोतल लेकर बाहर आई।
"ये लीजिए डैड!" पानी की बोतल चौधरी को थमाते हुए बोली। "बेटा! मंगतू को पानी पिला दो..और पानी थोड़ा ऊंचाई से गिराना।" चौधरी ने कहा।


युवती पानी की बोतल लेकर मंगतू की तरफ बढ़ी। चुस्त ब्लू जीन, कंधे तक कतरे हुए बाल, इत्र की तीखी गंध, गहरे गले वाला कुर्ता, न सर पर दुपट्टा न मांग में सिंदूर, माथे पर एक जरा-सी बिंदी जो मंगतू को कड़ी मशक्कत करने के बाद दिखी।
पानी पिलाने के लिए युवती जैसे ही झुकी, तंग कपड़ों से उसकी छातियाँ झांकने लगी। उन पर अचानक नजर पड़ते ही शर्म से मंगतू की आँखें पानी पीते-पीते बंद हो गयीं।  बहुत ग्लानि महसूस हुई, मानो वह पानी नहीं विष पी रहा हो और वह युवती कोई विषकन्या हो।


युवती पानी पिलाकर चली गई। "मंगतू! ये मेरी बहू है, अभी पिछले साल ही लड़के की शादी की है।"
मंगतू पुरानी यादों में खो गया। उसे याद है जब चौधरानी सर पर दुपट्टा ओढ़े पूरी मांग भरे,  पैरों में घुंघरू पहने, हाथ में ट्रे लेकर कभी अपने घर की लस्सी पिलाती, कभी अपने खेतों में उपजी ईख का रस। कितना तृप्त होता था उसका मन तब। मगर आज...आज तो जैसे हालात एकदम बदल गए हैं। कुछ ही सालों में इतना परिवर्तन न केवल खेती और मौसम में आया है वरन खुद मानवीय व्यवहार में भी बहुत बदलाव हुए हैं। अब लाज शर्म हाशिए पर छूटते हुए नजर आते हैं जो कभी आभूषण समझे जाते थे। पहले भी तो आदर सम्मान होता था, प्यार-प्रेम था मगर आज...आज जैसे सब दिखावा मात्र रह गया है। मंगतू पुराने और नए दौर के बीच में आए इन बदलावों पर मन ही मन चिंतन करने लगा था।


उसे याद है चौधरी के बड़े-बड़े क्यारों में धान की खूब फसल होती थी। बरसात में सारे गांव के लोग मिलकर धान की रोपाई करते थे। जिंदगी फसलों की तरह खुशहाल थी। खुशियां खेतों में फसल के फूटते अंकुरों की माफिक लगती थी। सब कुछ कितना अच्छा था, सादगी भरा..बिना किसी आडंबर के, अपनी खून पसीने की कमाई, निरोगी काया, स्वस्थ मन.....! मगर आज तो जैसे आदमी कठपुतली बन गया हो। बिना किसी दया-भाव के, बिना किसी लगाव के, बस पैसा कमाने की अंधी दौड़ में भटकता आज का मानव...!!
"ये ले मंगतू थोड़ा गेहूँ रख ले। यह दो-तीन साल पुराना है तेरे लिए ही बचा कर रखा था। अब तो खेती होती नहीं इसलिए और अनाज नहीं है।"


मंगतू ने बोरी को थाम लिया। "मंगतू कुछ पैसे भी रख ले! तेरे काम आएंगे।" चौधरी ने अपनी जेब में से सौ-सौ के पाँच-छ: नोट निकालकर मंगतू की ओर बढ़ाए। मंगतू ने पैसे लेने से इंकार किया तो चौधरी ने जबरन उसकी कोट की जेब में पैसे ठूंस दिए।
"रहने दो मालिक! ये मेरी कमाई नहीं है।" मंगतू ने नोट जेब से निकालकर चौधरी की चारपाई पर रख दिए।
"अरे रख ले। अब तुझे पहले जैसा स्याथा भी तो नहीं मिलता। लोगों के खेत खलिहान खाली हैं। ज़मीन बंजर डाल दी है। सारा राशन दुकानों से आता है। "मालिक! उसने पैदा किया है, पाल भी वही लेगा!" मंगतू ने आसमान की तरफ ईशारा करते हुए कहा तो चौधरी यह सुनकर चुप हो गया।


मंगतू ने गेहूँ की बोरी पीठ पर उठाई और अपने रस्ते चल दिया।
"ठीक है मालिक चलता हूँ।"
"मंगतूवा कुछ और चाहिए होगा तो मांग लेना..चौधरी ने आवाज दी।" मंगतू कुछ नहीं बोला और चुपचाप निकल गया।
मंगतू को गेहूं की बोरी एक आदम लाश-सी लग रही थी, जिसे वह पीठ पर उठाए ले जा रहा था। उसका एक मन कह रहा था कि वहीं पटक दे  उस बोरी को रास्ते में ही मगर अन्नदेवता का अपमान जानकर यह विचार छोड़ दिया।


पूरा रास्ता बीती बातें सोच कर निकल गया। घर पहुँचा तो पत्नी ने निराशा का कारण पूछा।
गेहूं की बोरी को कमरे के कोने में पटककर, एक लोटा पानी बिना रुके, खड़े-खड़े ही  हलक में उतार दिया। "अब खेती नहीं होती रामकलिए! अब स्याथा लेना भीख मांगने जैसा हो गया है। मैं कुछ और काम कर लूंगा पर कभी भीख नहीं मांगूगा।" मंगतू का बात करते करते गला भर आया। रामकली पास खड़ी बुत बनी रही। "मैंने तो मना किया था आपको! रहने देते!!" मंगतू चुप रहा।


उस रात घर में चुप्पी छाई रही। मानो किसी का मातमी शोक हो।
अगले दिन तड़के रामकली ने आँगन में कुछ जोरदार आवाजें सुनीं। वह यह देखने के लिए आंगन में आई। "ये क्या कर रहे हो आप? रहने दीजिए!" रामकली ने लगभग चीखते हुए कहा।
मंगतू के पतले शरीर में गजब की शक्ति आ गई थी। मानो वह खेलता हुआ देव गूर बन चुका हो और देवता उसमें आ चुका हो। उसने अपने हाथों में घण पकड़ रखा था। एक जोरदार प्रहार से उसने आँगन में खुद बनाई अरंडी को खंड़-खंड़ कर दिया, जिससे उसने कई वर्षों लोहारका किया था। घण के अगले जोरदार प्रहार से अरथरी भी  टुकड़ों में बंट गई। अरथरी में संग्रहित पानी उछलकर मंगतू के चेहरे व कपड़ों पर बिखर गया था। भावुक मंगतू की आँखों से निकलता खारा पानी अरथरी के पानी में मिलता गया।


- मनोज कुमार शिव

रचनाकार परिचय
मनोज कुमार शिव

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कथा-कुसुम (3)